आजादी के 70 साल बाद भी राजनीति की शतरंज में फंसा अन्नदाता, दांव पर लगा उनका जीवन

farmer protest
Janmanchnews.com
Share this news...

किसानों ने कभी सोंचा भी नहीं होगा कि गांधी जयंती और लालबहादुर शास्त्री की जयंती पर उनके साथ ऐसा बर्ताव सरकार करेगी…

शिवराज सरकार ने तो निहत्थे/गरीब/मजलूम किसानों पर गोली बरसाने से भी गुरेज़ नहीं किया…

सोनू यादव “महेंद्र”
सोनू यादव “महेंद्र”

विचार। राजनैतिक पार्टियों के नेता ‘जय जवान, जय किसान’ के नाम अन्नदाता को ठगने का प्रण लेकर राजनीति में उतरते हैं। चुनावी रैलियों में गांव वालों को झूठे वादों से सराबोर कर देते हैं। देश का अन्नदाता वर्तमान से बेहतर की उम्मीद अपने-आप में समाहित करके राजनैतिक पार्टियों के बतोलेबाज नेताओं की बतोलेबाजी पर यक़ीन कर लेता है। नेताओं के हवा-हवाई वादों पर यक़ीन करने की अन्नदाता की अपनी अलग वजह है। वह भ्रष्ट और सड़ चुके सिस्टम से अघाया हुआ होता है। चुनाव आने पर मजबूर और मज़लूम किसान को झूठी ही सही लेकिन उम्मीद की एक धुंधली सी किरण दूर कंही नजर आती है, जो नेताओं की रैलियों/जनसभाओं से गुजरते हुए अंधे एवं भ्रष्ट तंत्र में विलुप्त हो जाती है।

मानसून
Late Monsoon starts making farmers stress…

किसान चुनावी रैलियों/जनसभाओं में नेताओं द्वारा सुनाए गए धाकड़ वादों के बाद भी जस-के-तस रह जाते हैं। उनकी स्थिति में रत्ती भर भी सुधार नहीं होता है। क्योंकि राजनैतिक पार्टियों का मुख्य उद्देश्य किसान को मूर्ख बनाकर उसका मत छीनना होता है न कि अन्नदाता की सामाजिक, आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाना।

किसानों के महत्वपूर्ण और जायज़ मुद्दों पर भी केन्द्र और राज्य सरकारों का अतीत से कोई स्टैंड नहीं रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से सत्तारूढ़ कांग्रेस की बात करें अथवा वर्तमान सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की या फिर प्रदेशों में सत्ता के नशे में चूर क्षेत्रीय दल सपा, बसपा, आरजेडी, जदयू, तृणमूल के अलावा दूसरे दलों की, किसी के पास किसानों के हित का ख़्याल रखने वाला विज़न दूर-दूर तक नज़र नहीं आता है।

dewas farmer
Janmanchnews.com

चुनावी मौसम में प्रत्येक राजनैतिक पार्टी के नेता का दिल किसानों के दुःख/दर्द से भरा हुआ होता है। किसानों का दुःख/दर्द नेताओं से देखा नहीं जाता है, इनको सत्ता पर बैठा दीजिए फिर आपकी सारी समस्याएं राजनेता छीन लेंगे, आपका सामाजिक और आर्थिक उत्थान शिखर पर पहुंच जाएगा। लेकिन यह सारे झूठे सपनें सत्ता से बेदख़ल होने पर यानी विपक्ष में रहते हुए ही दिखाए जाते हैं। जैसे ही इन नेताओं को सत्ता की कुर्सी मिल जाएगी। अन्नदाता की समस्याओं को किनारे पर ठेल दिया जाएगा। पांच साल तक एयरकंडीशनर कमरे में बैठकर किसान हितों पर लम्बी-चौड़ी बतोलेबाजी जारी रहेगी। इसके अलावा जमीनीस्तर पर परिणाम ऋणात्मक या फिर शून्य ही रहेगा।

