एबीवीपी की अराजकता, छात्र राजनीति का वर्तमान एवं भविष्य अंधेरे में धकेलती राजनीतिक पार्टियां!

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सोनू यादव “महेंद्र”
सोनू यादव “महेंद्र”

विचार। अगर आप एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) जैसे संगठित गुंडों के समूह से राष्ट्रवाद, सभ्यता, मानवता, नैतिकतावाद की उम्मीद करते हैं तो यह आत्मप्रवंचना मात्र ही है। आरएसएस/बीजेपी की छात्र इकाई एबीवीपी की खुलेआम गुंडागर्दी का लम्बा लेखा-जोखा उपलब्ध है।

विचार-विमर्श और वैचारिक बहस की लोकतांत्रिक शैक्षिक संस्कृति पर हमला इनका जन्मसिद्ध अधिकार बन चुका है। यह गुंडे जेएनयू, डीयू, बीएचयू, एयू ही नही बल्कि समूचे देश की जनतांत्रिक पंरपरा के लिए ख़तरे की घंटी हैं। जेएनयू आरएसएस/बीजेपी की आंखों की किरकिरी रहा है।

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क्योंकि इस विश्वविद्यालय की बौद्धिक स्वतंत्रता और उन्मुक्त बहस की संस्कृति आरएसएस/बीजेपी के रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी सिद्धांतों के विकास के लिए अनुकूल माहौल मुहैया नही कराती है।

इसी के चलते चन्द दिनों पहले जेएनयू परिसर में भीषण गुंडागर्दी, सभ्यता, नैतिकता को किनारे पर ठेलकर लंठई, बेहूदगी का नंगानाच प्रसाशन की सह पर होता रहा, जो अभी हमारी आंखों से ओझल भी नही हो पाया, इससे पहले ही एक बार फिर से उदंडता, अराजकता, गुंडई का आदी एबीवीपी छात्रसंघ ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वैचारिक बहस को निगलकर तालिबानी इरादों में बहकर छात्रसभा के छात्रों के साथ मारपीट की, कमरों में आग लगा दी, तोड़फोड़ की, घंटों उपद्रव किया, जमकर बवाल काटा और प्रशासन नदारद रहा।

सवाल यह नही उठता है कि गुंडों ने गुंडई क्यों की बल्कि सवाल यह है कि कानून/प्रसाशन/संविधान का डर किसकी सह पर इनके मन/मस्तिष्क ने निकल चुका है और उसकी ज़गह गुंडई/अराजकता ने ले ली है…?

क्या आपको भाजपा के सत्ता पाने/नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का सामंजस्य इस तरह की गुंडई में सह प्रदान करता नही दिखता है…? आख़िर क्यों नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही एबीवीपी के कार्यकर्ता नाजी फौजियों की तरह काम कर रहे हैं…? इसके पीछे का विज़न भी क्या राष्ट्रवाद की श्रेणी में ही आएगा…?

एबीवीपी के लोग लाठी-डंडों से लैस होकर मतगणना केन्द्र में जबरन घुस कर मतपेटियों को छीनने/विश्वद्यालय परिसर के प्रोफेसरों को तब तक पीटने जब तक उनकी मौत न हो जाए। जिसको चाहें उसे बेइज्जत करने, लोगों के चेहरे पर कालिख पोतने, विश्वद्यालय परिसर में आगजनी करने/उपद्रव/तोड़फोड़/मारपीट करने का साहस आख़िर कहां से पाते हैं…?

उपरोक्त घटनाएं पहली बार नही हो रही हैं इससे पहले भी जिन राज्यों में भाजपा सत्ता में रही है उन राज्यों के विश्वविद्यालयों में छात्रों सहित विश्वविद्यालय मैनेजमेंट भी खून के आंसू रोया है। एबीवीपी कार्यकर्ताओं को कानून की खिल्ली उड़ाने में एक डिफरेंट टाइप के राष्ट्रवाद का भान होता होगा तभी ऐसी ओछी हरकत करने से ज़रा भी गुरेज़ नही किया जाता है।

अगस्त 2006 में भी एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने उज्जैन के डिग्री कॉलेज में घुसकर प्रोफेसर सभरवाल की पिटाई की की थी। प्रोफेसर सभरवाल को इतना पीटा गया कि उनकी मौत हो गई। मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार (जो ऐसी घटनाओं को करने के लिए इन्हें मोटिवेट करने का षड्यंत्र पर्दे के पीछे से रचती रहती है) ने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को बचाने की खूब कोशिश की।

