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इंसानियत आज भी जिंदा है, गरीब बच्चों की सेवा कर मिसाल कायम कर रहे है ओंकार

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rajesh kumar mehta

राजेश कुमार मेहता

कोडरमा। जिला के डोमचांच निवासी ओंकार विश्वकर्मा आज झारखंड के कई गरीबों के दिल में जाने अनजाने एक जगह बना चुके है, जो अमिट है। जिसे उनके दिल से निकाला नही जा सकता। खास कर बिरहोर समुदाय से इनका लगाव काफी पुराना है और अब तक का जीवन संघर्ष बिरहोर समुदाय को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए संघर्षरत रहा है। इसके अलावे आम लोगों तक न्याय की पहुंच बनाना लक्ष्य में शामिल है

ओंकार का प्रारंभिक शिक्षा

तीन साल के उम्र में उसके पिता हरेंद्र विश्वकर्मा ने ओंकार को स्थानीय विद्यालय सरस्वती ज्ञान मंदिर डोमचांच में दाखिला करवाया। मगर वहां फीस नही दे पाने के कारण महज दो साल के अंदर ही ओंकार को विद्यालय छोड़ना पड़ा। जिसके बाद वर्ग 8 तक कि शिक्षा मध्य विद्यालय डोमचांच में हुआ।

8 साल के उम्र में पिता ने दूसरी शादी कर के छोड़ दिया ओंकार को

ओंकार को उनके जानने वाले बताते है कि जब ओंकार 8 साल का था तब वर्ष 1998 में उसकी मां को अल्सर रोग हो गया था। उस समय उसके पिता ने यह कहते हुए दूसरी शादी कर ली कि ओंकार की मां अब घर का काम नही देख सकती और हमें एक और बच्चा चाहिए एक बच्चे पर हम जीवन नही जी सकते और इस तरह ओंकार के पिता ने दूसरी शादी कोडरमा कोर्ट से कर लिए। जिसके बाद घर मे आपसी झगड़ा बढ़ गया। आये दिन रोज विवाद होते रहता था। इस विवाद ने इतना विशाल रूप ले लिया कि ओंकार के पिता ने घर छोड़ कर जाने का फैसला लिया।

जब दो दिन तक भूखे रहे ओंकार उसकी मां और दादी

जब ओंकार के पिता ने घर छोड़ते हुए घर का अनाज और सब कुछ बोरे में भर कर ले गए तो घर मे खाने को एक दाना नही था। दादी बूढ़ी हो गई थी मा बीमार थी। तब पास पड़ोस के लोग और ओंकार के ननिहाल से अनाज आता तो घर मे खाना बनता था।

उस समय ओंकार की मां को उसके मायके में ठोंगा बनाने के लिए सिखाया गया। तब जा कर घर के चूल्हे में आग जलना शुरू था। इस हालत को झेलने के कारण ओंकार को पास पड़ोस के गैरेज में मजदूरी करना पड़ा था और किसी तरह पढ़ाई भी कर रहा था। धीरे धीरे ओंकार की पढ़ाई कमजोर होते चली गई थी। जो बस एक नाम मात्र था।

मजहब की दीवार तोड़ जब समसेर बना था सगा भाई

ओंकार बताते है, कि जब वह गैरेजों में जब वो मजदूरी किया करते थे, तो गैरेज में काम करने वाला समसेर मिस्त्री उसे अपने छोटा भाई से भी बढ़ कर मानता था और ओंकार की हर छोटी से छोटी जरूरत के लिए पैसा दिया करता था। उन्होंने लगातार उसे यह समझाने का प्रयाश किया था कि पढ़ाई करो इससे आगे कुछ भी नही है।

जब हाई स्कुल में नामांकन के पैसे नही थे।

ओंकार किसी तरह 8 वी तक कि पढ़ाई पूरी की और हाई स्कूल पहुंचे जहां नामांकन के लिए उसके पास पैसा नही था। तब उसके दोस्त के दादा जो पेशे से शिक्षक थे। उन्होंने अपना पोता बता कर निशुल्क नामांकन करवाया था।

घास बेच का स्कूल जाने के लिए दादी ले दी साईकिल

ओंकार जब हाई स्कूल में पढ़ने जाने लगे थे। तो जाने में काफी दिक्कत होता था। स्कूल जाने का यह दर्द दादी से देखा नही गया था। तब ओंकार की दादी ने 90 दिन घास काट कर उसे बेच कर 500 रुपये में ओंकार के लिये एक पुरानी साइकिल खरीद दी थी कि वह स्कूल जा सके।