हालांकि मुफ़्त की रोटियां तोड़ने वाले राजनैतिक पार्टीयों के नेताओं को बख़ूबी पता है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है जिसकी 70 फ़ीसदी आबादी कृषि पर आधारित है। परन्तु यह भी एक सत्य है कि इतनी बड़ी जनसंख्या के कृषि पर निर्भर रहने के बावजूद भी हमारे देश में कोई कृषि नीति नहीं है। कृषि कार्य निरन्तर घाटे का सौदा होता चला जा रहा है। हमारी कृषि व्यवस्था में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुए हैं। आज भी 55 प्रतिशत कृषि मानसून पर आधारित है। कई वैज्ञानिक खोजों और सुख सुविधाओं के साधन जुटा लेने के पश्चात भी कृषि कार्य परम्परागत रूप से ही हो रहा है।

indian farmer
Janmanchnews.com

यही कारण है कि जनसंख्या का 70 प्रतिशत भाग कृषि कार्य में कार्यरत रहने के बावजूद कृषि क्षेत्र से देश के सकल घरेलू उत्पाद में मात्र 14 – 16 प्रतिशत का ही योगदान हो पाता है।

किसानों की यह दुर्दशा कोई नयी बात नहीं है। भारत में प्राचीन काल से ही किसान सर्वाधिक पीड़ित व शोषित रहा है। किसान अत्यन्त धैर्यवान समुदाय है परन्तु जब उसका धैर्य टूट जाता है तो उनका आन्दोलित होना स्वाभाविक है। किसानों के इन आन्दोलनों की पृष्ठभूमि 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम से आरम्भ हो जाती है। अँग्रेजों के उपनिवेशवादी शोषण का कहर भारतीय किसानों पर ही सबसे ज्यादा बरपा। औपनिवेशिक आर्थिक नीतियां, भू-राजस्व की नई प्रणाली और उपनिवेशवादी प्रशासनिक व न्यायिक व्यवस्था ने किसानों की कमर तोड़ दी।

फिर दस्तकारी उद्योगों के तबाह हो जाने से इन उद्योगों में लगे लोग भी खेती की तरफ वापस लौटने पर मजबूर हुए, जिससे खेती लायक जमीन पर दबाव भी काफी बढ़ गया और इस तरह कृषि का पूरा-का-पूरा ढांचा ही बदलने लगा। बड़ी जमींदारी वाले इलाकों में किसानों पर अत्याचार बढ़ने लगे। जमींदार उनसे मनमाने ढंग से अवैध लगान वसूलते और बेगार कराते। रैयतवारी इलाकों में लगान की दरें बेतहाशा बढ़ा दी गईं, ठीक यही काम सरकार ने किया।

farmer
Janmanchnews.com

नतीजा यह हुआ कि किसान धीरे-धीरे महाजनों के चंगुल में फंसते गए और इस तरह उनकी जमीन, फसलें और पशु उनके हाथ से निकलकर जमींदारों/व्यापारियों/महाजनों और धनी किसानों के हाथ में पहुँचते गए जमीन के मालिक छोटे किसान की हैसियत महज काश्तकारों, बंटाईदारों और खेतिहार मजदूरों की ही रह गई।

आज जब हमनें आज़ादी के 72 बरस पूर्ण कर लिए हैं इसके बावजूद किसानों की स्थिति उन्नीस-बीस ही बनी हुई है। उनकी उपज का वाजिब मूल्य भी उन्हें प्राप्त नहीं हो पा रहा है। विकास के नाम पर किसानों की भूमि अधिग्रहण कर पूंजीपतियों को भेंट की जाने की भरमार उफ़ान पर है। सूदखोरों और कर्ज के जंजाल से उन्हें मुक्ति नहीं मिल पायी है। सरकारी प्रयासों से इतना अवश्य हुआ कि उसे बैंकों से कम ब्याज पर पैसा जरूर मिला पर उस ऋण को स्वीकृत कराने में बैंकों के कई चक्कर लगाने पड़े। इसके अतिरिक्त सरकारी तन्त्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने उसे रिश्वत देने के लिए बाध्य कर दिया।