लिहाज़ा 2009 में निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में हत्या के आरोपियों को बरी कर दिया। यानी कानून/न्यायालय सब जेब में है। आओ भाई जो उखड़ना हो उखाड़ लो हम तो ऐसे ही रहेंगे। इसी एबीवीपी छात्र ईकाई से ऐसे ही गुंडे किस्म के कई नेता देर-सबेर बीजेपी में आकर राष्ट्रीय राजनीति में शुमार होने की चाहत रखते हैं।

एबीवीपी विचारधारा की आड़ में सत्ता और बाहुबल द्वारा एक ऐसे समाज की रचना की कोशिश करती है जहां समूचे समाज और राष्ट्र का हित सिर्फ और सिर्फ उस विचारधारा विशेष के इर्द गिर्द नाचे।

जरा सोचिए कि अगर हम सभी एक जैसा सोचने लगे तो राष्ट्र का क्या होगा…? राष्ट्रवाद का क्या होगा…? अभिव्यक्ति की आजादी पर भय के बादल मंडराने लगेंगे या नही…? वैचारिक मतभेद से शुरू हुयी लड़ाई ने आज राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का रूप धारण कर लिया है या अभी और कुछ देखना बाक़ी रह गया है…? कॉलेज के परिसर में लड़कियों को विचारधारा विशेष का भय दिखाकर तंग किया जाना किस मानसिकता को दर्शाता है…?

आम छात्र जो भी इनके विचारों से असहमत होते हैं उनके साथ हिंसा क्यों की जाती है…? अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसे छात्र संगठनों ने तो पहले से ही आम छात्रों के चुनाव लड़ने की आज़ादी पर ताला लगा दिया था और अब सत्ता का दुरुपयोग करके बोलने की आज़ादी पर भी लगातार प्रहार कर रहे हैं। यह आख़िर कब तक चलता रहेगा…? एबीवीपी में जातिवाद, बाहुलबलवाद और पूंजीवाद जड़ों तक संगठन में समा चुका है। प्रति वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के होने वाले चुनाव इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। अब भला जातिवाद, बाहुबलवाद और पूंजीवाद की छत्रछाया में सच्चे राष्ट्रवाद की कल्पना कैसे की जा सकती है…?

इन सबके विपरीत जिन लोगों का शुमार सामाजिक न्याय के सबसे बड़े योद्धाओं में होता है, उन वाले नेता जी का अभी तक ट्वीट भी नही आया है। इतना सब होने के बावजूद भी कोई प्रतिक्रिया न आना अपने आप में कई सवालों को जन्म देता है।

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आखिर एयरकंडीशनर रूम्स का तापमान ठीक-ठाक बना हुआ होगा फिर भी ट्वीट मात्र से क्रांति लाने वाले लोगों ने ट्वीट करना आख़िर वाजिब क्यों नही समझा…? ज़रा आप थोड़ी देर के लिए राजनीति को किनारे पर ठेल कर सोंचिए आपका नेतृत्व आपसे सिर्फ़ झंडा ही ढोने की अपेक्षा रखता है या उसका भी कोई कर्तव्य बनता है।

आप यह भी सोंचिए जब कोई भी छात्र किसी भी राजनीतिक संगठन से जुड़ता है। तो वह उसकी सोच, विचारधारा, कार्यशैली से प्रभावित होकर जुड़ता है। किसी भी संगठन से जुड़ने की इस प्रक्रिया में वह अपने कई व्यक्तिगत सपनों, महत्वकांक्षाओं को ताख पर रख देता है। इसी तरह आप भी राष्ट्र के निर्माण, छात्रों के हित एवं अधिकार की लड़ाई लड़ने हेतु अपने संगठन से समाजवादी विचारधारा के साथ जुड़े होंगे और आज उस विचारधारा का क्या हश्र हो चुका है…?

क्या आपको नही लगता है कि आप स्वयं और अन्य छात्रों को प्रवंचना का शिकार बना रहे हैं…? उन छात्रों के वर्तमान और भविष्य को अंधकार की सरिता में डुबोने का कुटिल षड्यंत्र नही रच रहे हैं…? अगर यह सब विचार करने की क्षमता का आभाव लेकर आप राजनीति में अपना भविष्य देख रहे हैं तो फिर आप राजनैतिक पार्टियों का झण्डा ढ़ोते रहिये। आप और आपके जैसे करोड़ों बेरोजगार युवाओं को रोजगार मोदी जी दे ही देंगे।

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