400 वर्षों से होती आ रही है गावां काली मण्डा में चैती दुर्गा पूजा

गावां काली मण्डा
File Photo: गावां काली मण्डा
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रघुनंदन कुमार मेहता की रिपोर्ट,

गिरिडीह। गिरिडीह जिला मुख्यालय के सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्र में बसा है गावां। यहां के बहुत से धार्मिक स्थलों में अब भी मशहूर है। यहां का अद्भुत शिल्पकला से निर्मित खूबसूरत काली मंडा। इसका निर्माण 18वीं सदी के पूर्वाध में गावां के तत्कालीन टिकेत पुहकरन नारायण सिंह उस समय के प्रख्यात कारीगरों से कराया था।

लगभग 30 मीटर लंबाई एवं 30 फीट ऊंचे मंडप के दीवारों के प्लास्टर के निर्माण में सुर्खी चुना, बेल का लट्ठा, गुड़, उड़द का पानी शंख एवं सीपियों के पानी के मिश्रण का प्रयोग किया गया था। इसलिए दीवारें आज के दौर में चिकनी लगती है। मंडप के पूर्वी भाग में एक बड़ा हॉलनुमा कमरा में गावां राजघराने द्वारा दक्षिणेश्वर काली भी स्थापित है।

इस कमरे में सिर्फ राजघराने के लोग, मुख्य आचार्य, उनके समर्थक एवं नाई ही प्रवेश करते हैं। कमरे में लगभग पांच फीट ऊंचे व तीन फीट चौड़े बेल्जियम मोटे ग्लास से निर्मित दो भव्य आईने रखे हुए है। इन आइनो को दुर्गा पूजा के क्रम में बाहर निकाल कर माँ दुर्गा के प्रतिमा के अगल – बगल रखा जाता है।

1970 के दशक में राजपरिवार द्वारा काशी – विश्वनाथ से लाए गए साढ़े तीन फीट का चांदी से निर्मित चमचमाते च्यवर की चोरी चली गई थी। मंडप ऊपरी भाग में हालिया वर्षो में सीमेंट से निर्मित माँ दुर्गा की आकर्षक मूर्ति भी बनाई गई है। जो अति शोभनीय है।मंडप के सामने विस्तृत भू- भाग की सीमेंटेड कर उसकी चारदीवारी भी बना दी गई है। मंडप के पश्चिमी भाग में भी एक कमरा है। जिसमे पूजा के सामग्री आदि रखी जाती है।

गावां में कैसे शुरू हुआ चैती दुर्गा पूजा शुरुअाती दौर में शारदीय पूजा के दौरान पूजन के बाद जब माता की प्रतिमा कह नॉकी आहार में विसर्जन के बाद जब – जब उनकी प्रतिमा लाने स्थानीय लोग गए तो प्रतिमा को उठा नही पाए। जबकि उसके पूर्व अभुन्य आसानी से लोग उठा कर मंडप ले आते थे। तब चिंतित गावां के तत्कालीन टिकैत ने अपना हाथी भिजवाया पर विशाल हाथी भी प्रतिमा को हिला नही पाया यहाँ बता देना आवश्यक है।

कुछ दिन पूर्व गावां में प्लेग जैसा घातक बीमारी ने महामारी का रूप धारण कर लिया था। जिससे कई लोग काल – कलंवित्त होने लगे थे। तभी माँ दुर्गा द्वारा टिकैत को स्वपन मिला की तुम्हें अब से चैती पूजा भी करनी पड़ेगी। जिसे टिकैत ने सहरस स्वीकार कर लिया। तब से यंहा चैती पूजा होनी शुरू हुई। जो आज भी जारी है। पूजा में राजपरिवार के वरिष्ठ सदस्य बैठते है जो पूजन के क्रम में चौदस कोस की जनता के सुख शांति संवृद्धि की याचना माँ दुर्गा से करते है।

वर्तमान में यहां के मुख्य आचार्य भवेश मिश्रा व उनके सहायक अवध पांडेय है। यहां बकरे की बलि दी जाती थी। 60 के दशक तक पूजा का खर्च राजपरिवार उठाता था। पर बाद में यह सार्वजनिक कमेटी के द्वारा होता है। पूजा के दिनों पूर्व में पांच – छह दिनों का गहमागहमी भरा मेला लगता है।

भैंसों की दी जाती थी बलि पूर्व में गावां में पूजन के दौरान भैंसे की बली दी जाती थी। वर्तमान में भैंसे की बली की प्रथा खत्म हो गई हैं। इस समय प्रतिदिन बकरों की बली दी जाती है। नवमी के दिन भी सैकंडों बकरों की बली दी जाती है। पहले पुरनी आहर में कमल के फूल को पूजन के लिए उगाया जाता था। मंदिर में वही फूल चढ़ाया जाता था। इस समय तालाब में फूल समाप्त हो चुका है। प्रतिमा का विसर्जन तलाब में ही किया जाता है।

लगता है भव्य मेला दोनों नव रात्रियों के अवसर पर मंदिर परिसर में तीन दिनों तक भव्य मेला लगता है। मेले में सुदूर जंगल क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। प्रतिमा का दर्शन कर मेले का लुत्फ उठाते हैं। मेला परिसर में झूला के साथ कई सास्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है। कुल मिलाकर गावां का दुर्गा पूजा क्षेत्र में अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध है।

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