आलीशान बंगलों की नीचे दब गई कुम्हार की माटी

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रोहित गुप्ता की दिल की कलम से-

ब्लॉग। आलीशान बंगलों पर सजी चाइनीज लड़ियां बेशक लोगों के मन को खूब भाती हों, लेकिन इन बंगलों के नीचे भारतीय परंपरा को निभाते आ रहे कुम्हारों की माटी दबी पड़ी है। ढाई से तीन हजार रुपए में चिकनी मिट्टी ट्राली रेत खरीदकर दिए बनाकर कुम्हार मुनाफा नहीं कमा रहा, बल्कि अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज को जीवंत रखने का प्रयास कर रहा है।

आज से 10-15 पंद्रह वर्ष पहले जहां कुम्हारों को आस-पास की जगह से ही दिए बनाने के लिए चिकनी मिट्टी आसानी से फ्री में उपलब्ध हो जाती थी, वहीं अब इस मिट्टी की मोटी कीमत चुकानी पड़ती है। वहीं इस मिट्टी से तैयार एक दो रुपए के दीपक को खरीदते समय लोग मोल-भाव भी करना नहीं भूलते।

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दूर-दराज के क्षेत्रों से आती है मिट्टी कुम्हारों की माने तो पहले किसी आस-पास के गांव, या खाली जगह से वे दीपक बनाने के लिए चिकनी मिट्टी खोद लिया करते थे। लेकिन अब उन जगहों पर आलीशान बंगले बन गए हैं, या फिर किसी के गांव या खेत में चिकनी मिट्टी उपलब्ध है, तो वे इसका व्यापार करते हैं।

तीन हजार की मिट्टी, एक रुपए का दीपक मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हार की व्यथा सुनते हैं, तो पता चलता है कि हमारी एक छोटे से दीपक को बनाने में मिट्टी खरीदने से लेकर दीपक भट्टी में तपाने तक कितना बड़ा संघर्ष होता है। तब जाकर कहीं हम अपनी संस्कृति को निभा पाते हैं। समय के साथ चिकनी मिट्टी के स्त्रोत व जगहों के समाप्त होने के साथ कुम्हारों को चिकनी मिट्टी मोल लेनी पड़ रही है।

15 साल पहले जहां एक पैसे के दीपक में कुम्हार को अच्छी बचत हो जाती थी, वहीं आज एक दीपक एक से तीन रुपए में बेचने पर भी कुम्हार रत्तीभर मुनाफा नहीं कमा पाता है। वहीं खरीदी हुई मिट्टी में से भी कुम्हार की एक तिहाई मिट्टी वेस्ट हो जाती है।

कस्बे में दर्जनों कुम्हार कर रहे काम

वर्तमान में कुम्हार समाज के दर्जनों से अधिक कारीगर कस्बे के विभिन्न जगहों पर दीपक बनाने का काम कर रहे हैं। मुख्य रूप से नई बस्ती, गिलौला गांव आदि जगहों पर यह काम अधिक है।

100 में पांच दिए हो जाते हैं खराब

दीपक बनाने वाले कारीगर कहते हैं, वे मिट्टी के बर्तन, दीपक, घड़े बनाने का काम केवल उनकी सभ्यता व संस्कृति के लिहाज से करते हैं, अन्यथा इससे उन्हें कोई मुनाफा नहीं है। महंगी मिट्टी खरीदकर काम शुरू करना।

एक तिहाई मिट्टी का खराब हो जाना और फिर दीपक तैयार करने के बाद भट्टी में औसतन 100 में 5 दीपकों का खराब हो जाना निश्चित है। ऐसे में कुम्हार मुनाफा कैसे कमा सकता है। यह तो केवल श्रद्धा है भारतीय संस्कृति के प्रति।

दीपक की चमक नहीं पड़ने देंगे फीकी

समय के साथ मटकों की जगह मयूर जग ने ली तो दीपक की जगह कृत्रिम रोशनी की लड़ियां आ गई। लेकिन इस सब के बावजूद कुम्हार समाज मायूस नहीं हुआ। कुम्हारों की सोच की बात करें तो, उनका यही कहना है कि चिकनी मिट्टी चाहे जितनी महंगी मिले, मेहनत चाहे दोगुनी लगे, लेकिन वे अपनी हस्तकला और भारतीय रीत-रिवाज के अभिन्न अंग दीपक की चमक को कम नहीं होने देंगे।

पहले की तुलना में अब यह कारोबार केवल ऑन सीजन का ही रह गया है। अब लोग होली, दीपावली पर ही महज खानापूर्ति के लिए मिट्टी से बने बर्तन खरीदते हैं। लेकिन कुम्हार आज भी उतनी ही शिद्दत से मिट्टी के दीपक को अपनी पेट की आग में पकाकर हमें हमारी संस्कृति लौटाने का काम कर रहे हैं।

चाइनीज लड़ियों के बहिष्कार से आई जागरूकता

गिलौला निवासी मुन्नालाल कुम्हार,जीवन कुम्हार, छंगा कुम्हार, का कहना है कि इस वर्ष लोगों में अपने स्वदेशी दियों को लेकर रुझान बढ़ा है। वरना गत कुछ सालों से लोग महज खानापूर्ति के लिए थोड़े बहुत ही दीपक खरीदते थे। लेकिन वर्ष चाइनीज विरोध के बाद लड़ियों से वापस दीपक की रोशनी की ओर लोग बढ़ने लगे हैं। दीपावली पर दीपक खरीदने का 11, 21, 51 का आंकड़ा अब 101, 151 और 201 में बदला है।

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