दलाली करने वाले या तो दलाली छोड़ दें या पत्रकारिता

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कुछ पत्रकारों पर मेहरबानी राजनेताओं की इस कदर रहती है कि इन्हें घर बैठे राज्यसभा में पल भर में पहुंचा दिया जाता है। ये कभी कलम नहीं चलाते, इन्हें पत्रकारिता आती नहीं, लेकिन बड़े-बड़े कलमची व पालतू पत्रकार इनके लिये, वेतन भोगी बाबू या क्लर्क बन कर लिख कर इनके अखबार चलाते हैं…

Hokam Prajapati
होकम प्रजापति के विचार

विचार। पत्रकारिता पेशा या व्यवसाय नहीं, एक मिशन है, इज्जत और कार्यवाही पत्रकार की बुलंद कलम कराती है। पत्रकारिता की चर्चा, पत्रकारों की चर्चा, विशेषकर आज के वक्त में गाहे बगाहे उठती ही रहती है। किसी को कोई सम्मानित कर रहा है, तो कोई किसी को अपमानित कर रहा है। जैसे कि पत्रकार या तो पुण्य धर्म कर रहा है या घोर अपराध कर रहा है।

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आज के वक्त में किसी ईमानदार व सच्चे पत्रकार का कलम चलाना बेहद दूभर है। विशेषकर सोशल मीडिया के जमाने में तो यह तकरीबन नामुमकिन सा ही है। एक पत्रकार की परिभाषा बड़ी व्यापक होती है। जिसे व्यक्त करना या परिभाषा के दायरे में बांधना लगभग नामुकिन सा है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पत्रकारिता की जो भूमिका रही। वह उन क्रातिकारियों के बलिदानों से कहीं ज्यादा ऊपर और अव्वल है। जो क्रांति करते थें, और पत्रकार अपना सब कुछ दांव पर लगा कर उनके समाचार व खबरें फैलाने का काम करके जनता में जागरूकता व उत्साह भरा करते थें।

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अंग्रेजी हुकूमत ने न जाने कितने पत्रकारों की छापा मशीनें और कागज बंडल सहित उनके लोटे थाली, घर मकान तक कुर्क कर जप्त कर जलवा दियें। मगर फिर भी बगैर धन के भी वे फिर से अपने मिशन में जुट बैठते, कई बार जेल जाते, जेल से बाहर आते, इधर उधर से कुछ जुगाड़ करके फिर अखबार छापने लगते और देश में कांति की मशाल को न केवल सुलगाते रहे बल्क‍ि उसे रोशन व ज्वलन्त बनाये रखा। उस चिंगारी की पैदा होती रही ज्वाला को आखरी तक बुझने नहीं दिया।

आज की पत्रकारिता कुछ अलग किस्म की है… आज पत्रकारिता में 5 प्रकार के वर्ग बन गये हैं। वर्गवार पत्रकारिता की जाने लगी है। पहले जहां गरीबी से जमीनी मिट्टी से कलम निकल कर चलती और सच को बयां करने में अंग्रेजी हुकूमत से सीधी टकराती थी। वह एक वर्ग था, देश भर में करीब 95 फीसदी पत्रकारों का वह वर्ग था।

1. मिशन पत्रकारिता (कलम व जमीन देश, अपनी मिट्टी, मातृभूमि के लिये समर्पित कलम चलाने वाले वे पत्रकार जो कभी किसी सम्मान, पुरस्कार, वेतन, पारिश्रामिक या प्राप्त‍ि की आकांक्षा व इच्छा न रख कर केवल अपना काम करते हैं, केवल सच बोलते हैं, सच लिखते हैं, उनके लेखन में ईमानदारी रहती है और वे सारे लोभ लालचों से दूर,अपना काम करते हैं।

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2. सम्मान/पुरस्कार के लिये काम करने वाले, कलम चलाने वाले पेशेवर धंधेबाज पत्रकार ( यह पत्रकार जब भी चाहे जिससे जहां से कुछ प्राप्त‍ि संभव हो, सम्मान या पुरस्कार मिलना संभावित हो। उसी के चरण चुम्बन व चाटुकारिता व चापलूसी करने में सदा ही कर्तव्यरत रह नतमस्तक रहते हैं। इन्हें काफी कुछ मिलता है। यह उन फिल्मों के लेखकों की मानि‍न्द होते हैं। जिन्हें पैसे के लिये या केवल सम्मान व पुरूस्कार के लिये ही फिल्म लिखना आता है।)

