जीवन की संभावनाओं को तलाशती ‘बुद्ध से कबीर तक की पैदल यात्रा’

nisha mishra and lalit pradeep
File Photo: सेवानिवृत्त रीजनल स्पोर्ट्स अफसर निशा मिश्रा एवं संयुक्त शिक्षा निदेशक (बेसिक) ललिता प्रदीप
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Priyesh Kumar "Prince"
प्रियेश कुमार “प्रिंस”

गोरखपुर डेस्क। एसएमआर ट्रस्ट की अगुवाई में पूर्वाञ्चल के दो स्थानों पर जीवन की अंतिम सांस लेने वाले दो महान विभूतियों के जीवन से प्रेरणा लेकर एक यात्रा की शुरुआत गुरुवार को की गई। कुशीनगर स्थित भगवान बुद्ध के धरती से कबीर की निर्वाण स्थली मगहर तक तीन दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में सामाजिक जीवन की संभावनाओं को तलाशा जाएगा। यह न सिर्फ जीवन को सरल और व्यापक बनाने की मुहिम है बल्कि सर्वसमाज के हित में नौजवानों और लोगों की फौज खड़ी करने का प्रयास भी है।

यात्रा में शामिल होने आयी लखनऊ की संयुक्त शिक्षा निदेशक (बेसिक) ललिता प्रदीप और सेवानिवृत्त रीजनल स्पोर्ट्स अफसर निशा मिश्रा से जनमंच न्यूज ने बातचीत कर यात्रा के उद्देश्यों की तह तक जाने का प्रयास किया।

इनके मुताबिक गुजरात कैडर के आईपीएस अफसर और एडीजीपी विनोद मल्ल की अगुवाई में बुद्ध और कबीर के उन विचारों को समाज मे फैलाना है, जिनके माध्यम से समाज मे एक रूपता का विस्तार हुआ था। श्रीमती ललिता प्रदीप की मानें तो बुद्ध और कबीर में विचारों की प्रासंगिकता आज के परिवेश में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। जिस तरह से समाज मे विद्रूपता आ रही है, वह काफी खरनाक है। समाज मे एक बार फिर उच्च और निम्न वर्ग के बीच खाई बढ़ रही है। इसे दुरुस्त करने के लिए आमजन को जागरूक करना बहुत जरूरी है।

भारतीय अध्यात्म और निर्वाण से जीवन के सफर की शुरुआत…

भारतीय अध्यात्म में जीवन के अंत से जीवन की संभावनाओं की तलाश का दर्शन छिपा है। यही वजह है कि आज भी किसी की मृत्यु पर श्मशानघाट में पीपल और तुलसी लगाने का प्रावधान है। 24 घंटे ऑक्सीजन देने वाले पीपल और तुलसी के आरोपण से भी जीवन की अक्षुण्णता बनाये रखने की कोशिश सदियों पुरानी व्यवस्था है।

यात्रा में छिपा है 2000 वर्षों का अनुभव…

ललिता प्रदीप की मानें तो ‘बुद्ध से कबीर तक’ की इस यात्रा में 2000 वर्ष का अनुभव छिपा है। इसमें न सिर्फ बुद्ध और कबीर के कार्यों को शामिल किया गया है बल्कि पूर्वांचल की धरती को अपना कर्म क्षेत्र बनाने वाले गोरक्षपीठ, अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं व सामाजिक संगठनों द्वारा सामाजिक समरसता के लिये काम करने वाले महापुरुषों के कार्यों को भी शामिल किया गया है। साहित्य और लोक-संस्कृति को आधार बनाकर जीवन की गहराईयों की समझ विकसित करने वालों की चर्चा भी होगी।

अपने विचार रखती ललिता प्रदीप….

तीन दिनों में 100 किमी की होगी पैदल यात्रा…

बुद्ध और कबीर, पूर्वांचल के दो ऐसे प्रतीक हैं, जिन्होंने सदियों पहले रूढ़ियों और मान्यताओं के दलदल में जकड़े समाज को उससे निजात दिलाने, सामाजिक सौहार्द्र और आपसी प्रेम-भावना बढ़ाने के लिए एक मुहिम छेड़ी थी। दो अलग-अलग कालखंडो में शुरू किये गए इस मुहिम का व्यापक असर सिर्फ पूर्वांचल तक सीमित न होकर देश-विदेश में निवास करने वाली मानव सभ्यताओं पर भी पड़ा था। 05 से 07 मार्च तक लगभग सौ किमी चलने वाली इस पैदल यात्रा के माध्यम से इनके विचारो को पुनः साकार करने का प्रयास हो रहा है।

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