रमजान

“दिल करता है अपनी जान दे दूँ”- कांग्रेस पार्षद रमजान अली

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लोकतंत्र में जनता ही मालिक है। उसी जनता को हादसों के बाद मिलता है सिर्फ संवेदना का लालीपाप…

Shabab Khan

शबाब ख़ान (वरिष्ठ पत्रकार)

 

 

 

 

 

 

वाराणसी: शहर के काजी सादउल्लापुरा से कांग्रेस पार्षद नें कल शाम बनारस में फ्लाईओवर का एक भाग गिरने से 19 लोगो की दर्दनाम मौत पर प्रतक्रिया व्यक्त करते हुये कहा कि “भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इस लोकतंत्र मे जनता राष्‍ट्रपति, प्रधान मंत्री, मुख्य मंत्री, सांसद, विधायक, पार्षद बनाती है। जनता ही इस देश की सबसे बड़ी ताकत है।”

उन्होने कहा कि “यदि देखा जाये तो जनता कई क्लास कई श्रेणीं में बटी हुई है। जनता की एक श्रेणी को सामाजिक कार्यों से कोई सरोकार नही तो दूसरी श्रेणी ऐसी भी है जो सामाजिक तथा सरकारी कार्यों पर नज़र भी रखती है। वहीं एक खास जागृत व सुधि श्रेणी सरकारी कार्यो मे हो रही लापरवाही को उस विभाग तक शिकायत के माध्यम से, जन सूचना के माध्यम से पहुंचाती भी है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि जनता द्वारा बनाये गये जन सेवक चाहे सत्तासीन मंत्री हो या प्रशासनिक अधिकारी, शिकायतो और जन सूचनाओं को कूड़ेदान मे फेंक देते हैं। जब घटनाएं, दुर्घटनाएं हो जाती है तो ये लोग आते है संवेदना व्यक्त करते है, फोटो खिचवाते है,कुछ मुआवज़ा सरकारी कोष से बाटते हैं, अपने कोष से बाटना होता तो वह भी नही बटता। बलि के बकरे को सस्पेंड करते हैं और चले जाते है। हो गया कोरम पूरा।”

रामजान पूछते हैं “यदि जनता द्वारा की गयी शिकायतों का ठीक से संज्ञान लेकर कार्यवाही किया जाये तो घटना, दुर्घटना होने का सवाल ही नही पैदा होगा। मै एक पार्षद हूं विभिन्न विभागो से मैने जन सूचना के तहत दर्जनों सूचनाएं मांगी है। जवाब नही दिया जा रहा है। सैकड़ों शिकायते की है। कार्यवाही नही की जा रही है। एक मा० मुख्य मंत्री जी की IGRS शिकायत निवारण प्रणाली है। मुख्य मंत्री जी स्वयं मानिटरिंग करते है। इस पर शिकायत कीजिए। कुछ दिन बाद फोन आयेगा कि आपकी शिकायत का निस्तारण कर दिया गया। लो मुझे पता भी नही। कोई जांच भी नही। कोई फोन भी नही। शिकायत का निस्तारण हो गया।”

दुर्घटना पर व्यथित पार्षद नें कहा कि “जनता की शिकायतो का निवारण बिना किसी जांच, पूछताछ के कर देने वाले अधिकारियो को चार जूते मारना चाहिए। मैं अपने द्वारा की गयी शिकायतो के निस्तारण न होने तथा विभागो द्वारा जन सूचना का जवाब न देने से इतना नाराज़ हूं कि मन करता है कि अपनी जान दे दूं लेकिन यदि मै अपनी जान दे भी दूंगा तो मुझे क्या मिलेगा? सिर्फ संवेदना? काश इस संवेदना रूपी लालीपाप जो अब सार्वजनिक परम्परा बन गई है से दूसरा हादसा रूक जाता तो मैं जान भी दे देता।”