जातीय नेताओं के बहकावे में आखिर कब तक भ्रमित रहेंगे दलित-अगड़े?

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Betab Ahmad
बेताब अहमद की कलम से…

विचार। हाल ही में बाबा साहब का जन्मदिन था, अगले वर्ष आमसभा चुनाव है इसलिए प्रायः सभी राजनीतिक दल के नेताओं ने जय भीम जय भीम का खेल खुब खेला। इस खेल में खुद को अवौल दिखाने की सबने अथक प्रयास अपने शातिर शब्द वाणों के माध्यम से खुब किया। स्वर्ण, पिछड़ा, अतिपिछड़ा, दलित और महादलित किसी वर्ग के नेता ने इसमें कोई कमी नही की। ताकि अगामी लोकसभा चुनाव में हम दलित वर्ग का अधिक से अधिक मतदाताओं को अपने तरफ आकर्षित कर सकें।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसे खेल का मोहरा कब तक बनते रहेंगे देश के वंचित?

यदि अगड़े या पिछड़े वर्ग के नेताओं को दरकिनार कर भी देखे तो क्या दलित की रहनुमाई का दावा करने वाले कभी इमानदारी और त्याग की भावना से अपने वर्ग के हितों के लिए प्रयास किया? बिहार की ही चर्चा करते हैं तो दलित वर्ग के रामविलास पासवान और जीतनराम माझी जैसे नेताओं पर गौर करें जो अपने स्वजातीय के भावनाओं को भुनाकर ये लगातार अपनी राजनीतिक व आर्थिक झोली भरने का काम करते आ रहे हैं। माझी समाज का अगुआई करने निकले जीतनराम ने अपने बेटे को एमएलसी बनाने के लिए कहां कहां नहीं दौड़े?

क्या अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति व हाड़तोड़ परिश्रम के बदौलत दुनिया में माझी समाज का नाम रौशन करने वाले दशरथ माझी जैसे परिवार को सत्ता की भागीदारी दिलाकर एक राजनीतिक आदर्श प्रस्तुत नहीं सकते थे माझी? दलितों के रहनुमाई का स्वांग रचकर भाई, बेटा पुरे परिवार को सत्ता में भागीदारी दिलाने वाले रामविलास पासवान ने कभी नरसंहारों में मारे गए विधवा या अनाथ या फिर किसी निरीह लोगों को उठाकर सत्ता का स्वाद चखाने का प्रयास किया?

यही स्थिति स्वर्ण वर्ग के नेताओं का भी है। क्षत्रिय सम्मेलन कर सत्ता में पहुँच कर क्षत्रिय समाज के संवेदनशील मुद्दे पर मौन साधने वाले वीर कुँअर सिंह तथा महाराणा प्रताप की जयन्ती मनाकर स्वजातीय भावनाओं को भुनाने में लगे हैं तो भूमिहर वर्ग के नेता स्वामी सहजानंद और श्री बाबु जैसे नामों को भुनाकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं, जो इनके मूलभूत व संवेदनशील मुद्दे पर मोन साध लेते हैं। दलित व अगड़े नेताओं के स्वार्थपूर्ण चरित्र और पिछल्लगू की भूमिका ने ही इन वर्गों को सत्ता की मुख्य धारा से दरकिनार कर रखा है।

(ये लेखक के अपने विचार है।)

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