इस प्रकार कम ब्याज पर किसान को ऋण उपलब्ध कराने का सरकारी प्रयास बैंक अधिकारियों व कर्मचारियों के व्यक्तिगत लाभ का सौदा बन गया। आजादी के बाद की सरकारों ने किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान न देकर पूंजीवाद आधारित नीतियों को प्रश्रय दिया।

वर्तमान सन्दर्भ में मध्य प्रदेश के किसान आन्दोलन और पिछले महीने यानी 22 सितंबर से देश के कोने-कोने/छोटे-छोटे गांवों का किसान पैदल चलकर 2 अक्टूबर को किसान घाट पहुंचकर ‘किसान क्रांति यात्रा’ में शामिल हो कर सरकार को अपनी दुःख तकलीफ़ बताने के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन को इक्क्ठा हुए किसानों पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि किसानों के प्रति वर्तमान सरकारों का रवैया ब्रिटिशराज की तरह दमनकारी ही है।

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने तो निहत्थे/गरीब/मजलूम किसानों पर गोली बरसाने से भी गुरेज़ नहीं किया। इस बर्बरता और दमनकारी रवैये के चलते कई किसानों की जान चली गई/कई परिवार बेसहारा हो गए/उनके बच्चे अनाथ हो गए। लेकिन तानाशाह सरकार टस-से-मस नही हुई। किसानों की मांगों के बदले उन्हें अगर कुछ मिला तो बन्दूक से निकली गोलियां जिनकी रफ़्तार 140 किमी/घण्टा से भी ऊपर रही होगी, निर्दोष किसानों की छाती छलनी कर निकल गईं।

किसानों
File Photo: Farmers Protest…

ऐसा ही बर्बरता पूर्ण मंजर 2 अक्टूबर को दिल्ली बॉर्डर पर पूरे देश ने देखा। किसानों पर जवानों ने लाठियां भांजी/आंसू गैस के गोले छोड़े/वाटर कैनन छोड़ा गया। सैकड़ों किसान लहू-लुहान हो गए। उनका मनोबल टूट गया। उन्हें हताशा ने अपने आगोश में ले लिया। अन्नदाता के सामने लड़ो या मरो की स्थिति हो गई। सरकार पर से उनका विश्वास उठ गया। किसानों ने कभी सोंचा भी नहीं होगा कि गांधी जयंती और लालबहादुर शास्त्री की जयंती पर उनके साथ ऐसा बर्ताव सरकार करेगी। सरकार किसानों की मांगों को मानती अथवा नही यह बाद की बात थी लेकिन जिस तरह से किसानों पर ब्रिटिश हुकुम जैसा बर्ताव किया गया है यह एक जिम्मेदार सरकार द्वारा उठाया गया निहायत ही गैरजिम्मेदाराना/बेहूदा कदम है। भविष्य में इसके परिणाम सकारात्मक तो नही आएंगे।

दूसरी तरफ़ कर्ज के बोझ, फसल का वाजिब मूल्य न मिल पाने और निरन्तर घाटे में चल रहा किसान आज आत्महत्या को विवश है। कॉर्पोरेट जगत, राजनेता और बैंक तन्त्र के चंगुल से निकलने का किसानों का प्रयास असफल होता दिख रहा है। ऐसी निरीह स्थिति में किसान आत्महत्या को विवश हैं। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के किसान आन्दोलनों में किसान शहरों की ओर पलायन कर रहे थे या सरकारों से संघर्ष कर मुक्ति का मार्ग खोज रहे थे।

परन्तु वर्तमान स्थिति इतनी भयावह है कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। वैश्विक बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट ने हालत खराब की है, जबकि सरकार का जोर महंगाई रोकने पर लगा रहा, जिसके चलते फसलों के समर्थन मूल्य में मामूली बढ़ोतरी की गई। सरकारी खरीद की सुविधा बढ़ाने के बजाय कमोडिटी एक्सचेंजों में वायदा कारोबार और निजी क्षेत्र पर भरोसा किया गया। उसके बाद तो देश के कई हिस्सों से सिर्फ किसानों के कर्ज के जाल में फंसने और खुदकुशी करने की खबरें ही आती रहीं।

farmer committed suicide
Janmanchnews.com

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक 1995 से करीब 3 लाख 40 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इनमें ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान हैं।

