अनंत चतुर्दशी 2017: जानिए अनंत चतुर्दशी के महत्व को

anant chaturdashi
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खुशबू

धर्म। क्या आप जानते हैं, भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अनंत चतुर्दशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन अनंत के रूप में श्री हरि विष्‍णु की पूजा होती है। इस दिन रक्षाबंधन की राखी के समान ही एक अनंत राखी बांधी जाती हैं।

जो रूई या रेशम के कुंकुम से रंगे धागे होते हैं। और उनमें चौदह गांठे होती हैं। जो भी स्त्री-पुरुष इस दिन अनंत चतुदर्शी का व्रत करते हैं, वे लोग इस धागे को अपने हाथों में बांधते हैं। पुरुष इस अनंत धागे को अपने दाएं हाथ में बांधते हैं तथा स्त्रियां इसे अपने बाएं हाथ में धारण करती हैं।

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अनंत चतुर्दशी का व्रत एक व्यक्तिगत पूजा है। लेकिन अनन्‍त चतुर्दशी के दिन ही गणपति-विसर्जन का धार्मिक समारोह मनाया जाता है। जो कि लगातार 10 दिन के गणेश-उत्‍सव का समापन दिवस होता है। इस दिन भगवान गणपति की विदाई काफी धूमधाम से होती है। भगवान की प्रतिमा को नदी, तालाब या समुद्र में विसर्जित किया जाता है। गणपति उत्‍सव के इस अन्तिम दिन को महाराष्‍ट्र के साथ-साथ और भी दूसरे शहरों में एक बहुत ही बड़े उत्‍सव की तरह मनाया जाता है।

अनंत चतुर्दशी को भगवान विष्णु का दिन माना जाता है और ऐसी मान्‍यता भी है कि इस दिन व्रत करने वाला व्रती यदि ‘विष्‍णु सहस्‍त्रनाम स्‍तोत्रम्’ का पाठ भी करें, तो उसकी वांछित मनोकामना की पूर्ति जरूर होती है। भगवान श्री हरि विष्‍णु व्रती पर प्रसन्‍न होकर उसे सुख, संपदा, धन-धान्य, यश-वैभव, लक्ष्मी, पुत्र आदि सभी प्रकार के सुख प्रदान करते हैं।

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यही नही, मान्यता यह भी है की अनंत चतुर्दशी व्रत सामान्‍यत: नदी-तट पर किया जाना चाहिए और श्री हरि विष्‍णु की लोककथाएं सुननी चाहिए। परन्तु अगर ऐसा संभव न हो, तो उस स्थिति में घर पर स्थापित मंदिर के समक्ष भी श्री हरि विष्‍णु के सहस्‍त्रनामों का पाठ किया जा सकता है एवं श्री हरि विष्‍णु की लोक कथाऐं सुननी चाहिए।

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