जन्मदिन विशेष: कैफ़ी आज़मी ने धार्मिक रूढ़िवादिता से त्रस्त होकर जिन्होंने अपना लिया साम्यवाद

Kaifi Azmi
File Photo: Kaifi Azmi
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Pankaj Pandey
पंकज पाण्डेय

मनोरंजन डेस्क। देश के अव्वल दर्जे के शायरों में शुमार कैफ़ी आज़मी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। आज (14 जनवरी) उनका जन्मदिन है। उत्तरप्रदेश के आज़मगढ़ जिले के मिजवां गांव में पैदा हुए कैफ़ी आजमी का मूल नाम अख्तर हुसैन रिजवी था। बचपन में कविता पढ़ने का शौक और भाइयों का हौसला अफजाई ने इन्हें गीत-ग़ज़ल लिखना भी सीखा दिया।

11 वर्ष की अवस्था में ही इन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल लिख डाली। लोगों ने पसंद किया तो मुशायरा में भी जाने लगे। उन्हें वहाँ नज़्म पढ़ते देख पिता समझते कि खुद वाहवाही लूटने वाला यह लड़का बड़े भाई का लिखा हुआ ग़ज़ल पढ़ता है। बस फिर क्या था…पिता ने पुत्र की परीक्षा लेने के लिये गाने की एक पंक्ति दी और उसपर उन्हें गजल लिखने को कहा। कैफी आजमी ने इसे एक चुनौती के रूप मे स्वीकार किया और उस पंक्ति पर एक खूबसूरत गजल लिख डाली।

ग़ज़ल के बोल थे- “इतना तो जिंदगी मे किसी की खलल पड़े ना हंसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े।” उनकी यह गजल काफी लोकप्रिय हुई और बाद में सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका बेगम अख्तर ने इस ग़ज़ल को अपना स्वर दिया। 

Kaifi Azmi
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बचपन में पिता मौलवी बनाना चाहते थे पर कैफ़ी को यह पसंद नही था। धार्मिक रूढि़वादिता से त्रस्त कैफी साम्यवादी विचार धारा को अपना लिया। 43 में साम्यवादी दल का मुम्बई में कार्यालय खुलने पर वह मुंबई भेजे गए। यहीं पर  इनकी मुलाकात शौकत से हुई जो बाद में इनकी हमसफ़र बनी।

शौकत सम्पन्न घर की साहित्यिक संस्कारो से संपन्न युवती थी। कैफ़ी के गीतों-गज़लों से प्रभावित शौकत ने कैफ़ी को अपना जीवन साथी बना लिया। 47 में दोनों ने निकाह कर लिया। शादी के बाद पारिवारिक खर्चे बमुश्किल जुट पाते। अंततः उन्होंने फिल्मो के लिए गीत लिखने का निश्चय किया।

शाहिद लतीफ की फिल्म “बुजदिल” के लिए दो गीत सबसे पहले लिखी। 1959 में  फ़िल्म धूल का फूल के लिए लिखे “वक्त ने किया क्या हसीं सितम तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम” जैसा सदाबहार गीत ने उनकी लोकप्रियता और बढ़ा दी। वर्ष 1965 भारत-चीन के युद्ध पर प्रदर्शित फिल्म “हकीकत” में उन्होंने “कर चले हम फिदा जानों तन साथियो, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों” गीत लिखी। इस गीत की कामयाबी के बाद कैफी आजमी सफलता के शिखर पर जा पहुंचे।

‘धीरे धीरे मचल ऐ दिल-ए-बेक़रार’, ‘ज़रा-सी आहट होती है तो दिल सोचता है’, ‘ये दुनिया, ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं’, ‘तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है’, ‘तुम बिन जीवन कैसा जीवन’, ‘मेरी दुनिया में तुम आई क्या-क्या अपने साथ लिए’ ,’कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नही’, ‘जीत ही लेंगे बाज़ी हम तुम, खेल अधूरा छूटे ना’, ‘चलते-चलते यूँ ही कोई मिल गया था’, ‘धड़कते दिल की तमन्ना हो,आप से प्यार हुआ जाता है’। जैसे दिल को छू लेने वाले सदाबहार नग्मे लिखे। ढ़ेरों शेर लिखी,फिल्मो के संवाद भी लिखे। काफिया में लिखे हीर-राँझा फिल्म के संवाद विशेष उल्लेखनीय है।

कैफ़ी आज़मी के जन्मदिन पर दिल को छूती और झकझोरती उनकी लिखी यह शेर देश की हालात पर उनकी छटपटाहट और पीड़ा व्यक्त करते हुए एक सच्चा हिंदुस्तानी के मनोभाव को व्यक्त करती है।

“बस्ती में अपने हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए

इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए”।

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