भारतीय परिवेश में आंगनबाड़ी का महत्त्व और योगदान

Rakesh Roy- Janmanchnews.com
Rakesh Roy
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राकेश रॉय,

भारत में आंगनवाडी की स्थापना 1975 से की गयी है जिसका मुख्य उद्धेश्य कुपोषण को दूर करने के लिए किया गया है। साथ ही इस कार्यक्रम के माध्यम से  गर्भवती और धात्री  महिलायों के स्वास्थ्य में सुनियोजित सुधार सुनिश्चित किया जा सके जो की जच्चा-बच्चा दोनों  के लिए हीं बहुत  आवश्यक है।

ज्यादातर  ग्रामीण मामलो में अक्सर ऐसा देखा गया है की किसी भी परिवार की शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का बहुत बड़ा योगदान होता है उस परिवार के स्वास्थ्य खान-पान की आदत और रहन-सहन के आदतों पर, जिसका सीधा असर परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य से झलकता रहता है।

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अगर हमलोग ग्रामीण परिवेश की बात करते है तो बहुत सारी बातें सामने निकल कर आती है जो की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। अगर हमलोग इस बात पर गौर नही करेंगे तो शायद यह माता और शिशु दोनों के लिये  हीं हानिकारक साबित होगा।

इसके अलावा हमारे समाज में बहुत सी निराधार बातें किम्वदंती के रूप में   प्रचलितं है जैसे की गर्भवती महिलायों को अधिक खाना नही देना चाहिए  इसके पीछे यह करण बताया जाता है उनके बुजुर्गो या अनुभवी महिलावों द्वारा की बच्चा माँ के गर्भ में ही ज्यादा पल गया तो जन्म लेते समय बहुत तकलीफ होती है. जो ज्यादातर मामलो में निराधार सिद्ध होता है।

हमारे देश में कई ऐसे मनगढ़ंत और निराधार बातों को अपने मन में घर करने दिया गया है जिसका की गर्भवस्था के दौरान होने वाले बातों से वैज्ञानिक तौर पर कोई सीधा या आसान सम्बन्ध नही दि खाई देता  है. और जाने अनजाने में हमारे घर की महिलायें इन बातों में आ कर अपना और अपने बच्चे के स्वास्थ्य को हानि पहूँचाती रहती है।

अगर इस तरह के अन्धविश्वाशो को मानने से पहले उनके पीछे के वैज्ञानिक कारणों को देखने की कोशिश करेंगे तो यह बात निश्चित तौर पर सामने आएगा की अगर हमलोग गर्भवती महिला को कम भोजन देंगे तो जच्च-बच्चा दोनों के सेहत पर दुष्प्रभाव पड़ेगा, कमजोरी होने के कारण बच्चा गर्भ में मर भी सकता है या फिर अगर जीवित पैदा हो भी जाता है तो उसमे कमजोरी के लक्षण और बिमारियों से लड़ने की क्षमता का दर न्यूनतम पाया जायेगा और बच्चा हर समय छोटे-छोटे बिमारियों से घिरा रहेगा और  कभी-कभी माँ को भी खून की कमी हो जाती है जिसके कारण से उसे कमर और सिर दर्द से लम्बे समय तक जूझना पड़ता है।

ऐसी बहुत  सारी मान्यताऐ   हमारे समाज में विद्यमान है जिनका कोई  हिसाब नही है। पर अगर इनके दुष्प्रभाव का आंकलन किया जय तो बे हिसाब पाए जाते है।  एक मान्यता के अनुशार गर्भवती को पपीता नही  खाने देना चाहिए इससे गर्भ गिरने का डर रहता है।  जो की  वैज्ञानिक तौर पर सच नही है अगर देखा जाय तो इस में विटामिन ‘ए’ पाया जाता है जो को जच्चा और बच्चा दोनो  के लिए आवश्यक है।

बहुत सारे समुदायों में बच्चे पैदा होने के बाद माँ का दूध दो या तीन दिनों तक उसे नही पिलाया जाता है, क्यूकी इसे शिशु के स्वास्थ्य के  लिये ठीक नही समझा जाता पर हकीक़त ये है की जो पहला  पीला गढ़ा दूध निकलता है  जिसे “खिज़” कहते है उसमे रोग-प्रतिरोधन की असीम ताकत होती है और इसे पिलाने से शिशु और माँ के बीच में भावनात्मक लगाव ज्यादा होता है।

