गुमनाम है कोई…कोख से जन्मी औलाद और सहोदर रिश्ते भी शहरों में रहकर कंक्रीट से हो गए!

Poornima kalika ghat patna
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उशालाल सिंह
उशालाल सिंह की कलम से…

विचार। पटना काली घाट (दरभंगा हॉउस) बिहार की एक विरासत जो कभी महाराजा कामेश्वर सिंह का राज-महल था। आज यहाँ पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई होती है। एकदम गंगा किनारे। इसी परिसर में काली जी का मंदिर जो अति प्राचीन है। आज भी आस्था का केंद्र है। पटना वासी इस स्थान से भली-भाँति परिचित है। मैं भी अक्सर जाती हूँ निरुद्देश्य। बस वहाँ गंगा तट पर बैठना और लहरों के साथ स्वयं में डूबते जाना अच्छा लगता है।

आज भी सुबह वहाँ जाना हुआ। पर आज एक उद्देश्य था। वहाँ किसी से मिलना था। जिसे देखी तो पहले जरूर थी पर कभी ध्यान नहीं दी। जब से बेटी ने उनके बारे में बताया था उनसे मिलने को मन मचल उठा था।

मन्दिर की सीढ़ियां जो गंगा जी तरफ उतरती है उसी किनारे एक 75 वर्षीय वृद्धा अपने हारमोनियम के संगत से स्वरलहरी में डूबी थीं। जिसके बोल-
“मानों तो मैं गंगा माँ हूँ,
न मानो तो बहता पानी…..”

देखें…

आवाज में ऐसी खनक कि सुनने वाला सिहर जाय। पास ही बहती पवित्र जीवनदायिनी गंगा और जीवन के चौथेपन में पूर्णिमा जी में कितनी समानता होगी इसकी तुलना नहीं करती पर दिल से आवाज आती है मानों माँ गंगा की ही भावना इनके बोल के रूप में प्रस्फुटित हो रहे हों।

पास से गुजरते लोग 10 रु 20 रु देकर इनके चरण स्पर्श कर आशीष ले आगे बढ़ जा रहे थे। पर मुझे तो इनसे ढेरों बातें करनी थी। मन में कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे थे। मैं भी उनका चरणस्पर्श कर पास में बैठ गई। वो मुस्कुरा दी। उन्हें 10 रु देते हुए कहा कि, आप बहुत अच्छा गाती हैं। उन्होंने जवाब में कहा कि मैं पहले बच्चों को सिखाती थी। मेरी जिज्ञाषा और बढ़ी। फिर उनसे बहुत सारे सवाल पूछी जिनका जवाब उन्होंने बहुत ही अच्छे से दिया।

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उनसे बात-चीत के क्रम में मेरे साथ मेरी पति व बेटी की आँखे भी नम थी। भले हम तीनों ही एक दूसरे से छुपा रहे थे। इनकी जीवन गाथा सुन जितना अचंभित मैं हुई शायद आप भी हों। या बहुत लोग उन्हें जानते भी हों।

उनका जीवन परिचय मेरे शब्दों में…

नाम पूर्णिमा देवी, जन्म 29 दिसम्बर 1945 को दार्जिलिंग में। पिता-हरिप्रसाद शर्मा, महाकाल मंदिर के पुजारी। दो बहनें ही थीं इनके भाई न थे।इन्होंने पिता के न चाहते हुए भी अपने बड़े पिताजी (चाचा) के बेटे को साथ रखने को विवश किया।

क्योंकि जब दोनों बहनें ससुराल चली जायेगी तब पिता की देखभाल को कोई तो होगा। बचपन से ही पूर्णिमा जी की आँखे कमजोर थी। डॉ. ने पढ़ने से मना किया था। फिर भी इनकी शिक्षा I.Sc साइंस है। जो इनसे बात-चीत के क्रम में अंग्रेजी शब्दों का सही प्रयोग से पता चलता है। इनकी शादी जनवरी 1974 में एक नामी डॉ (फिजिशियन) से हुई। उनका नाम H.P दिवाकर था। जिनका बाराबांकी उत्तरप्रदेश में अपना क्लीनिक और घर था। शादी के बाद दस सालों का सफर बहुत ही अच्छा रहा। इनके दो बच्चे भी हुए। एक बेटा प्रदीप और एक बेटी वन्दना। अपने पति के बारे में बताते हुए इनके चेहरे पर एक चमक दिखी। कहने लगीं वो इतने अनुभवी डॉ. थे कि, आला (स्टेथोस्कोप) नहीं लगाते थे। बस चेहरा देखकर मर्ज बता देते थे। वो एक लेखक भी थे उनकी रचना “तू ही तू”, लम्हे,आयाम।

