जानें झारखण्ड के एक ऐसे गाँव को जहाँ अब भी बसते हैं एंग्लोइंडियन 

Anglo-Indian
Janmanchnews.com
Share this news...
Nilesh Prasar
निलेश पराशर
राँची। झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर-पश्चिम में करीब 65 किलोमीटर दूर स्थित है एक कस्बा गाँव है ‘मैकलुस्कीगंज’ जो झारखंड का एकमात्र एंग्लोइंडियन गाँव है।

इस कस्बे को किसने बसाया?

इस कस्बे को बसाने का सारा श्रेय एंग्लोइंडियन समुदाय के व्यवसायी अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की को जाता है। एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए बसाई गई दुनिया की इस बस्ती को मिनी लंदन कहा जाता है, चामा, रामदागादो, कैदल, तूली, ओनका, मायापूर, महोलिया, कैसाल जैसे गांवो वाला इलाका है जो अपने 365  बड़े-बड़े एवं सुंदर बंगलो के साथ पहचान पाता है।

जानकारी के मुताबिक, 1930 के दशक में रातू महाराज से ली गई लीज की 10 हजार एकड़ जमीन पर अर्नेस्ट टिमोथी मैकलुस्की नामक एक एंग्लो इंडियन व्यवसायी ने इसकी नींव रखी थी। घने जंगलों और आदिवासियों गाँवों के बीच इस जगह को मैकलुस्की ने कोलोनाइजेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के सहयोग से बसाया और तब इसका नाम मैकलुस्कीगंज पड़ा।

प्राकृतिक सुंदरता खींच लाई थी मैकलुस्की को इस गांव तक-

कोलकाता के प्रोपर्टी डिलिंग के व्यवसाय से जुड़े मैकलुस्की जब इस इलाके में आए  तब यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और यहां के गांवो मे आम, जामुन, करंज, सीमल कदम, महुआ, भेलवा, सखुआ, पारास के मंजर, फुलो या फलों से सदाबहार पेड़ उन्हे इस तरह भाए की उन्होने अपने समुदाय को इसी जगह बसाने की ठान ली। मैकलुस्की के पिता आइरिस रेल में नौकरी करते थे, मैकलुस्की तब बंगाल विधानपरिषद के सदस्य बने और कोलकाता में रियल स्टेट का कारोबार भी ठीक ढंग से चलाया।

1930 के दशक में जब साइमन कमिशन की रिपोर्ट आई तब ब्रिटिश सरकार ने एंग्लो-इंडियन समुदाय पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया और अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट गया  इस स्थिति में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रति बड़ा संकट खड़ा हो गया। तब मैकलुस्की ने अपने बड़े बड़े शहरों में रह रहे समुदाय के लोगों  को इसी गाँव में बसाया।

मैकलुस्कीगंज भारत का मिनी लंदन के नाम से भी जाना जाता है-

इस समुदाय के लोगों ने यहां कई आकर्षक बंगले बनाए और वहीं रहने लगे। देखते ही देखते पश्चिमी संस्कृति के रंग-ढंग और एंग्लो समुदाय के लोगों की मौजूदगी ने इस क्षेत्र को लंदन का रूप दिया और तभी से यह कस्बा गाँव मिनी लंदन के नाम से मशहूर हो गया।

मैकलुस्कीगंज कभी खो रहा था अपनी पहचान –

मनुष्य के तरह मैकलुस्कीगंज को भी कभी खराब दिन देखने को मिले थे, धीरे धीरे यहाँ से सभी एंग्लो इंडियन परिवार अपने रोजी रोटी के तालाश में अन्य बङे शहरों के तरफ कूच हो गए तब शहर कुछ भूतों का गाँव ही बनकर रह गया था बड़े -बड़े बंगलो वाला यह गाँव विरान  हो गया था अब सिर्फ  20-25 एंग्लो-इंडियन परिवार ही रह गए हैं इस गांव में।

समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाने के कारण यहां राहगीर कम ही आते थे लेकिन आज झारखंड की खूबसूरती में चार-चांद लाने वाला ये मिनी लंदन धीरे-धीरे अपने खोए अस्तित्व को पाने की जद्दोजहद कर रहा हैं।

अब हो रहें हैं कुछ विकास के कार्य –

एंग्लो-इंडियन समुदाय हमारे समाज और संस्कृति की विरासत हैं। इस समुदाय का यह सारी दुनिया में इकलौता गांव है।उनकी समृद्ध संस्कृति और विरासत को बचाने के लिए सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। टूरिस्ट प्लेस के तौर पर इसे विकसित करने की कई योजनाएं हैं और उनमें से कुछ पर काम भी शुरू हो चुका है।

Share this news...

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फॉलो करें।