अनु अग्रवाल: अभिनय से अध्यात्मक तक का सफर

File Photo: Anu Aggarwal
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Pankaj Pandey
पंकज पाण्डेय

मनोरंजन डेस्क। 1990 में महेश भट्ट की फ़िल्म आई थी -आशिकी। इस फ़िल्म ने एक मामूली शक्ल-सूरत की साधारण सी दिखने वाली एक लड़की को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया था। वह सुपरस्टार थी- अनु अग्रवाल।

आज 11 जनवरी को अनु अग्रवाल का जन्मदिन है। आज 49 वर्ष की हो चुकी अभिनेत्री अनु अग्रवाल की शोहरत की बुलंदी से गुमनामी तक के उनके सफर पर जन्मदिन  के बहाने एक चर्चा करते है क्योंकि उनका आज तक का सफर जितना दर्दनाक है उतना ही प्रेरणास्पद भी।



1990 में आई फ़िल्म ‘आशिकी’ के पोस्टर पर एक कोट से खुद को ढके एक जोड़ा एक दूसरे को चूमते हुए दिखाया गया था। यह दृश्य  उस समय के युवाओं के दिलोदिमाग पर छा गया था। नदीम-श्रवण के संगीत से सजी इस फ़िल्म के गीत “मैं दुनिया भुला दूँगा तेरी चाहत मे”, “तू मेरी जिंदगी है”, और ‘धीरे-धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना’ हर युवाओं के जुबान पर ऐसी चढ़ी की जो वर्षों बरस चढ़ी रही। मगर हम भूल गए तो उस अभिनेत्री को जिसपर यह गाना फिल्माया गया था।

11 जनवरी 1969 को दिल्ली में पैदा हुई अनु अग्रवाल उस समय दिल्ली यूनिवर्सिटी से सोशल साइंस की पढ़ाई कर रही थीं, जब महेश भट्ट ने उन्हें अपनी आने वाली म्यूजिकल फ़िल्म ‘आशिकी’ में पहला ब्रेक दिया। यह फ़िल्म ज़बरदस्त कामयाब रही और महज 21 वर्ष की उम्र में एक्टिंग की दुनिया में कदम रखने वाली अनु ने पहली ही फ़िल्म से अपनी मासूमियत, संजीदगी और बहेतरीन अभिनय से लोगों के दिलोदिमाग पर छा गई।


पहली फ़िल्म की कामयाबी इतनी बड़ी थी कि दर्शक उसके अगली फिल्म से उससे ज्यादा अपेक्षा कर ली। नतीजा बाद में आई उनकी फ़िल्म ‘गजब तमाशा’, ‘खलनायिका’, ‘किंग अंकल’, ‘कन्यादान’ और ‘रिटर्न टू ज्वेल थीफ़’ कब पर्दे पर आईं और चली गईं, दर्शकों को पता ही नहीं चला! इस बीच उन्होंने एक तमिल फ़िल्म ‘थिरुदा-थिरुदा’ में भी काम किया।

यहां तक अनु ने एक शॉर्ट फ़िल्म ‘द क्लाऊड डोर’ भी की लेकिन, पहली सफलता की आभा इतनी विशाल और चकाचौंध वाली थी अनु  की शेष फिल्मे उस रौशनी में गायब हो गई और शायद इसलिए 1996 आते -आते अनु बड़े पर्दे से गायब हो गईं और उन्होंने अपना रुख योग और अध्यात्म की तरफ़ कर लिया।


जिंदगी के थपेड़े सहना उसके लिए अभी भी शेष था। 1999 में अनु की लाइफ में बड़ा तूफ़ान आया,वह भयंकर सड़क दुघटर्ना की शिकार हो गयीं। इस हादसे में न सिर्फ़ उनकी यादाश्त चली गई बल्कि  वह चलने-फिरने में भी अक्षम (पैरालाइज़्ड) हो गई। 29 दिनों तक कोमा में रहने के बाद जब अनु होश में आईं, तो वह खुद को पूरी तरह से भूल चुकी थीं।

लोगों का कहना है कि लगभग 3 वर्ष चले लंबे उपचार के बाद वे अपनी धुंधली यादों को जानने में सफ़ल हो पाईं। जब वो धीरे-धीरे सामान्य हुईं तो उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया और उन्होंने अपनी सारी संपत्ति दान करके संन्यास की राह चुन ली। फिल्मी दुनिया को सदा के लिए अलविदा कहकर अब वह बिहार के मुंगेर जिले में अकेले रहती हैं और लोगों को योग सिखाती हैं।

साल 2015 में वह एकबार फिर तब चर्चा में आई जब उनकी आत्‍मकथा ‘अनयूजवल: मेमोइर ऑफ़ ए गर्ल हू केम बैक फ्रॉम डेड’ बाजार में आई।

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