उनकी लिखी गीत “शाम हुई सिंदूरी “जिसे आशा भोंसले जी ने गाया है और “आज की रात अभी बाकी है”। डॉ. साहब का गाना फ़िल्म इंडस्ट्री में कैसे पहुँचा उन्हें नहीं पता। पर कहती हैं उस समय कई लोगों ने कहा कि आप केस कीजिये। पर उनकी सहृदयता की परिचय देती हुई कहती हैं कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।

1984 की एक रात उनकी जीवन को हमेशा के लिए अमावस कर गया। जिसकी कल्पना पूर्णिमा जी ने सपने में भी नहीं की होंगी कि इनका बसा बसाया नीड का तिनका तिनका कभी बिखर जाएगा। कुछ बदमाशों ने डॉ. साहब की हत्या कर दी। उसके बाद ससुर और देवर ने इस कदर प्रताड़ित किया कि उन्हें अपनी सम्पति ही नहीं, अपने बच्चों के साथ घर तक छोड़ना पड़ा।

आज भी बाराबांकी में उनका घर है जो अब किसी जेलर के नाम है। पूर्णिमा जी बताती हैं कि दोनों बच्चों के साथ वो पटना मौसी के यहाँ आ गईं। मौसी जब तक थी इन्हें बहुत सहारा मिला। पर मौसी भी ज्यादा दिन साथ न दे सकी। वो लिवर कैंसर की मरीज थीं जिनका देहान्त 1989 में हो गया। उसके बाद इनका जीवन और भी कठिन हो गया। बच्चों की अच्छी की परवरिश की खातिर एक बार अपने घर (मायके) भी गईं। पर पिता की मृत्यु के बाद चचेरे भाई ने किसी भी तरह की मदद और सम्पति में हिस्सा देने से साफ मना कर दिया। वो वापस पटना लौट आईं।उसके बाद कहीं नहीं गईं।

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पटना के एक स्कूल B. D पब्लिक स्कूल में इन्होंने शिक्षण कार्य के साथ ही कई स्कूलों में संगीत सिखाने का भी काम किया। जब घर से निकली तो इनका स्टूडेंट लाइफ का गाने का शौक को कुछ हमदर्दों ने दिशा देने की सोची। ये पटना के एक डॉ. शरण जी की बेटी को डेढ़ साल तक संगीत सिखाई।

इसी क्रम में पटना नाट्य संस्थान से भी जुड़ी। ये लता जी की बहुत बड़ी प्रसंशक हैं। इनका पहला प्रोग्राम 1990 में गढ़वा (झारखण्ड) में हुआ था। जिसमें भोजपुरी गाना “यही ठाइयाँ टिकुली हेरा गइले….”था। उसके बाद इन्होंने कई कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति भी दी। विश्वप्रसिद्ध पशु मेला सोनपुर में भी युवा कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा संचालित कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति देती रही। 2002 तक ये मंच से जुड़ी रही। इनका बेटा भी मोहम्मद रफी साहब का गाना ऑर्केस्ट्रा में काफी अच्छा गाता था। पर अभी अवसाद से घिरा गुम होकर रह गया है। जिसकी दुनियां अष्टावक्र की भाँति माँ तक ही सिमट कर रह गई है। न मालूम माँ के बाद उसका क्या होगा?

बेटी भी मुम्बई की महानगरी में ऐसी रच बस गई है कि माँ और भाई याद तक नहीं। अपनी पहचान तक छुपा रखी है उसने। पहचानने वाले पहचान ही गए और पूर्णिमा जी को बताया कि वन्दना टी.वी. सीरियल में काम करती है। जब मैंने पूछा कि आप टी.वी. पर अपनी बेटी को देखी हैं? तो बताई कि मेरे घर में टी.वी. नहीं है। पर एक बार देखी हूँ। उसमें उसका गुंजा नाम था। बहुत ही चुलबुली लड़की का रोल था।

अपनी छोटी बहन के बारे में बताती हैं कि उसका नाम रमोला जोशी है और एक सफल डॉक्टर है। जिसने अपनी पढ़ाई पी. एम. सी. एच से की है। वर्तमान में कटिहार में, नेपाल के पास अमेरिकन हॉस्पिटल में हैं।

कहते हैं परिवर्तन संसार का नियम है। समय के साथ आधुनिकता को ग्रहण करता हमारा समाज क्या इतना आधुनिक हो गया है कि कोख से जन्मी औलाद और सहोदर रिश्ते भी शहरों में रहकर कंक्रीट से हो गए हैं?

(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)

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