कुछ लोग ऐसा सोचते है की  छोटे बच्चे को भैंस का दूध के सेवन से परहेज करना चाहियें, लेकिन  ऐसा सोचना सरासर गलत है हमलोग भैस के दूध का भी उपयोग कर सकते है, इसके दूध में चिकनाई, {वसा} ‘फैट’ अधिक  पाई जाती है।  इसलिए इसके दूध को उबाल कर उसकी मलाई को निकल देनी चाहिए और इसके बाद इसका प्रयोग किया जाना चाहिये। क्योंकि ज्यादा चिकनाई-युक्त दूध बच्चो को हाज़मे के लिए ठीक नही होती  है, पर इसका मतलब मतलब  यह बिल्कुल भी नही है की एकदम से देना ही नही चाहिए।

एक दुसरे मान्यता के अनुसार छोटे बच्चे को केला नही खिलाना चाहिए पर ज्यादा लोगो को शायद यह पता नही है की  पका केला छोटे बच्चे के लिए बेहद उपयोगी है।क्यूंकि इसमे ढेर सारा ताक़त और कैल्शियम प्रचुर मात्रा में होता है जब बच्चा 6 महीने का हो जाय तो उसे थोडा सा पका केला मशल कर देना चाहिए और  धीरे-धीरे इसकी मात्रा बढ़ानी चाहिये।

बच्चे को जल्दी ह्रीस्त-पुष्ट करने की ललक में  व अज्ञानता वश बहुत सी माएं  6 माह से पहले ही माँ के दूध के अलवा बहरी चीजो को खिलाना प्रारंभ कर देती है जो की शिशु के स्वास्थ्य व पाचन के लिया  बहुत ही नुकसान प्रदक साबित  होता है क्यूंकि बच्चे की आंतरिक संरचनाये इतनी जल्दी विकशित नही हो पाती है की बाहरी चीजों को आसानी से पचा सकें। तो इसके लिए 6 माह तक सिर्फ माँ का ही दूध शिशु के देना चाहिए।

कई लोगो का ऐसा भी मनाना है की बच्चा पैदा होने के बाद महिलाओं  को पानी नही देना चाहिये। ऐसा सोचना  भी एकदम से गलत है क्यूकी  प्रसव के दौरान शरीर से काफी मात्र में खून और पानी बह जाता है जिससे प्यास लगना  स्वाभाविक है ऐसे पारिस्थिति में पानी उबाल कर उसे ठंढा होने के बाद पीने को देना चाहिये, पानी उबालते समय इसमें मोटी इलायची को  भी प्रयोग में लिया जा सकता है।

इस घटना के पीछे के कारणों का अध्ययन करने पर  पता चलता है की पुराने ज़माने में स्वच्छ पानी की उपलब्धता की कमी होने के कारण  संक्रमण आदि होने का डर बना रहता था।

तब ऐसा सोचना सही था पर आज की तारीख मे ऐसी बातें निराधार साबित होती हैं बहुत से लोगो का आज भी  यह मानना है की, बीमारी में अगर दो या तीन दिन तक भोजन नही किया जाय  तो अपने आप मनुष्य ठीक होता है। ऐसा सोचना गलत है ऐसी स्थिति में  नज़रअंदाज़ करने से परेशानी बढ़ सकती है।

जिसके कारण  शरीर में पौष्टिक तत्वों की कमी हो जाती है। कमजोरियां महसूस होने लगती है, जितना समय ठीक होने में लगता है कजोरी से निपटने में उससे कहीं अधिक समय लग जाता है तो इन परिस्थितियों में बेहतर है की बीमारी में भी गर्भवती को उनकी  पसंद का बिना ज्यादा घी, मसाले जल्दी पचने वाले खाना दिया जाए। जैसे दाल, चावल का पानी(मांड) उबली सब्ज़ियाँ दूध, सब्ज़ियाँ और फलो का रस घरेलू और आसानी से उपलब्ध होने वाले मौसमी फल तथा साग-पत्ते।

अगर उपयुक्त  बातो का ध्यान रखा जाए तो  वार्षिक “मातृ और शिशु मृत्यु दर” को बहुत हद तक बिना किसी अतिरिक्त संसाधन की सहायता से नियंत्रित किया जा सकता है।

हमारे आंगनवाडी कार्यकर्त्ता के पास बहुत सारी स्वास्थ्य से जुड़ी महत्वपूर्ण और जरूरी जनकारीयां उपलब्ध  होती है। जिसको की लगातार सेविका, नर्स  या फिर आशा  दीदी की सहायता जाना जा सकता है और इस  से  लाभ लिया जा सकता है। और अपने परिवार कि ख़ुशियों को बढाया जा सकता है।

राकेश कु. राय

संस्थान : गाँधी फेलोशिप, शिक्षा शोधकार्य के लिये ‘राजस्थान’ के डूंगरपुर जिले में कार्यरत्त है

(एम.ए. डेवलपमेंट स्टडीज, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ बिहार) 

 

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