ब्राह्मणों और ठाकुरों के वर्चस्व की लड़ाई न बन जाये गोरखपुर संसदीय उप चुनाव, मास्टर स्ट्रोक खेलने के फिराक में भाजपा

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पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के भांजे पूर्व सभापति गणेश शंकर पांडेय अगर बीजेपी में गए तो उसका निहितार्थ यह हो सकता….

Priyesh Kumar "Prince"
प्रियेश कुमार “प्रिंस”

गोरखपुर। पूर्वांचल की राजनीति के महत्वपूर्ण धु्रव को भाजपा अपने पाले में कर गोरखपुर उपचुनाव और मिशन 2019 को साधने की कोशिश में है। आमचर्चा की मानें तो बाहुबली पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के भांजे पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय को पार्टी में शामिल करा रही।

कद्दावर ब्राह्मण नेता को पाले में करके बीजेपी एक तीर से कई निशाना साध सकती है। फिलहाल, न भाजपा की ओर से इस मामले में कोई खुलकर बोल रहा न ही हाता की ओर से कोई इस मुद्दे पर कुछ कह रहा। हालांकि, पूर्वांचल में उपचुनाव के पूर्व नए समीकरण की उम्मीद राजनैतिक पंडित लगाए हुए हैं।

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विधान परिषद के सभापति रह चुके गणेश शंकर पांडेय की राजनैतिक छवि काफी लोकप्रिय है। गोरखपुर-महराजगंज की राजनीति में इनकी काफी अच्छी दखल मानी जाती है। चार बार एमएलसी रह चुके गणेश शंकर पांडेय की राजनीति में अपनी अलग पहचान होने के साथ साथ एक और पहचान है कि वह पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के भांजे हैं। ग्राम प्रधान का चुनाव जीतकर राजनीति सफर शुरू करने वाले गणेश शंकर पांडेय के भाजपा से काफी बेहतर रिश्ते रहे हैं।

फिलहाल वह बसपा की राजनीति में हैं। एमएलसी चुनाव इस बार न लड़कर वह बीते विधानसभा चुनाव में महराजगंज के पनियरा विधानसभा क्षेत्र से अपना भाग्य आजमाए थे लेकिन वह चुनाव जीत न सके।

CM Yogi Adityanath
CM Yogi Adityanath

मुख्यमंत्री बनने के बाद महंथ आदित्यनाथ द्वारा गोरखपुर संसदीय सीट से इस्तीफा देने के बाद इस सीट से कई दर्जन प्रत्याशी लड़ने को इच्छुक हैं। गोरखपुर में पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी की खासी दखल होने की वजह से इस संसदीय सीट पर हाता की ओर से गणेश शंकर पांडेय के चुनाव मैदान में आने की काफी दिनों से चर्चाएं आसमान में तैर रही है। इस कयास को और बल मिल रहे क्योंकि दशकों से पूर्वांचल की राजनीति में ब्राह्मण और ठाकुर वर्चस्व की राजनीति होती रही जिसका एक सिरा मंदिरऔर दूसरा सिरा हाता की ओर जुड़ता है।

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी के आवास हाता पर हुई छापामारी ने वर्चस्व की इस लड़ाई को नए सिरे से उभार दिया था। आलम यह कि दोनों पक्ष खुलकर तो सामने नहीं आए लेकिन किसी न किसी माध्यम से एक दूसरे पर निशाना साधते हुए नजर आए। उपचुनाव में हाता की ओर से प्रत्याशी उतारने की तैयारी भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा था।

गोरखपुर की राजनीति को जानने-समझने वाले बताते हैं कि अगर बीजेपी प्रत्याशी और हाता की ओर से अलग-अलग प्रत्याशी आए तो इनके आने से लड़ाई कांटे की हो जाएगी। वजह यह कि ब्राह्मण और ठाकुर मतों का सीधे-सीधे ध्रुवीकरण भी होगा। शायद इन सब मुद्दों पर मंथन करने के बाद बीजेपी सीधे हाता को ही साधने का मास्टर स्ट्रोक खेल दे।

हालांकि, कई जानकार यह भी मानते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चाहे बगैर बीजेपी यह कदम किसी सूरत में नहीं उठाएगी। बहरहाल, पूर्वांचल में गोरखपुर उपचुनाव की आहट के साथ ही राजनैतिक सरगर्मी अपने शबाब पर पहुचने को बेताब है। दशकों से चल रही वर्चस्व की लड़ाई को भी शायद इस चुनाव में कोई मंजिल मिल जाए। कहावत है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है न कोई दुश्मन, शायद यही कहावत सच होता दिखे।

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