Sawan sesson

कहाँ गए वह सावन के झूले…?

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“सावन का महीना पवन चले जोर जियरा झूमे ऐसे जैसे वन में नाचे मोर”….

Mithiliesh Pathak

मिथिलेश पाठक

विचार: कहते हैं समय बदलते देर नहीं लगती। गांवों में एक दशक पूर्व सावन के गीतों की धुन कानों में सावन के रस घोल देती थी, जो बदले जमाने में अब यदा-कदा ही सुनाई देती है।

पहले जमाने में सावन के झूले का बड़ा महत्व था। सावन आने से पहले ही झूले की तैयारियां शुरु हो जाती थीं। लेकिन आज बगीचों का अस्तित्व ही समाप्त होने लगा है।

वृक्षों के अभाव में बगीचें बीरान से लगने लगे हैं। जिसकी वजह न तो कोई झूला झूलने की बात और न तो इन पेड़ों पर बैठने वाले मोर, पपीहे या कोयल की मधुर ध्वनि जो दिल को झकझोर देने थी, अब सुनने को भी नही मिलती है।

“सावन का महीना पवन चले जोर जियरा झूमे ऐसे जैसे वन में नाचे मोर”, किसी गीतकार ने सावन महीने से प्रेरित होकर यह गाना अपनी धुन में पिरोया था। मगर आज समय के साथ सब कुछ बदल गया। रिमझिम बारिश के साथ सावन के महीने की शुरुवात होती थी जो पूरे सावन माह तक रहती थी। समय बदलने के साथ ही साथ आज लोगों की व्यस्तता बढ़ने लगी है।

आज का इंसान इस कदर व्यस्त हो गया है झूले की तरफ देखने का समय भी नही है तो उसे डालने और व्यवस्था करने की बात ही दूर रही। अब पर्व, त्योहारों की कद्र तक देखने को नही मिलती। किसी तरह त्योहारों की रस्म अदायगी ही हो पाती है। एक समय होता था जब सावन माह के आरंभ होते ही घर के आंगन व द्वार पर लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे और महिलाएं सावन के गीतों के साथ उसका आनंद उठाती थीं।

नहीं रहे गांवों में बड़े पेड़…

आज लोगों की पेड़ों से दूरियां बढ़ गई हैं। समय के साथ पेड़ गायब होते गए और कच्चे खपरैल के मकान के स्थान पर पक्के मकान के बनने से आंगन का अस्तित्व भी लगभग समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परंपरा से गायब हो रहे हैं जिससे आने वाली पीढ़ी को महज पुराने गीतों के माध्यम से ही सावन महीने का अहसास होगा।

सावन के झूले इतिहास बन रहे…

मौजूदा समय मे अब सावन माह में झूले कुछ जगहों पर ही दिखाई देते हैं। जन्माष्टमी के पर्व पर मंदिरों में भगवान कृष्ण को झूला झुलाने की परंपरा अभी भी निभाई जा रही है। पुराने दिनों गांवों में महिलाओं की टोली रस्सियों व बांस की सहायता से पेड़ों की डालियों में झूला डालकर दिन भर झूलती थी। शाम ढलने पर महिलाओं की टोलियां पारंपरिक सावनी गीत गाते हुये अपने घरों को जाती थीं चारो तरफ सावन कजरी गीत ही सुनाई पड़ते थे समय के साथ सब बदल गया।

नव विवाहित युवतियों को बेसब्री से सावन मास का रहता था इन्तजार…

कुछ वर्ष पहले नवविवाहिताओं को शादी के बाद सावन मास का बेसब्री से इन्तजार रहता था, वहीं तीज त्योहारों के आगमन से नव नवेली दुल्हन स्वयं को यौवन की पूर्णता एवं अपने सखियों संग मिल बैठ अपने बीते पलों से रुबरु होती थीं। सावन माह के त्यौहार के नजदीक आते ही बहन बेटियां ससुराल से मायके बुला ली जाती थीं और वह आम के बगीचों में झूला डाल कर झूलतीं थीं।

झुंड के रुप में दर्जनों महिलायें इकट्ठा होकर सावन के गीत गाया करतीं थीं। सावन के दिनों की ऐसी मनमोहक पल तथा गांव-गांव नजर आने वाले झूले अब लगभग विलुप्त से होते जा रहे हैं। इसी माह में पड़ने वाले त्यौहार नागपंचमी, रक्षाबंधन आदि मनाकर ही नवविवाहिता ससुराल जाती थी।

गांवों में खत्म हुआ गुड्डा गुडियों की शादी के रिवाजों का खेल…

गुड्डा गुडियों की शादी भी महज कहावत बनकर रह गई। अब समय के साथ सब बदल गया। पहले सावन महीने में गांव की युवतियां अपनी सखी सहेली संग गाँवो में प्रचलित गुड्डा गुडियों की शादी का खेल रचाती थीं। गुड्डे की बारात बाकायदा गुड्डी वाली सहेली के घर जाती थी और पूरी रश्म अदायगी के बीच गुड्डे गुड़ियों की शादी का खेल होता है।

शादी के बाद गुड़िया गुड्डे के संग विदा होकर ससुराल आती थी। इन खेलों के माध्यम से आपसी रिश्तों की गहराई और प्यार मुहब्बत की बरसात होती थी। गांव के लोग मिलकर एक दूसरे के सुख दुख में साथ रहते थे। अब यह सब कुछ सिर्फ भोजपुरी फिल्मों में ही दिखाई पड़ता है। वास्तविक जीवन इससे काफी दूर दिखाई पड़ रहा है।

(लेखक, ब्यूरो प्रमुख श्रावस्ती, उत्तरप्रदेश से जनमंच न्यूज के लिए कार्यरत हैं।)

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