मां… मैं वहीं खड़ा हूं, जहां तू मुझे छोड़ गई!!!

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Vishwa Vivek Bharti
विश्व विवेक भारती की कलम से

मां… मैं वहीं खड़ा हूं, जहां तू मुझे छोड़ गई,

फिर, जिंदगी की डोर मैंने अपनों से बांध ली!

अपनों ने सौदा कर, मेरी डोर काट दी,

कटी पतंग सी मेरी जिंदगी हवा में बिखरने लगी!

दिया सहारा उसने जिसके हाथों मुझे सौंप गई,

हौसला, साहस, हिम्मत दो मां, फिर से खड़ा हो सकूं!

साबित कर दूं तेरे बेटे को रिश्तों का व्यापार नहीं हरा सका, 

नहीं तोड़ सका वक्त के थपेड़ों नें,

धोखे के आंधियों ने,

विश्वासघात के हथोरों ने!

लालच के बाजार में, नहीं किया  सौदा,

तेरे संघर्ष विश्वास का!

सत्य इमान के साथ खड़ा हूं मां,

अकेले सबसे दूर!

आजा मां कर दे मेरे सपने मंजूर!

vishwavivekbharti@gmail.com

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