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प्रमोशन में आरक्षण का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तत्काल आदेश का श्रेय किसका? बीजेपी सरकार या दलित नेता

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ashok kumar social activist

अशोक कुमार की कलम से…

विचार। “प्रमोशन में आरक्षण’ इस आदेश का असली हकदार कौन:- सर्वोच्च न्यायालय, बीजेपी सरकार या किसी विशेष दलित नेता को जाता है? क्योंकि यह प्रश्न पूरे देश के SC/ST वर्ग के लोगों जानने की इच्छा दिल और दिमाग में कौंध रहा है। केंद्र का मोदी सरकार, या देश के दलित नेता का या स्वयं सर्वोच्च न्यायालय का किसको धन्यवाद/फूलो का गुलदस्ता भेंट करें।

देश का दलित वर्ग जानना चाहती है। जैसा की कुछ लोगों का सोच के साथ-साथ मानना है की ये आदेश केंद्र सरकार में शामिल किसी एक दलित नेता का प्रयास से सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है। यदि सही ऐसा है तो वैसे नेता को फूलो का हार पहनाकर पूरे दलित समाज के लोगों बताना चाहिये। और इस ख़ुशी में खासकर नौकरी पेशा करने वाले लोगों को अपने पूरे परिवार के साथ उन्हें मिठाई खिला बधाई देने की जरुरत है। पर एक प्रश्न उठता है यदि ऐसा नहीं तो इसे क्या समझा जाये। अपना राजनीतिक चेहरा चमकाने का अवसर या किसी खास नेता का पब्लिसिटी करना।

क्योंकि देश में NDA के सरकार में दलित नेता को देखे तो तीन, चार नेता राजनीतिक में अपना जगह बनाने में अभी तक सफल होते आ रहे हैं। पहला नेता माननीय रामविलास पासवान, दूसरा माननीय उदित राज और तीसरा माननीय रामदास अठावले तीनों तीन राज्य से आते है ये तीनों प्रमुख दलित चेहरा है।

अब ये जानना जरुरी है की इनमें से कौन नेता इस प्रमोशन में आरक्षण का पक्षधर है और कौन दुश्मन जबकि ऐसा देखा गया है। ये तीनों ने समय-समय पर आरक्षण के सवाल पर सरकार को दलितों का पक्ष पर अपना विचार देते आ रहे हैं। भले दबे जुवान ही सही पर सभी लोगों ने इसका कार्यक्रम करके या प्रेस मिडिया के माध्यम से सरकार को आगाह करते रहे हैं।

इधर जो सर्वोच्च न्यायालय का जो तात्कालिक आदेश आया है। उसका श्रेयः लेने और देने का एक राजनितिक प्रयास शुरु हो चुका है। मुझे जो जानकारी है हो सकता है पूरी जानकारी न हो पर प्रमोशन में आरक्षण का लड़ाई देश के सभी राज्यों में विभिन्न संगठनों द्वारा लड़ा जा रहा है। ये लड़ाई नौकरी पेशा वाला ही नहीं बल्कि सभी सामाजिक, राजनितिक पार्टियों द्वारा सड़क से लेकर न्यायलय में अपने-अपने स्तर से सभी लड़ रहे हैं। जिसका परिणाम आना शुरु हो चुका है।

एक तरफ हम रात-दिन विभिन्न संगठनों के माध्यम से बीजेपी सरकार को दलित विरोधी सरकार घोषित कर रहे। पर दूसरी तरफ उसे रातों-रात अपना शुभचिंतक सरकार और दलितों का मसीहा नेता मान बैठे है और वैसे नेता के पास जाकर अपना पैरवी कर रहे और धन्यवाद दे रहे हैं। जिसका राजनितिक सोच स्वयं, परिवार और जाति से कभी उभरा ही नहीं है। वैसे नेता के पास जाकर कुछ लोग अपना फ़ोटो खीचा धन्यवाद दे रहे हैं।

हमारे दलित भाई जो नौकरी पेशा करने वाले हैं। ऐसा कर क्या सन्देश देना चाहते हैं। समाज के लोगों को क्या बताना चाहिये। यदि राजनीतिक में अपना चेहरा चमकाना चाहते हैं तो कोई बात नहीं यदि विचारधारा की बात करते हैं। उन्हें बताना चाहिये आपलोग किस विचारधारा के साथ हैं। अम्बेडकर बाद के साथ या मनुवाद के साथ।

क्योंकि देश में दलितों का और एक अहम फैसला दलित एट्रोसिटीसिटी का आने वाला है। कहीं उसे भी कुछ लोग किसी सरकार या एक विशेष नेता का अहम योगदान का इस लड़ाई का नायक न बना दे। देश के दलितों और खास कर नौजवानों, नव युवतियों से अपील है आप सब जाग कर और सजग रहे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं। लेखक अखिल भारतीय रविदास नवनिर्माण मंच के अध्यक्ष एवं अम्बेडकर रत्न मंडल संघ के महासचिव हैं।)