तालीम क्या है?

Rakesh Roy- Janmanchnews.com
Rakesh Roy
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राकेश रॉय,

महात्मा गाँधी ‘हिन्द स्वराज’ से…

शिक्षा : तालीम का अर्थ क्या है? अगर इसका अर्थ सिर्फ अक्षर-ज्ञान ही है, तो यह एक साधना जैसी हीं हुई| उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा भी हो सकता है| जैसा की हमसब जानते है एक शस्त्र  से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है|

अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही  हाल है| हमारे समाज में बहुत से लोग इसका बुरा उपयोग करते है, यह तो हम देखते हीं है| इसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते है| यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है की अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है|

शिक्षा को आज साधारण अक्षर-ज्ञान हीं मान लिया गया है| जिसमे लोगों को पढना-लिखना और हिसाब करना सिखाना हीं इसका मुख्य उद्धेश्य बन गया है| और इसे हीं आज के सन्दर्भ में हमलोग बुनियादी/ प्राथमिक/ प्रायमरी-शिक्षा कहने लगे है| अब उदाहरण स्वरुप अगर मै एक किसान  की बात करता हूँ जो की ईमानदारी से खुद खेती करके रोटी कमाता है| उसे मामूली तौर पर दुनियादारी की स्व-ज्ञान है|

जैसे की अपने माता-पिता के साथ कैसे बर्ताव करना है, अपने पत्नी के साथ कैसे पेश आना है,अपने बच्चो के सामने किस तरह के आदर्श प्रस्तुत करना है, जिस समाज में वह पला-बढ़ा और बसा है, वहा की रहन-सहन और चल-चलन कैसी होनी चाहिए, इन सभी सामाजिक और व्यावहारिक बातों का उसे खूब ज्ञान है| वह नीति (प्रकृति) के नियम को समझता है और उनका  बखूबी पालन करता है| लेकिन उसे अपना दस्तख़त करने नही आता|

ऐसी स्थिति में  उस आदमी को अक्षर-ज्ञान देकर आप क्या करना चाहते है?उसके सुख में आप कौनसी बढ़ोतरी करेंगे ?क्या आप उसकी झोंपड़ी या हालत के बारे में उसके मन में असंतोष पैदा करना चाहते है? अगर आपका इरादा उस किसान के साथ ऐसा करने का नही है तो उसे अक्षर ज्ञान देने की ज़रूरत नही है|

पश्चिमी प्रभाव में आकर हमलोगों ने ये बात चलायी है की लोगों को शिक्षा देनी चाहिए| लेकिन उसके बारे में हमने आगे-पीछे की बातें सोची हीं नही| अगर आज के सन्दर्भ में हम उच्च-शिक्षा की बात करें तो मैंने भूगोल सिखा, खगोल (आकाश में तारों/ ग्रहों की गणना), बीजगणित (एल्जेब्रा)भी मुझे आता है, रेखा गणित (ज्यामेट्रि) का ज्ञान भी हासिल किया, भूगर्भ विद्या को भी मैं पी गया, लेकिन उस से क्या?

उससे मैने अपना कौन सा भला किया?अपने आस-पास के लोगों का क्या भला किया? किस मकसद से मैंने वह ज्ञान हासिल किया?उससे मुझे क्या फायदा हुआ?

कभी सोचा है आपने…?

एक अंग्रेज विद्वान (ह्क्सली) ने शिक्षा के बारे में ऐसा कहा है की:

‘उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसके शरीर को ऐसी आदत डाली गई है की वह उसके वस में रहता है, जिसका शरीर चैन से और आसानी से उसे सौपा हुआ काम करता है|

उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पाई है, जिसकी बुद्धि शुद्ध,शांत और न्यायदर्शी है| उसने सच्ची शिक्षा पाई है जिसका मन कुदरती कानूनों से भरा है और उसकी इन्द्रियां उसके वस में है, जिसके मन की भावनायें बिल्कुल शुद्ध है, जिसे नीच कर्मो से नफरत है और जो दुसरो को अपने जैसा मानता है|

ऐसा आदमी हीं सच्चा शिक्षित( तालीमशुदा) माना जायेगा, क्योंकी वह कुदरत के कानून के मुताबिक़ चलता है| और इस तरह कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वो कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा|

अगर यही सच्ची शिक्षा है तो मै कसम खाकर कहूँगा की उपर्युक्त शास्त्र जो मैंने ऊपर गिनाएं है, उनका उपयोग मेरे शरीर या मेरी इन्द्रियों को कभी भी वस में करने के लिए मुझे नहीं करना पड़ा| इसलिए प्राथमिक शिक्षा को लीजिये या उच्च शिक्षा को, उसका संबंध मुख्य बात से नही होता।

अतः इससे हम सच्चे मायने में मनुष्य नही बनते, और इस से हम अपना कर्तव्य नही जान सकते| तो मनुष्य होने के के नाते हमें यह बात जरुर सोचना चाहिए ,की हम लोग किस कदर शिक्षित है? और उस शिक्षा का हमारे जीवन के साथ-साथ दूसरों के जीवन में कैसा प्रभाव पड़ रहा है?

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