धर्म के मूल में स्थित प्रेम, मैत्री, सहयोग व दया आदि का अनुपालन करना ही सच्चा धर्म है: दलाई लामा

Dalai lama
Dalai lama- Photo Courtesy: Google
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Pankaj Pandey
पंकज पाण्डेय

बोधगया। आज से 2600 वर्ष पहले भारत से ही पूरे विश्व में अहिंसा का संदेश प्रसारित हुआ था। यह भारत की विरासत है। इसे और आगे फैलाने का काम भारत के सभी लोगों को करना चाहिए। इसकी आज जरूरत भी है। यह बात बोधगया के ऐतिहासिक कालचक्र मैदान में शुक्रवार को बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने देशी-विदेशी हजारों श्रद्धालुओं को पहले चरण के त्रि-दिवसीय शिक्षण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही।

शीत लहर और घने कोहरे के बीच उनके उपदेश को सुनने के लिए देश-विदेश के लगभग 40 हजार से भी अधिक लोग इकठ्ठे हुए थे। तीन दिवसीय इस कार्यक्रम के पहले दिन बौद्ध धर्मगुरु ने प्रेम, मैत्री व करुणा को केंद्र में रखते हुए कहा कि दुनिया के सभी जीवों में सुख की कामना होती है। मनुष्य के साथ-साथ पशु व पक्षियों में भी प्रेम की भावना जागृत होती है। इस सुख की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे से प्रेम करना आवश्यक है।

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दलाई लामा ने कहा कि आधुनिक शिक्षा सुख के लिए पर्याप्त नहीं है। इसलिए आधुनिक शिक्षा में व्यावहारिक ज्ञान का समावेश जरूरी है। आज आधुनिक शिक्षण संस्थानों में व्यवहार से संबंधित प्रेम, मैत्री और करुणा का पाठ पढ़ाया जाना बेहद जरूरी है। शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों में करुणा व मैत्री का भाव पैदा करें। इससे बच्चे बड़े होकर प्रेम व करुणा के साथ ही जीवनयापन कर पायेंगे। हर तरफ शांति का माहौल होगा। तभी वास्तविक सुख की प्राप्ति होगी।

दलाई लामा ने बुद्ध के वचन व आचार्य नागार्जुन की व्याख्या का उल्लेख करते हुए कहा कि मन, शरीर व चित को नियंत्रित कर ही कोई भी धर्म के प्रति समर्पित हो सकता है। धर्म का अर्थ सिर्फ पूजा-पाठ करना नहीं बल्कि संबंधित धर्म के मूल में स्थित प्रेम, मैत्री, सहयोग व दया आदि का अनुपालन करना है।

उन्होंने बुद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि बुद्ध ने किस प्रकार छह वर्षों तक कठिन साधना की। ज्ञान की प्राप्ति की व बोधगया से चल कर सबसे पहले सारनाथ में पांच शिष्यों को उपदेश दिया। अतएव मन से क्लेश को निकाल कर, चित व आंतरिक मन को नियंत्रित कर प्रज्ञा का पालन करते हुए दु:खों से मुक्ति पा सकते हैं। दलाई लामा ने पहले दिन धर्मचक्रप्रवर्तन सूत्र व आर्यशालिस्तम्ब सूत्र पर प्रवचन दिया। आयोजन समिति से मिली जानकारी के अनुसार पहले दिन धर्म गुरु को सुनने के लिए देशी-विदेशी करीब 40 हजार श्रद्धालु व लामा उपस्थित हुए है।

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दलाई लामा ने कहा कि इतनी ठंड में सभी लोगों का एक साथ बैठना कितना अच्छा लग रहा है। तब क्यों नहीं विश्व के सभी सात अरब की आबादी आपस में प्रेम, मैत्री व करुणा के साथ एक-दूसरे के साथ व सहयोग कर जीवन को आगे बढ़ायें। बौद्ध धर्म गुरु ने कहा कि अगर हम सुख चाहते हैं तो दूसरों को मदद करना होगा। खास कर मनुष्य को सामाजिक प्राणी होने के नाते सभी को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति को जागृत करने की आज जरूरत है। छोटे-मोटे मनमुटाव को त्याग कर माफी मांग लेनी चाहिए।

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