बेसहारा अनाथ गरीबों को निवाला देगा ये शख़्स, अब रोटी की मोहताज़ नहीं रहेगी जिंदगी

Ravikant tiwari
File Photo: गरीबों को भोजन कराते रविकांत
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Priyesh Kumar "Prince"
प्रियेश कुमार “प्रिंस”

गोरखपुर। समाज मे रहने वाले ऐसे कई ऐसे परिवार और जिंदगियां है जो दाने दाने के लिए मोहताज है, ऐसे बेसहारा बेबस लाचार गरीबो के लिए ये शख़्स किसी भगवान और मशीहा से कम नहीं है। मानवता की रक्षा करने और गरीबों की दिन हीन दशा को सुधारने के लिए रविकान्त तिवारी ने समाज के अंतिम आदमी तक निवाला पहुंचाने का फैसला किया है।

रविकान्त गोरखपुर जनपद के चौरी चौरा क्षेत्र के मूल निवासी है। इनका बचपन गाँव की गलियों में बिता है। खेती किसानी पशुपालन और बागवानी के साथ साथ रविकान्त जनसरोकार के कार्यो में रुचि रखते है। आज इनके पास भारत और अमेरिका में अपनी खुद की आईटी कंपनियां है। लेकिन भारतीय परिवेश और समाज से नाता पुराना होने के कारण समाज के ऐसे अनाथ बेबस बेसहारा गरीब जिंदगियों ने हमेशा इनसे सवाल किया।

फिर क्या था, रविकान्त ने राजनीति और व्यवसाय के साथ साथ जनसरोकार के मुद्दे को भी गंभीरता के साथ लिया। जिसके चलते अपने गोरखपुर जनपद के चौरी चौरा में प्रवास के दौरान ही यह फैसला लिया कि हमारे चौरी चौरा में अब कोई भी लाचार बेबस बेसहारा अनाथ दृष्टिहीन दिव्यांग गरीब रोटी की विवशता के चलते दम नही तोड़ेगा। इसके लिए रविकान्त ने एक प्लान तैयार किया और सृष्टि धर्मार्थ सेवा संस्थान के साथ मसौदा बनाकर इस काम की शुरुआत कर दी।

रविकान्त तिवारी भारत सरकार में सदस्य, सलाहकार समिति उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय से जुड़े हुए है। इस काम से जहा समाज और क्षेत्र में रविकान्त की सराहना होती है वही गरीब इन्हें अपना भगवान और मसीहा मानने लगा है। रविकान्त ने यह तय किया है कि शुरुआत के 6 महीनों तक हम इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चलाएंगे।औंर फिर आगे इसे और आधुनिक बनाते हुए कैंटीन के रूप में स्थापित करेंगे।

– रविकान्त ने बताया, ”मैं गोरखपुर जिले के चौरी चौरा का रहने वाला हूं। 

– ”मैंने गोरखपुर यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है, उसके बाद बिजनेस की प्लानिंग कर अमेरिका चला गया। एक बार अमेरिका से वापस दिल्ली उतरा तो वहां से लखनऊ मेल में सेकेंड एसी का टिकट बुक कराया । मुझे किसी काम से लखनऊ जाना था।

जब लखनऊ स्टेशन पर गाड़ी पहुंची, तो राजधानी होने के नाते मैं स्टेशन पर उतरकर घूमने लगा।तभी एक लड़की आई और बोली- बाबूजी 10 रुपए दे दो। दुबली-पतली सी थी। मुझे लगा वो मांगने वाली है। मैंने इग्नोर कर दिया। क्योंकि अक्सर सुन रखा था कि ऐसे लोग सिर्फ बातों में उलझाते हैं और जान-बूझकर भीख मांगने वाले होते हैं।”

– ”मैंने मजाकिये लहजे में पूछा, क्या करोगी पैसों का? वो बोली भूख लगी है, बाबूजी खाना चाहिए। फिर मैंने बोला- तो चलो खाना खिला दूं, लेकिन पैसे नहीं दूंगा। ”मैं स्टेशन से बाहर आकर उसे खाना खिलाया। वो बहुत भूखी थी। उसने बताया, उसने 2 दिन बाद खाना मिला है। मेरा मन भर आया था, क्योंकि मैंने उसका मजाक उड़ाया था।

लेकिन वो मुझे आशीर्वाद देकर आगे चली गई।” पर मेरे दिमाग मे बार-बार उस लड़की के शब्द और मेरे द्वारा किया गया मजाक सामने आ रहा था। मेरे मन में एक बात आई क‍ि मैं एसी गाड़ी में कम्बल और बेड पर आराम से खा पी रहा हूं। न जानें उस लड़की के जैसे और कितने लोग होंगे, जो भूखे ही रहते होंगे। उसी वक्त मैंने ऐसे लोगों के लिए कुछ करने का मन बना लिया ।

आज रविकान्त पूरी तरह इस काम मे ईमानदारी के साथ लगे हुए है। ये जब भी गोरखपुर के चौरी चौरा में होते है इस तरह के आयोजन गरीबों के लिए लगातार चलते रहते है। इनके न रहने पर इन कार्यो की जम्मेदारी सृष्टि धर्मार्थ सेवा संस्थान की रहती है।

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