3. तीसरा वर्ग पत्रकारिता में धन्ना सेठों व अमीरों का वर्ग है, जिनके इशारों पर उनके अखबारों के विज्ञापन दिये-लिये जाते हैं। राज्य सरकार का जनसंपर्क विभाग से लेकर प्रेस इन्फॉरमेशन ब्यूरो हो या डी.ए.वी.पी. हो। इन्हें जब जितना चाहिये, उतना खुद व खुद मुंह मांगा मिलता है। इन पर मेहरबानी राजनेताओं की इस कदर रहती है कि इन्हें घर बैठे राज्यसभा में पल भर में पहुंचा दिया जाता है। ये कभी कलम नहीं चलाते, इन्हें पत्रकारिता आती नहीं, लेकिन बड़े-बड़े कलमची व पालतू पत्रकार इनके लिये, वेतन भोगी बाबू या क्लर्क बन कर लिख कर इनके अखबार चलाते हैं।

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इनके हर शहर से दो चार पन्ने के संस्करण बीच में फंसा कर, एक ही विज्ञापन जो एक ही अखबार में छपता है लेकिन उसका भुगतान हर शहर के संस्करण के नाम पर अलग अलग होता है और यह एक विज्ञापन का उतना गुना होता है। जितने गुने इनके दो चार पन्नों के संस्करण बीच में पड़े रहते हैं।

4. चौथे किस्म की पत्रकारिता का वर्ग… एक रैकेट व एक दलाल के रूप में काम करता है। इस वर्ग में हर उमर की हसीना से लेकर, दौलत का अंबार परोस कर, कुछ लोग पत्रकारिता की आड़ में असल पत्रकारिता या असल पत्रकारों की मेहनत मिशन व मशक्कत के साथ उनकी इज्जत और उन्हे मिलने वाला धन या सहायता हड़प जाते हैं।

तमाम कॉल गर्ल को पत्रकार बना देना, या धन देने वाले रिक्शा चलाने वालों को या शराब माफियाओं को पल भर में पत्रकार बना देना, इनके लिये चुटकियों का और दांयें-बांये हाथ का काम रहता है। चाहे जिसे जब चाहे अधि‍मान्यता दिलाना या छीन लेना इनके लिये इनका मूल पेशा है।

शराब, शवाब और कवाब परोसने के बादशाह, हालांकि पत्रकारिता की दुनियां में कुछ नहीं जानते,अ ब स द का भी ज्ञान नहीं रखते। मगर किसे अधिमान्यता दिलानी है। किसकी अधिमान्यता खत्म करानी है। किसे कितना विज्ञापन दिलाना है। इनके ये सिद्धहस्त होते हैं। संचालनालय जनसंपर्क से लेकर जिला जनसंपर्क कार्यालयों तक इनका माया जाल हर जगह फैला रहता है।

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सेक्स एंड भ्रष्टाचार टैक्स ऐसा कौन-सा कार्यालय है, जहां नहीं चलता। इसलिये इनका धंधा और पेशा बदस्तूर खुल कर चलता है। जम कर चलता है… ऐसे दलाल पत्रकार विभिन्न सरकारी व् प्रशासनिक अधिकारियों के जूते चाटते और उनकी दलाली करते पुलिस स्टेशनों और दूसरे विभागों में देखे जा सकते हैं।

ये दलाल दिन भर वहीं उनके दोने पत्तल और चाय की प्याली चाटते नजर आते हैं और उनके इशारे पर खुद को असली बाकी अच्छे पत्रकारों को फर्जी तक का लेबल देंने में भी नहीं चूकते।

5. पांचवां वर्ग उन पत्रकारों का है, जो पहले वाले किस्म के वर्ग की पत्रकारिता करें तो, जिसके विरूद्ध उनकी कलम चलेगी। उस पर व उसके परिवार पर जुल्म और अत्याचार का कहर न केवल उधर से टूटेगा। बल्क‍ि, इस देश में जहां बेईमानी, झूठ, फर्जीवाड़े, भ्रष्टाचार, सेक्स एंड टैक्स का साम्राज्य चहुंओर फैला हुआ है। वहां उन्हें सताया जाता है कि या तो वे खुद ही आत्महत्या कर लें या लिखना बंद कर दें। पत्रकारिता छोड़ दें। या उनकी सीधे हत्या ही करवा दी जाती है।

उनकी कलम के चारों ओर खौफ, आतंक व दहशत का जाल पसरा रहता है। पल-पल मिलती धमकियां, कभी जान से मारने की धमकियां, और मजे की बात यह कि उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं, कोई कार्यवाही नहीं ( शायद आपको ऐसे पत्रकारों के लिये अनिल कपूर की फिल्म ”नायक” याद आ जाये।)

