बेटी…एक मासूम एहसास

Daughter
Janmanchnews.com
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Mithiliesh Pathak
मिथिलेश पाठक
विचार: एक बेटी ने अपने पिता से एक बहुत ही प्यारा सा सवाल किया कि- पापा घर के आंगन में यह जो पेड़ लगा है उसे पीछे वाले बगीचे में लगा दे तो…? पिता असमंजस में और आश्चर्य में होते हुए बोले बेटी ये चार साल पुराना पेड़ है नई जगह, नई मिट्टी में कैसे ढल पायेगा, यह हो पाना मुश्किल होगा।

तब बेटी ने नीरभरी आंखों से पिता से फिर सवाल किया- कि एक पौधा और भी तो है आपके आंगन का जो बाईस बरस पुराना है क्या वो नई जगह पर ढल पाएगा..? पिता बेटी की बात पर सोचते हुए कहा कि यह शक्ति पुरी कायनात में सिर्फ नारी के पास ही है जो कल्पवृक्ष से कम नही है। खुद को नए माहौल में ढालकर औरों कि सेवा करती है। ताउम्र उनके लिए जीती है।

जी हां बेटी ही है जिसे आज का समाज अपनाना नही चाहता, उसके पैदा होते ही कई घरों से खुशियां गायब हो जाती हैं और बेटे-बेटियों में भेद भाव होने लगते हैं। बेटे जो मन में आये करें लेकिन एक बेटी घर के बाहर कदम भी निकाल दे तो घर वाले जीना दूभर कर दें…यही बेटियां चांद तक जा पहुंची हैं। हर कदम पर मर्दों से बराबरी कर रही हैं। फिर भी आज भी 21 वीं सदी में भी बेटियों की पैदाईश को अभिशाप माना जा रहा है।

बेटे के जन्म लेने पर घर में खुशियां मनाई जाती है परन्तु बेटी के पैदा होने पर पूरा घर शोक में डूब जाता है।

एक कल्पना भर कीजिये कि काश बेटियों का जन्म न होता तो क्या सृष्टि चल रही होती, ऐसे बालक किस कोख से जन्म लेते जिनपर सबको गुमान है।

बेटियां जिन की पैदाइश होने से ही वे भार लगने लगती हैं, उन्हीं बेटियों को कई बार नई जिंदगी मिलती है। वर्षों माँ बाप भाई बहन के साथ रहने वाली बेटी अचानक एक ऐसे घर में अपना सब कुछ छोड़कर चली जाती है और एक नए जिंदगी में कदम रखती है। यहां का वातावरण बेटी के लिए बिल्कुल नया होता है, रहन सहन सब कुछ बदला बदला नज़र आता है और इसी परिवेश में बेटी को खुद को ढालना पड़ता है।

कई बार तो इन बेटियों की जिंदगी ससुराल में नरक बना दी जाती है। सुबह सवेरे से देर रात तक उससे नौकरानी की तरह काम लिया जाता है, जो अपने मां बाप की लालड़ी बेटी थी वही सब दर्द अपने सीने में समेटे चुपचाप सहती चली जाती है। इसी बीच उसे फिर एक नई जिंदगी मिलती है जब वह मां बनती है, तो उसकी नई जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं।

आखिरकार इन बेटियों को कब बराबरी का हक मिलेगा, समाज में फैला भेदभाव कब समाप्त होगा, यह बड़ा सवाल आज भी सुरसा की तरह मुंह फैलाये खड़ा हुआ है।

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