हाल के कुछ वर्षों में उद्योगों और गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों के घटने से खेत-मजदूरों की खुदकुशी भी बढ़ने लगी है। केन्द्र सरकार के मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट में रखे गए आंकड़ों के मुताबिक हर साल कृषि क्षेत्र में 12,000 से ज्यादा लोग आत्महत्या कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2015 में कृषि क्षेत्र में कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की है, जिनमें 8,007 किसान और 4,595 कृषि मजदूर हैं।

महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने जान दी है। उसके बाद कर्नाटक में 1,569, तेलंगाना में 1,400, मध्यप्रदेश में 1,290, छत्तीसगढ़ में 954, आंध्रप्रदेश में 916 और तमिलनाडु में 606 किसानों ने आत्महत्या की है। किसानों की आत्महत्याओं से जुडे़ 87.5 फीसदी मामले इन्हीं सात राज्यों में सामने आए हैं।

अर्थशास्त्री किसानों की ऋण माफी के खिलाफ हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की पूर्व चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य और कई अर्थशास्त्री किसानों की कर्ज माफी के खिलाफ माहौल बनाने में जुटे रहते हैं। बैंक ऑफ़ अमेरिका के मौरिल लिंच ने एक रिपोर्ट में 2019 के आम चुनाव से पहले राज्यों द्वारा जीडीपी के दो फीसदी (करीब 2.57 लाख करोड़ रुपये) के बराबर कृषि ऋण माफी की उम्मीद जताई, जिससे बैंकों की बैलेंस शीट पर बुरा असर पड़ेगा।

आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने किसानों की कर्ज माफी को ‘ नैतिक त्रासदी ’ करार दिया है जबकि एसबीआई की पूर्व प्रमुख अरुंधति भट्टाचार्य ने इसे कर्ज अनुशासन बिगाड़ने वाला कदम बताया। तीन साल में कार्पोरेट जगत को मिले करीब 17.5 लाख करोड़ रुपये के फायदों, जान-बूझकर बैंकों को करीब 56 हजार करोड़ रुपये का कर्ज दबाने वाले 5,275 डिफाल्टरों और बैंकों के करीब 6.8 लाख करोड़ रुपये के डूबते कर्ज को देखते हुए इन अर्थशास्त्रियों का किसानों के प्रति एकदम विरोधाभासी रुख सामने आता है। तब न तो कर्ज अनुशासन का मुद्दा उठता है और न ही बैंकों की बैलेंस शीट की फिक्र होती। यदि कार्पोरेट्स का कर्ज माफ करना आर्थिक समझदारी है तो फिर किसानों के कर्ज माफ करना गलत कैसे हो सकता है…?

पूंजीपति, सरकार और कार्पोरेट जगत द्वारा संचालित मीडिया एवं उनके समर्थक अर्थशास्त्री किसानों की ऋण माफी का विरोध करते हैं। जबकि दूसरी ओर यही तन्त्र उद्योगपतियों की ऋण माफी का समर्थन करता है और उन्हें छूट दिलाकर उस धनराशि में अपना हिस्सा बंटाकर स्विस बैंक में जमा करता है। बड़ी चतुराई से उसका बोझ भारतीय नागरिकों पर डालकर अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर लिया जाता है। राजनेता जनता को धर्म और जाति के मुद्दों में उलझाकर इन पूंजीपतियों से धन प्राप्त कर अपनी कुर्सी बचाए रखते हैं। अक्सर कृषि ऋण माफी का विरोध इस आधार पर किया जाता है कि ऐसा होने से किसान कर्ज चुकाना ही बंद कर देंगे। लेकिन आरबीआई के आंकड़े अलग ही तस्वीर पेश करते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2015-16 में कृषि क्षेत्र का 7.4 फीसदी कर्ज दबाव में है, यानी जिन्हें लौटाना मुश्किल हो रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में ऐसा कर्ज 19.4 फीसदी है यानी कर्ज लौटाने के मामले में किसान का रिकार्ड उद्योगपतियों के मुकाबले कहीं बेहतर है। आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2016 में केवल छह फीसदी कृषि कर्ज में डिफ़ॉल्ट हुआ, जबकि कंपनियों ने 14 फीसदी कर्जों में डिफ़ॉल्ट किया।