पढ़ाई के लिए किताब नही खरीद पाने के कारण मां ने भेज दिया हरिद्वार

ओंकार की पढ़ाई में किताब के लिए पैसे जुगाड़ नही हो पाने के कारण मा ने उसे हरिद्वार ले गई और उसे वही रह कर निःशुल्क पढ़ाई करने को बोल कर छोड़ आई। जहा पर ओंकार ने कर्मकांड के साथ संगीत और पूजा पाठ का ज्ञान सीखा और जड़ी बूटी स्व होने वाले स्वास्थ्य सुधार पर अध्ययन किया जिसके तीन महीने बाद वह से भाग कर बिना टिकट के वापस अपने घर आ गए।

फिर पढ़ाई करने की मन बना कर लिखा दसवीं की परीक्षा

जहां फिर से गैरेज में काम करने लगे और पढ़ाई भी शुरू किया। जिसके बाद बड़ी मुश्किल से दसवीं की परीक्षा दिया जहां वो फेल हो गए।
और क्रशर में काम करने लगे और लगातार दो सालों तक इलाके के विभिन्न क्रशर में मिस्त्री के तरह काम करने लगे। इस दौरान काम करवाने वाला मालिक उसे कई महीने का मजदूरी पैसा नही दिया। तब जा कर उन्होंने क्रशर में काम छोड़ कर जो पैसे मीले थे। उस पैसे से डोमचांच कॉलेज में नाम लिखवाकर पढ़ने लगे।

वहां निजी ट्यूशन पढ़ाने लगे इस तरह धीरे धीरे शिक्षा स्व जुड़ाव बढ़ा तब जा कर स्थानीय संगठन कल्याण फउंडेशन से लगाव बढ़ा जहां उन्होंने समाज के समस्याओं की पहचान की और उसे समझा। गांव की समस्या देखने के बाद ओंकार के अंदर की मानवीय संवेदना जागी जहां से वह कुछ गरीब बच्चों को निशुल्क पढ़ाने लगे। कुछ के पैसे मिलते तो कुछ के पैसे नही मिलते उससे कोई दिक्कत नही पर अपने काम मे लगे रहते थे। और इस तरह उन्होंने गांव में कई बच्चों को ट्यूशन पढ़ाये।

वर्ष 2007 में स्नातक पास करने के बाद ओंकार ने 2008 में संग्राम नामक सामाजिक संगठन का गठन किया। जहां से समाज में कमजोर तबके के बीच खास कर दलित बस्ती में बच्चो और बच्चियों को किशोरी क्लब के माध्यम से शशक्त करने का प्रयाश जारी रहा। 2010 में नेहरू युवा केन्द्र से जुड़कर डोमचांच के युवाओं की समस्या को समझने और गांव की समस्याओं से युवाओं को जोड़ने का सार्थक प्रयास किया गया।

जिसमें ओंकार राष्ट्रीय युवा कोर के पद पर अपने प्रखंड में सक्रिय रूप से काम करते रहे और 20 युवा समूह बना कर गांव की समस्या के समाधान के लिए लगातार प्रयास करते रहे। जिसका परिणाम रहा कि कोडरमा जिले में पहली बार बेस्ट यूथ क्लब अवार्ड से इनके संस्था संग्राम को नवाजा गया। यह कोडरमा के इतिहास में पहला अवार्ड था।

वर्ष 2011 में मानवाधिकार जन निगरानी समिति वाराणसी से जुड़ कर मानवाधिकार के लिए संघर्ष करते हुए ओंकार ने समाज के सबसे अंतिम व वंचित समुदाय बिरहोर जो झारखंड से लुप्त होने के कगार पर है। उनके बीच संपर्क स्थापित कर उनके अधिकार व समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए प्रयास करने लगे। जब उन्होंने बिरहोर समुदाय के एक छोटे से गांव जियोरायडीह में समुदाय के कई मूलभूत समस्या से जूझ बिरहोरों को देखा तब हालात बहुत बुरे थे। बिरहोर परिवार को कई दिन भूखे गुजरना पड़ता था जंगल मे अगर कुछ मिला तो खाये और नही मिला तो भूखे रहते थे। हालात इतने बुरे थे कि मूली के पत्ते को उबाल कर उससे अपना भूख मिटाते थे।

