कॉरपोरेट घरानों के हथकंडे: संपादकों की खामोशी, मीडिया की स्वतंत्रता पर सुलगते सवाल

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क्या मौजूदा समय में बोलने की, आम जन-मानस के सामनें अपनी बात रखनें की, अपने विचारों को शब्द देनें की और बेहिचक सवाल पूछनें की आजादी हम पत्रकारों के पास है?

-संपादकीय (उत्तरप्रदेश)

जनमंच विशेष: मीडिया मालिकों (कॉरपोरेट हाउस) द्वारा लगातार पत्रकार हितों की अनदेखी की जा रही है और पत्रकार खामोश तमाशाई बने हुये हैं। पिछले दिनों कई संपादकों को उनके मीडिया हाऊसो नें केवल इसलिये बाहर का रास्ता दिखा दिया गया कि उनके कारण कई बड़े उद्यौगिक घराने के हितों को नुकसान पहुंच रहा था, तो कई राजनीतिक हस्तियां बेनक़ाब हो रही थीं।
प्रसून
Punya Prasoon Bajpaye Resigned from AajTak… Why?

संपादकों के ऊपर इस तरह की कार्यवाई देश भर के पत्रकारों को बेचैन कर रही है। यह अलग बात है कि वे इस बेचैनी को ज़ुबान नहीं दे पा रहे हैं। आजतक के संपादक पुण्य प्रसून बाजपेयी की आजतक न्यूज चैनल से इसलिए छुट्टी कर दी गई। क्योंकि उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान बाबा रामदेव से ऐसे मुश्किल सवाल पूछ लिये थे कि रामदेव बगलें झांकनें लगे थे। इससे भड़के रामदेव नें आजतक के मालिकों से संपर्क साधा और चैनल को दिए जाने वाले सारे विज्ञापन बंद करने की धमकी देते हुए पुण्य प्रसून बाजपेयी को सबक सिखाने हेतु दबाव बनाया, जिसके आगे प्रबंधन को झुकना पड़ा।

अजीत अंजुम
Ajeet Anjum resigned from India TV…

बाबा की धमकी के बाद बताया जाता है कि प्रबंधन ने आनन-फानन में बैठक कर पुण्य प्रसून बाजपेयी को तलब कर लिया और उनसे जवाब मांगा गया। पुण्य प्रसून बाजपेयी के दस्तक नामक बुलेटिन को भी छोटा कर दिया गया। अंतत: आजतक स्टूडियो में ऐसा माहौल क्रिएट किया गया। जिससे पुण्य प्रसून बाजपेयी के लिए काम करना मुश्किल हो गया। तब उन्होंने प्रबंधन को इस्तीफा थमा दिया। पुण्य प्रसून इसके पहले भी आजतक छोड़ चुके हैं वे तब सहारा और ज़ी न्यूज की यात्रा करते हुए दुबारा आजतक लौटे थें।

दीपक
Deepak Sharma is also working out of his league…

पुण्य प्रसून बाजपेयी से पहले दीपक शर्मा, अजीत अंजुम एवं अन्य कई संपादकों को भी चैनलों द्वारा इसलिये बाहर का रास्ता दिखा दिया था कि वे कॉरपोरेट घरानों के सामने घुटने टेकने को तैयार नहीं हुये थें। तो क्या निष्पक्ष एवं स्वतंत्र पत्रकारिता अब संभव नहीं रह गया है? क्या कॉरपोरेट घरानों के दबाव के आगे न झुकने वालों का यही हश्र होगा।

संपादकों के साथ इस व्यवहार से देश भर के पत्रकारों के मन में कई ऐसे प्रश्न सुलग रहे हैं, क्या आज पत्रकारिता इतनी निर्बल एवं असहाय है कि इसे कोई जब चाहे जैसे चाहे किसी खूंटें के साथ बांध सकता है।

आज जो संपादक पद पर आसीन हैं उनकी खामोशी तो यही संदेश देती है, रविश कुमार इसे प्राइम टाइम पर मुद्दा बनाने की जुर्रत कर सकते हैं क्या? क्या आज मीडिया का अर्थ पेड मीडिया और खूंटे से बंधा बंधवा मज़दूर भर की भूमिका रह गयी है।

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