सरकारी गेहूं की बोरी 30 किलो की जगह 27 किलो ही सप्लाई की जा रही है

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धर्मवीर शर्मा की रिपोर्ट,

अबोहर (पंजाब)। पंजाब सरकार की आटा-दाल स्कीम के तहत नीले कार्डधारक परिवारों के नाम पर जारी की गई सरकारी गेहूं एक बार फिर से डिपो होल्डरों, आटा चक्की मालिकों व विभागीय कर्मचारियों को मालामाल करने के लिए सरकारी गोदामों तक पहुंच चुकी है।

गेहूं की होने जा रही करोड़ों रुपए की धांधली को लेकर कालाबाजारियों की उक्त तिकड़ी ने बाकायदा अपने-अपने हिस्से आने वाली काला कमाई व मिलावट का आंकड़ा भी तैयार कर लिया है। यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी होगा कि सरकार द्वारा नीले कार्डधारकों को अक्तूबर 2017 से मार्च 2018 के 6 माह की गेहूं बांटने का काम महानगरी के कुछ डिपुओं पर शुरू हो चुका है।

वहीं दूसरी ओर कालाबाजारियों की उक्त तिकड़ी ने भी अपने-अपने तौर पर गरीबों के मुंह का निवाला बनने वाली गेहूं को ठिकाने लगाने के लिए गणित लगाना शुरू कर दिया है।

जानकारी के मुताबिक सैंकड़ों इलाकों में सरकारी राशन डिपो ठेका प्रणाली के तहत चल रहे हैं, जिसमें बाहुबली डिपो मालिक असल डिपो होल्डरों को जारी होने वाले अनाज को अपने कब्जे में लेकर उसके बदले में एक तय की गई रकम अदा कर देते हैं और इस प्रकार से ठेके पर डिपो चलाने वाले ठेकेदार सरकारी अनाज की कालाबाजारी करके करोड़ों रुपए की काली कमाई कर रहे हैं

काली कमाई के इस पूरे घटनाक्रम में विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, क्योंकि राज्य सरकार द्वारा गेहूं वितरण प्रणाली के लिए कई नियम व 7 सदस्यीय विजीलैंस कमेटी तक भी बनाई गई है।

नियमों के मुताबिक डिपुओं पर गेहूं वितरण का काम 7 सदस्यीय विजीलैंस कमेटी के मैंबरों की मौजूदगी के बिना किया ही नहीं जा सकता। इनमें इलाका पार्षद, ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंच, डिपो होल्डर, इलाके की दो एस.सी. वर्ग से संबंधित मुखिया महिलाएं व दो सरकारी विभागों से संबंधित रिटायर अथवा मौजूदा कर्मचारी आदि शामिल हैं।

हैरानीजनक बात यह है कि पार्षदों व टीम के अन्य सदस्यों को विभागीय कर्मचारियों व डिपो मालिकों द्वारा यह जानकारी तक ही नहीं दी गई कि सरकार ने उन्हें विजीलैंस टीम का सदस्य नियुक्त कर रखा है और कुछ इस प्रकार से अधिकतर डिपो होल्डर व विभागीय इंस्पैक्टर उक्त विजीलैंस टीम को बिना विश्वास में लिए पर्दे के पीछे सरकारी गेहूं की कालाबाजारी का गोरखधंधा चला रहे हैं।

चौंकाने वाली सबसे अहम सच्चार्इ यह भी है कि लाभपात्र परिवारों तक पहुंचने वाली सरकारी गेहूं की बोरी 30 किलो की जगह 27 किलो ही सप्लाई की जा रही है। यानी एक बोरी से करीब 3 किलो गेहूं की चोरी, जिससे या विभागीय कर्मचारी करोड़ों रुपए कमा रहे हैं या फिर डिपो मालिक।

यह एक बड़ा सवाल है। इसके बारे में जानकारी के बावजूद विभागीय अधिकारियों ने कभी सच्चार्इ जानने की कोशिश नहीं की है कि आखिर प्रत्येक सरकारी बोरी से चोरी होने वाली उक्त 3 किलो गेहूं कहां जा रही है।

 

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