हिंदी महज एक भाषा या फिर जज्बात..?

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क्षितिज पटेल की दिल की कलम से-

विचार। 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रुप में मनाया गया। एक बार फिर से हिंदी भाषा का वार्षिक समारोह आयोजित किया गया। आखिर साल में एक बार ही सही लेकिन हिंदी भाषा का आदर किया गया। आखिर ऐसा क्या है कि हिंदी अपना अस्तित्व खोती जा रही है ? हमारा देश तेजी से बदल रहा है और उसमें बदल रहा है हमारे जीवन जीने का तरीका, सोचने का नजरिया और बोलने का ढंग।

हमारी युवा पीढ़ी वैश्विक भाषा यानी कि अंग्रेजी की तरफ ऐसे अग्रसर हुई है कि उसने हिंदी भाषा की जड़ों को झकझोर कर रख दिया है। हिंदी अपना अस्तित्व देवनागरी लिपि से पाती है, हिंदी शब्द हिंदू से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है हिंद महासागर के किनारे रहने वाले लोग।इसका मतलब हिंदी उन सब जनमानस की भाषा है जो हिन्द महासागर के सानिध्य में रहते हैं।

महात्मा गांधी अपनी किताब “हिन्द स्वराज” में लिखते हैं कि “पश्चिमी सभ्यता एक चूहे की तरह है जो लगातार हमारे देश की सभ्यता को धीरे-धीरे कुतर रही है।” पश्चिमी सभ्यता का असर सिर्फ हमारे रहन सहन में ही नहीं बल्कि हमारे बोलने के अंदाज में भी हुआ है। जिसका परिणाम यह है कि जनमानस की भाषा कही जाने वाली भाषा हिंदी अपना अस्तित्व होती नजर आ रही है।

संविधान ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित किया था। भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में यह वर्णित है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के लिए राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय होगा। साल 1953 में हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का गठन किया गया। इसी के गठन दिवस पर हर 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। 

क्या सिर्फ हिंदी दिवस मना लेना, एक- दो भाषण दे देना और पत्रिकाएं बंटवाने से हिंदी भाषा बच जाएगी? हमारी युवा पीढ़ी को हिंदी की ओर आकर्षित करने के लिए हम क्या कर रहे हैं? क्या हिंदी भाषा महज एक भाषा है या फिर जज्बात…?

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