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इनको सताने में, इनका गरीब होना, कमजोर होना, छोटा मीडिया होना….और ऊपर के वर्ग क्रमांक 2 से लेकर 4 तक का इनको अपना दुश्मन खुद ही मान लेना। ये 5 प्रकार के वर्ग आज की पत्रकारिता कर रहे हैं। पाठक या दर्शक बहुत आसानी से यह पहचान लेता है कि कौन पत्रकार किस वर्ग का है।

ये 2 नंबर से 4 नंबर तक के दलाल पत्रकारों ने पत्रकारिता की न केवल गारीमा भंग की… लुटिया डुबो दी बल्क‍ि चुटिया भी उड़ा दी। और पत्रकारिता जो एक मिशन है। उसकी खाल उधेड़ कर उसमें भूसा कर उसे धंधा एवं पेशा बना दिया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के वक्त पत्रकारों की डिग्रीयां और व्यापम-फयापम नहीं होते थे और न ये 2 नंबर से लेकर 4 नंबर तक के वर्ग होते थे, जिस पर कलम थी। जिस पर कुछ लिखने की कला व महारत थी। वह जुगाड़ लगा कर पत्रकारिता करने लगता था। उसे किसी अधि‍मान्यता की जरूरत नहीं होती थी।

उसे न अधि‍मान्यता मिलने का लालच लोभ उसकी कलम को कुंद व भोंथरा करता और न अधि‍मान्यता चली जाने या छिन जाने का खौफ उसे सता कर चमचागिरी चाटुकारिता चापलूसी भरी कलम चलवाता। न उसे किसी सम्मान के लिये या पुरूस्कार के लिये लिखना होता था, न किसी शराब, शवाब और कवाब के लिये उसकी कलम चलती।

इन हालातों पर हम एक शेर कहना चाहेंगें 

                            जो कलमें बिकतीं नहीं इस आला बाजार में, सरे राह बिकना पड़ता है उन पत्रकारों को बाजार में,  
                            जो दे नहीं सकते रकम आबरू और गर्म गोश्त के कवाब उन्हें सब कुछ गंवाना पड़ता है संसार में।।

जातिवाद, वर्गवाद जहां पत्रकारिता पर हावी हो कर हुस्न और महफिल का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। वहीं दूसरी ओर यह कहना लाजिम है, धन्ना सेठों, पैसा लुटाने वालों, और गर्म गोश्त परोसने वाले, दलाल आज की पत्रकारिता की कमान संभाले दलाली और कमाई के समन्दर में गोते लगा रहे हैं वहीं आजकल जो बात बहुत सुनने में आती है।

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वह पत्रकारों के लिये एक वेतन आयोग बनाने और सभी पत्रकारों व गैर पत्रकार कर्मचारीयों को वेतन, भत्ते और पेंशन को लेकर सामने आती है। बस एक यक्ष प्रश्न मात्र इतना सा ही है कि क्या हर मीडिया का संसाधन, आय स्त्रोत और औकात, प्रसारण संख्या मिलने वाला दो नंबर का धन क्या एक बराबर है।

क्या सारे मीडिया एक तुल्य आय संसाधन वाले हैं, और एकतुल्य कमाने वाले हैं, सीधा सा जवाब है, कोई मीडिया छोटा मीडिया है, मंझोला मीडिया है तो कोई एकल मीडिया है, कोई बड़ा और लंबा चौड़ा मीडिया हाउस है। कुल मिलाकर सबकी हालत और औकात एक बराबर नहीं है, कुछ असल व पात्र सुयोग्य अनुभवी पत्रकारों को उमर गुजर गई। मगर अधि‍मान्यता तक नहीं मिली, उनके पास देने को पैसे नहीं है, शराब शवाब और कवाब की व्यवस्था नहीं है।

पत्रकारिता का पेशा और एक स्कूल चलाने का पेशा दोनों लगभग एकतुल्य मिशन हैं। मगर जो फर्क स्कूलों में है और जो वहां होता है, वही पत्रकारिता जगत का हाल है… मिशन होकर भी पत्रकारिता में पांच वर्ग हैं।

इसी तरह स्कूल चलाने में भी ऐसे ही 5 वर्ग हैं। मगर स्कूलों में कभी वेतनमान आयोग बनाने और प्रावधान तय करने की बात तक नहीं होती। और उसी के समान समाज सेवा में जुटे पत्रकार… न केवल कहर के तमाम प्र‍हारों से गुजरते हैं बल्क‍ि जिसके विरूद्ध लिख दें उसी के दुश्मन बन जाते हैं और फिर शुरू होता है एक खेल… स्कूलों में भी ऐसा खेल है मगर कुछ कहर और दुश्मनी कम है।

अंत में ये ही कहना चाहेंगें ”पत्रकारों दलाली छोड़ो, दलालों पत्रकारिता छोड़ो”

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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