थावे का ऐतिहासिक दुर्गा माता मन्दिर जहाँ चैत नवरात्र में देश के कई राज्यों के भक्तों का होता है आगमन

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Rajnish
रजनीश

गोपालगंज। बिहार राज्य में सारन प्रमंडल अंतर्गत एक शहर एवं जिला है जो गंडक नदी के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है।भोजपुरीभाषी यह जिला मध्यकाल में चेर राजाओं तथा अंग्रेजों के समय हथुवा राज का केंद्र रहा है। गोपालगंज उत्तर बिहार का अंतिम जिला है। इसके बाद उत्तरप्रदेश राज्य की सीमा प्रारम्भ हो जाती है। गोपालगंज जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर गोपालगंज-सिवान मार्ग पर थावे नामक एक जगह है। इसी थावे में हथुआ राजा द्वारा बनबाया गया एक प्राचीन मन्दिर है जो न कि केवल बिहार बल्कि देश-विदेश में माँ थावेवाली मन्दिर के नाम से विख्यात है।

मां थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी के नाम से भी भक्तजन पुकारते हैं। देश के 52 शक्तिपीठों में से एक इस मन्दिर के बारे में ऐसी मान्यता है कि मां अपने एक भक्त रहषु के बुलावे पर असम के कमाख्या स्थान से चलकर यहां पहुंची थीं। कहा यह भी जाता है कि मां जब कमाख्या से चली और कोलकाता आई तो यहाँ वह दक्षिणेश्वर काली, पटना में मां पटन देवी, छपरा के आमी में आमी माता होते हुए थावे पहुंची और अपने भक्त रहषु के मस्तक को विभाजित करते हुए साक्षात दर्शन दिए थे।

जनश्रुतियों के मुताबिक राजा मनन सिंह हथुआ के राजा थे। वे अपने आपको मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे। गर्व होने के कारण अपने सामने वे किसी को भी मां का भक्त नहीं मानते थे। इसी क्रम में राज्य में अकाल पड़ गया और लोग खाने को तरसने लगे। थावे में मां कामख्या देवी का एक सच्चा भक्त रहषु रहता था। कथा के अनुसार रहषु मां की कृपा से दिन में जो घास काटता रात को उसी से अन्न निकल आता था। इस प्रकार से वहां के लोगों को अन्न मिलते रहने से उनपर अकाल का प्रभाव नहीं पड़ा।

राजा तक यह बात पहुंची, तो राजा को विश्वास नहीं हुआ। राजा ने रहषु को ढोंगी बताते हुए मां को बुलाने को कहा। रहषु ने कई बार राजा से प्रार्थना की कि अगर मां यहां आएंगी तो यह राज्य बर्बाद हो जाएगा।परंतु , राजा नहीं माने। रहषु की प्रार्थना पर मां कोलकता, पटना और आमी होते हुए जब यहां पहुंची तब राजा के सभी भवन गिर गए और राजा की मौत हो गई। मां ने जहां दर्शन दिए, वहां एक भव्य मंदिर है। कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी मंदिर है। मान्यता है कि जो लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं वे रहषु भगत के मंदिर में भी जरूर जाते हैं नहीं तो उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। वैसे तो यहाँ सालोंभर भक्तों का ताँता लगा रहता है। परंतु, शारदीय नवरात्र और चैत्र नवारात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है।

इसी मंदिर के पास आज भी मनन सिंह के भवनों का खंडहर भी मौजूद था। जिसे अब जीर्णोद्धार कर होटल में तब्दील कर दिया गया है।अब यहाँ दर्जनों विवाह भवन बन चुके है।विवाह भवनों में प्रतिदिन वैवाहिक कार्यक्रम होते रहते हैं। मंदिर के आसपास के लोगों के अनुसार यहां के लोग किसी भी शुभ कार्य के पूर्व और उसके पूर्ण हो जाने के बाद यहां आना नहीं भूलते। यहां मां के भक्त प्रसाद के रूप में नारियल, पेड़ा और चुनरी चढ़ाते हैं।

थावे के बुजुर्ग और मां के परमभक्त पंकज तिवारी कहते हैं कि मां के आर्शीवाद को पाने के लिए कोई महंगी चीज की आवश्यकता नहीं है। मां केवल मनुष्य की भक्ति और श्रद्धा देखती हैं। केवल उन्हें प्यार और पवित्रता की जरूरत है। वे कहते हैं कि मां की भक्ति के अनुभवों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता यह तो अमूल्य अनुभव है।

मंदिर का गर्भ गृह काफी पुराना है। तीन तरफ से जंगलों से घिरे इस मंदिर में आज तक कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। नवरात्र के सप्तमी को मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। इस दिन मंदिर में भक्त भारी संख्या में पहुंचते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 85 पर स्थित यह मन्दिर जहाँ गोपालगंज से छह किलोमीटर दूर है। वहीं सीवान जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर के पास ही देखने योग्य एक विशाल पेड़ भी है जिसका वानस्पतिक वर्गीकरण नहीं किया जा सका है।

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