फूलपुर में कैसे भाजपा हुई चित, क्या हो सकते हैं हार के कारण? हमनें पूछा बीजेपी समर्थकों और विरोधियों से

फूलपुर
What was the major factor that made the BJP grounded in Phoolpur's Keshav Maurya Seat...
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बीजेपी अपनी अप्रत्याशित हार पर गहन मंथन में जुटी है, सारे अपाइंटमेंट कैंसिल करके योगी और मौर्या करारी हार का विश्लेषण कर रहे हैं…

Yuvraj SIngh
युवराज सिंह

 

 

 

 

 

 

इलाहाबाद/फूलपुर: फूलपुर लोकसभा सीट जो केशव मौर्या की ओर से अब तक गारण्टेड बीजेपी की समझी जाती थी। माना जाता था कि यह सीट बीजेपी बिना किसी जनसंपर्क, पब्लिक मीटिंग या दूसरे किसी चुनाव प्रचार का प्रयोग किये ही जीत सकती है, यहां केशव मौर्या का नाम ही काफी है बीजेपी को वोट दिलानें में। लेकिन मतगणना के बाद जब रिजल्ट आया तो फूलपुर लोकसभा सीट बीजेपी के नीचे से निकलकर सपा के नीचे शिफ्ट हो गई थी। सपाई साल की दूसरी होली मना रहे थे, भाजपाई नजरे बचा रहे थे।

बहरहाल, फूलपुर लोकसभा सीट बीजेपी द्वारा हारने के बाद हमने पॉलिटिकल एनालिसिस की, और यह समझने की कोशिश किया कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि एक साल पहले रिकार्ड तोड़ मतों से जीत हासिल करने वाली बीजेपी की इस बुरी तरह भद् पिट गई।

स्वंय विश्लेषण करने के बाद हमने भाजपा समर्थकों, भाजपा विरोधी और नोटा को बेहतर विकल्प मानने वाले लोगो से बातचीत कर भाजपा की फूलपुर शिकस्त का कारण जानने की कोशिश की। हमारे विश्लेषण और जनता की राय के आधार पर जो निष्कर्श निकला वो आपके सामने रख रहे हैं।

 

  • क्षेत्रीय सांसद व प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का क्षेत्र व आम भाजपाई मतदाताओं से बराबर दूरी बनाये रखना। अपने क्षेत्र का दौरा न करना भी मतदाताओं का बीजेपी से मोहभंग करने का मुख्य कारण है।
  • केशव मौर्या का स्वजातीय रुझान व संवर्ण मतदाताओं की उपेक्षा।
  • शासकीय व प्रशासनिक तौर पर आम कार्यकर्ताओं की उपेक्षा व पुलिस व प्रशासनिक कर्मियों के द्वारा उनको तवज्जो न दिया जाना।
  • केशव मौर्या का अति स्वाभिमान उनके चेहरे पर साफ झलकता है, जिसे आम जन-मानस घमण्ड समझ बैठता है।
  • यूपी बोर्ड  परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए सख्त कदम उठाना भी बीजेपी को भारी पड़ा है। सब जानते है 80% स्टुडेंट्स सिर्फ पास होने के लिए परीक्षा देते हैं, उनके हिसाब से पास होने के लिए पढ़ाई करना जरूरी नही बल्कि जुगाड़ जरूरी है। साल दर साल जुगाड़ लगता गया और बोर्ड परीक्षा बच्चे पास करते गये। लेकिन इस बार यकायक योगी सरकार नें यूपी बोर्ड परीक्षा को इंतेहाई मुश्किल बना दिया। परीक्षा केंद्रों में सीसीटीवी कैमरे लगवा दिया कि गोया नकल नही करने दूँगा। नकल करनें व करवाने के आदी बना दिए गए नकलची छात्रों और उनके अभिभावकों का आक्रोश योगी के प्रति था। इस बार लाखों छात्रों ने नकल न कर पाने के कारण परीक्षा छोड़ दी थी। शिक्षा माफिया ने भी भाजपा को हराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
  • भाजपा प्रत्याशी का बाहरी होना, जिसके कारण पटेल जाति के मतदाताओं का सपा के स्थानीय स्वजातीय प्रत्याशी की तरफ अप्रत्याशित ध्रुवीकरण हो गया।
  • मायावती के आह्वान पर बसपाई मतदाताओं का सपा को खुलकर वोट देना।
  • उपेक्षा से परेशान भाजपाई केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा केवल स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किए जाने से आहत संवर्ण मतदाताओं का बड़ी संख्या में वोटिंग का परित्याग।
  • वर्तमान में बैंकिंग व्यवस्था से आम लोगों को होने वाली परेशानियां, मोदी का बिना सर-पैर का पकोड़े वाला बयान।
  • घटती जीडीपी, बढ़ती महंगाई, नीरव मोदी, पीएनबी घोटला, लखनऊ के सरकारी भवनों का भगवाकरण।
  • अखिलेश यादव द्वारा फूलपुर और गोरखपुर सीट के लिए व्यापक प्लानिंग और दोनों क्षेत्रों में अपने कार्यकर्ताओं की फौज चुनाव से दो महीनें पहले से ही तैनात करना।
  • जातिगत समीकरणों को समझकर मायावती से हाथ मिलाना भी अखिलेश का एक अकाट्य हथियार था जो पूरी तरह सफल रहा।
  • योगी द्वारा शिक्षामित्रों को हाशिये पर लाकर शिक्षक वर्ग को नाराज करना।
  • तमाम एंकॉऊटरों के बावजूद यूपी से अपराध का न कम होना।
  • सूबे के मुख्यमंत्री की गरिमा को दर किनारे कर योगी आदित्यनाथ का पीएम मोदी के पीछे हाथ बाॉधकर खड़ा रहना लोगो को रास नही आया।

भाजपाई हार का यह मूल निष्कर्श आज सहसों, बाबूगंज, थरवई, गारापुर, लाल गोपालगंज, सराँयचण्डी, फाफामऊ, सराँयगोपाल, इलाहाबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली, नैनी, झूँसी, फूलपुर, हड़िया, मिर्जापुर, देवरिया, गोरखपुर, रोहनिया, अजगरा, वाराणासी आदि के भाजपा समर्थकों व आम जनों से हमारे प्रतिनिधियों द्वारा वार्तालाप करने के बाद सामने आए हैं।

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