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दम तोड़ती कलम, सोद्देश्य पत्रकारिता से व्यवसाय तक

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Rahul Yadav

राहुल यादव की कलस से…

विशेष। आज ही के दिन यानी की (30 मई 1826 ई.) को हिंदी के प्रथम समाचार पत्र उदंत मार्त्तण्ड का प्रकाशन हुआ था। उदंत मार्त्तण्ड का संपादन पं. युगल किशोर ने किया। इसी दिन को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज उदंत मार्त्तण्ड के 192 वर्ष पूरे हो चुके हैं।

यह सही है कि भारत में पत्रकारिता की शुरुआत किसी धंधे के लिए, कोई मुनाफा कमाने के लिए, किसी उद्योग के नाते नहीं हुई। हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत देश में नवजागरण लाने और उस नवजाग्रत समाज को राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए तैयार करने के उद्देश्य हुई। उस वक्त ऐसे प्रोफेशनल पत्रकार थे ही नहीं जिनका कार्य मात्र एक अच्छा अखबार निकालना है हो। हमारे यहां प्रत्येक भाषा में जो बड़े मनीषी लेखक हुए उन्होंने ही अखबार में काम करना या अखबार निकालना प्रारंभ किया।

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उन्होंने अपने साहित्य द्वारा देश में चेतना फैलाने, बराबरी का समाज बनानें, मूल्यों पर चलने वाला समाज बनाने का काम किया। इस प्रकार हमारे यहां पत्रकारिता में साहित्य का संस्कार किसी भी अन्य देश की पत्रकारिता की तुलना में सबसे ज्यादा है। जिस प्रकार पहले नेता पत्रकार हुआ करते थे ठीक उसी प्रकार तब साहित्यकार ही पत्रकार हुआ करते थे। लेकिन तरीका व्यक्तित्व-कृतित्व इस तथ्य का प्रमाण है कि तीनों ने पत्रकारिता को आजीविका के रूप में स्वीकार किया।

हिंदी पत्रकारिता को पेशा और पत्र उद्योग के रूप में विकसित करने की जमीन तैयार की। उन्होंने अखबार में काम किया और श्रेष्ठ अखबार निकाले। खूब बिकने वाली पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। उन्होंने लेखन को सामाजिक कर्म बनाया। साहित्य को समय सापेक्ष बनाकर उसे संवाद का माध्यम बनाया। पत्रकारिता के जरिए ऐसा सृजन किया यह अखबार और पत्रिकाएं आजादी के संघर्ष में कारगर हथियार साबित हुई। साथ ही स्वतन्त्रता- समानता-बंधुता और न्याय जैसे मूल्यों से लैस समाज के नव निर्माण के लिए बेचैन हर भारतीय के जीवन के लिए हवा-पानी-भोजन की तरह दैनंदिन की भौतिक जरूरत बन गई।

आजादी के बाद भारतीय जीवन मूल्यों तथा सामाजिक संरचना में तेजी से परिवर्तन आया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था के केंद्र टूटने लगे। जीवन को देखने और भोगने की दृष्टि में परिवर्तन आने लगा। सन् 1960 के बाद भारतीय समाज इतना तेजी से बदलने लगा कि उसका अपना परिवेश पीछे छूटने लगा। परिणामत: उसका अपना ही अस्तित्व संकटग्रस्त होने लगा।

इस तरह के परिवेश में पत्रकारिता के परम्परागत मानदण्ड और मूल्यों का टूटना भी स्वाभाविक है, क्योंकि तब तक पत्रकारिता के पवित्र पेशे की कमान औद्योगिक घरानों के हाथों में जा चुकी थी। चूंकि औद्योगिक घराने लाभ-हानि के सिद्धांत पर कार्य करते हैं। इससे पत्रकारिता दूर रहे, यह संभव नहीं था। इससे न केवल पत्रकारिता का स्वरूप बल्कि उसका चरित्र भी बदलने लगा। परिणामत: ‘पत्रकारिता- मिशन है या व्यवसाय’ विषयक बहस प्रारंभ हुआ। पत्रकारिता को मिशन मानने वालों का कहना है कि जिन लोगों ने पत्रकारिता को सिर्फ एक व्यवसाय मात्र तक सीमित कर दिया है, वे मिशन के महान उद्देश्यों और परम्पराओं से घबड़ाए हुए लोग हैं तथा व्यवसाय के नाम पर तथाकथित पूंजीपतियों और नेताओं की दलाली कर रहे हैं।

वे अपनी सामाजिक भूमिका को भी भूल गये हैं। इसके विपरीत, जो लोग पत्रकारिता व्यवसाय के समर्थक हैं, उनका कहना है कि मिशनवादी लोगों को वास्तविकता का अंदाजा नहीं है। ऐसे लोग आधुनिक पत्रकारिता के विकास में बाधक हैं। वे चाहते हैं कि पत्रकारिता के माध्यम से आज भी साइमन वापस जाओं के नारे लगाये, विधवा विवाह के महत्व को बताये और पंत जी की साहित्यिक साधना से लोगों को अवगत कराये। ऐसे लोग दूसरों की पूंजी पर समाज को शिक्षित करने का उपदेश देना अपना परम कर्तव्य समझते हैं।

भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की पड़ताल से स्पष्ट है कि आजादी से पूर्व पत्रकारिता में दो प्रकार की विचारधारा थी। पहला- राष्ट्रवादी की, जो ब्रिटिश सत्ता के विरोधी थे। दूसरे- एंग्लो सैक्सन की, जिनका प्रकाशक विदेशी कम्पनियां द्वारा होता था। आजादी के बाद राष्ट्रवादी विचारधारा का धीरे-धीरे लोप होने लगा तथा एंग्लो सैक्सन का विकास। इसका एक कारण यह भी है कि औद्योगिक घराने एंग्लो सेक्सन की विचारधारा से संचालित होते थे, जिनका एक मात्र उद्देश्य लाभ कमाना होता है।

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File Photo: Electronic Media Studio..

आधुनिक युग में पत्रकारिता भले ही शुद्ध व्यवसाय बन चुकी है, लेकिन सत्य यह भी है कि भारत में इसकी शुरूआत मिशन के रूप में हुआ। लोगों ने अभिरुचि के रूप में अपनाया। आजादी के बाद औद्योगिक घरानों के चलते पत्रकारिता व्यवसाय बन गयी, लेकिन स्वयं समाज सेवा के विशिष्ट मूल्यों से न तो अलग कर सकी है और न तो भविष्य में कर सकती है।