उन्नीसवीं सदी में जहाँ किसानों के आन्दोलन विद्रोह पर केन्द्रित थे वहीं इक्कीसवीं सदी के किसान आत्महत्या करने को विवश हैं। आज किसानों को अपनी मुक्ति का कोई मार्ग दिखायी नहीं दे रहा है। खाद्य पदार्थों की आयात-निर्यात नीति का निर्धारण सरकार द्वारा किसानों के हितों पर आधारित न होकर उद्योगपतियों के लाभ पर आधारित है। अतः किसान अपने जीवन को बनाए रखने के लिए आजादी के इतने समय के पश्चात भी आंदोलन करने को विवश हैं।

Farmer condition
Janmanchnews.com

अंत में एक बात स्पष्ट करना चाहूंगा ‘राजनैतिक पार्टीयों के नेता किसान के हमदर्द विपक्ष में रहते ही बनने को लबरेज़ दिखते हैं फिर चाहे किसानों की आय दोगुनी करने का क्षद्मदंभ भरने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी हों, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की बात करें जो किसानों की दुर्दशा में अपना सर्वोच्च योगदान अर्पित करने वाली पार्टी के सबसे बड़े नेता बने फिरते हैं अथवा क्षेत्रीय दलों में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की बात की जाए, जिनके शासन काल में किसानों के गन्ना मूल्य का भुगतान न होने पर अन्नदाता आत्महत्या करने को विवश थे।

बसपा सुप्रीमो मायावती की बात करें, जिनके शासनकाल में किसानों को खाद के लिए भी लाठियां झेलनी पड़ी थी। बिहार की राजनीति में सक्रिय व वर्तमान में तेजतर्रार विपक्षी नेता तेजस्वी यादव को ले लीजिए उनके राज्य में भी किसानों की आत्महत्या के मामले चौंकाने वाले हैं।’

काश नेता खाते समय जब रोटी तोड़े तो पहले सिर झुकाकर गेहूँ के पौधे को याद कर लेते। हर कौर के साथ गेंहू के पौधे के पास खड़े, धूप में जलते, पसीने में तराबोर किसान को भी याद करते। रोटी के हर निवाले में किसान की मेहनत का भान होता। किसान फिक्र और उसके श्रम का ज्ञान होता। किसान का दर्द समूची कायनात का दुःख है, किसानों को भूलकर हम धरती के साथ एक निकृष्ट, अक्षम्य पाप कर रहे हैं, इसका भान हो जाता। विकास के तर्क बाद में, पहले तो इस हकीकत को स्वीकारने की सोचते। किसान इस देश की आबादी का बड़ा हिस्सा हैं।

अन्नदाता बड़ी संख्या में गलत नीतियों से उपजे भय और असुरक्षा के कारण ख़ुदकुशी कर रहे हैं। सरकार को बिना देर किए किसानों को कुछ राहतें देनी होंगी। उपज का सही मूल्य, आसान शर्तों पर कर्ज और आपदा के समय सहायता जल्द-से-जल्द दी जानी चाहिए। इससे बड़ी और कौन सी विपदा होगी कि आपके देश की आधी आबादी दुर्दिन में जी रही है और आप कुछ नहीं कर रहे हैं। सतही तौर पर माफ़ी मांगने और टीवी चैनल्स पर बुक्का फाड़ कर रोना आसान है, लेकिन सियासत से ऊपर उठकर जनहित में ठोस काम करना बेहद मुश्किल।

Share this news...

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फॉलो करें।