ईसके अलावे उस समुदाय को सरकार के कोई भी योजना का लाभ नही मिल रहा था। वह की समस्या पर गम्भीर हो कर ओंकार ने उनके लिए संघर्ष का रास्ता चुना और उनके समस्याओ से सरकार को अवगत कराने लगे और धीरे धीरे उसके समाधान की पहल करने लगे इसके अलावे बिरहोर बच्चो को शिक्षा से जोड़ने का भी प्रयाश जारी रखा।

जो आज भी जारी है ओंकार ने बिरहोर समुदाय के लिए डोमचांच प्रखंड मुख्यालय से 15 की0मी0 दूर सुदूरवर्ती पंचायत मसनोडीह के जिओरायडीह गांव में झारखण्ड से लुप्त हो रहे बीरहोर समुदाय का 29 परिवार के बीच सक्रिय काम किये है। उनके अनुशार बिरहोर समुदाय अपना जीवन गुजर बसर जंगलों में करता है। उन्ही बिरहोर समुदाय के जियोरायडीह के ग्रामिण अनेको रोग से ग्रषित थे।और गांव में सरकार की योजना नहीं चलने के कारन बहुत समस्या थी।

संवाद संस्था ने गांव की समस्या से मुखिया को अवगत करा कराया गया। उसके बाद नवम्बर 2016 में एक ग्रामसभा कर गांव की समस्या चिन्हित की गई। जिसके बाद गांव में सरकार और संस्था के प्रयास से निम्न बदलाव आये। एक से 90 बिरहोरों का जनधन खाता BOI फुलवरिया द्वारा केम्प लगा कर बैंक बी सी रामकृष्ण द्वारा खोला गया, दो बिरहोरों के गांव के चेकडेम में 20 किलो मछली बिज जिला उपायुक्त द्वारा डलवाया गया, तीन बिरहोरों ने पहली बार खेती कर के मकई और अरहर दाल 90 kg उपजाया, चार गांव का स्वास्थ्य सुविधा दुरुस्त किया गया।

पांच कुपोषण से ग्रषित बच्चे का इलाज़ अनेको बार कराया गया। छह कल्याण विभाग द्वारा सोलर पानी सिस्टम लगाया गया, सात आधार कार्ड बनाया गया, आठ सभी बिरहोर परिवार को पेंसन योजना से जोड़ा गया। इस तरह जिले में जनजाति समुदाय के उत्थान के लिये एक मजबूत पहल की गई।

सद्भावना के लिए प्रयास


2014 में जाति धर्म और मजहब से ऊपर उठ कर नाव दलित आंदोलन के समर्थन में 14 फरवरी को हिंसा रोको प्यार बाटो युवा मार्च का आयोजन किया किया गया। जिसमें धर्म मजहब से ऊपर उठ कर लोग जातिवाद हो बर्बाद, प्रेम से कहो हैम इंसान है इत्यादि नारो से क्षेत्र की सामाजिक बहुलता को जीवंत करने का प्रयास किया गया। साथ ही समाज के अंतिम तबके से मानवीय संवेदना को जोड़ने और समाज के अंतिम तबके के आवाज को बुलंद करने के लिए झारखंड फाउंडेशन द्वारा 2016 में झारखंड नागरिक अवार्ड से सम्मानित किया गया।

मानव अधिकार और आजीविका के लिए संघर्ष


ओंकार अपने काम मे यही नही रुके उन्होंने अपने काम को और गति दी जहा उन्हें मानवाधिकार जन निगरानी समिति का राज्य संयोजक मनोनीत किया गया जिसके बाद ओंकार ने पूरे झारखंड में मानवाधिकार हनन के घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए लगातार उन मामलों पर पहल करते रहे जिसमे कई लोगो को न्याय दिलाया और कितने लोगों को सरकार द्वारा मुआवजा भी भुगतान किए गए।

साथ ही समाज के अंतिम तबके के लोगों के भूख भोजन और आजीविका के लिए और उनकी मूलभूत जरूरत को ले कर लगातार सरकार को उनकी समस्या से अवगत कराते रहे। जिस काम का परिणाम यह रहा कि राष्ट्रीय स्तर पर नेशनल फाउंडेशन दिल्ली द्वारा सन 2017 में उन्हें भारत रत्न चिदंबरम सुब्रमण्यम अवार्ड के लिए उनका चयन किया गया और हाल ही में 15 मार्च 2017 को इंडिया हेबिटेट सेंटर नई दिल्ली में इस अवार्ड से उन्हें सम्मानित किया गया।