जनमंच विशेष: व्हाट्एप्प ग्रुप के माध्यम से अफवाह फ़ैलाने वाले आखिर ये नफ़रत के सौदागर हैं कौन?

अफवाह
Rumour Mills running on WhatsApp affecting the lives of people...
Share this news...

पहले लगता था कि सिर्फ सांप्रदायिक भीड़ है मगर अब आपके सामने कई प्रकार की भीड़ है। अख़लाक़ की घटना से शुरू हई भीड़ की ये सनक अलवर और पलवल होती हुई अब असम से लेकर धुलिया तक फैल चुकी है…

Dayanand
दयानंद तिवारी

 

 

 

 

 

 

जनमंच विशेष: जिस भीड़ के ख़तरे के बारे में चार साल से लगातार आगाह कर रहा हूं, वो भीड़ अपनी सनक के चरम पर है या क्या पता अभी इस भीड़ का चरम और दिखना बाकी ही हो। कभी गौ रक्षा के नाम पर तो कभी बच्चा चोरी की अफवाह के नाम पर किसी को घेर लेना, मार देना, आसान होता जा रहा है। पहले लगता था कि सिर्फ सांप्रदायिक भीड़ है मगर अब आपके सामने कई प्रकार की भीड़ है। अख़लाक़ की घटना से शुरू हई भीड़ की ये सनक अलवर और पलवल होती हुई अब असम से लेकर धुलिया तक फैल चुकी है। इसने मुसलमान को ही मारा ऐसा नहीं है, इसने हिन्दुओं को भी मारा। पत्रकार शिवम विज ने लिखा है कि व्हाट्सऐप से फैल रही बच्चा चोरी की अफवाह ने पिछले मई से लेकर अब तक 29 लोगों की जान ले ली। आप को अभी भी लगता है कि यह भीड़ मिथ्या है, झूठ है तो फिर आपको विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के ट्विटर हैंडल पर जाना चाहिए।

जहां एक वरिष्ठ और विदेश मंत्री के पद पर बैठी मंत्री के बारे में इतनी गालियां लिखी जा रही हैं कि उनका ज़िक्र करना यहां ठीक नहीं रहेगा। विदेश दौरे से लौटने पर सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर दी जा रही गालियों को लेकर ऑनलाइन पोलिंग शुरू कर दी। 57 फीसदी ने इसे ग़लत माना मगर 43 फीसदी ने माना कि गाली देने की भाषा सही है। इनमें से कुछ को उनकी कैबिनेट के मंत्री भी फॉलो करते हैं। 24 जून को सुषमा स्वराज ने पहली बार ट्वीट किया था। 2 जुलाई तक उनके समर्थन में किसी भी कैबिनेट मंत्री ने बयान तक नहीं दिया न ही गाली देने की इस संस्कृति की निंदा की। बेशक आज देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सुषमा से बात की है और निंदा की है। एक कैबिनेट मंत्री भी इस तरह के ट्रोल के सामने अकेली हैं। बेबस हैं। यह भीड़ ऐसी है जो अपनी सनक को विचारधारा समझ बैठी है। यह असहमत होने वाले के खिलाफ उग्र तो है ही लेकिन समर्थकों में से असहमति के ज़रा से स्वर फूटने पर उसका भी वही हाल करती है। ये बेलगाम भीड़ हवा से नहीं आती है, इसे एक बंद कमरे में सियासी रणनीति के तहत आज़ाद किया जाता है। आप जानते हैं कि इसका नायक कौन है। किसने इस भाषा को राजनीति के भीतर मान्यता दी है। आप उसका नाम जानते हैं। हिन्दू अखबार ने लिखा है कि सुषमा को गाली देने वाले कई लोग बीजेपी के समर्थक हैं और सदस्य भी।

आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में किसने अफवाहों और झूठ को कौन फैला रहा था और फैलाने वाले की राजनीति और विचारधारा क्या है। कम से कम प्रधानमंत्री सुषमा स्वराज के समर्थन में इस संस्कृति की निंदा कर सकते थे। 30 जून को किसी विश्व सोशल मीडिया दिवस पर उन्हें ट्वीट करना याद रहा मगर सुषमा स्वराज के साथ खड़ा होना नहीं। प्रधानमंत्री भी कब झूठ बोल दें पता नहीं, जेल में भगत सिंह से किसी कांग्रेसी नेता के मुलाकात नहीं करने को लेकर झूठ बोल दिया, जिस पर आज तक सफाई नहीं दी। तमाम बुराइयों के बाद भी भारत की राजनीति की भाषा कभी इतनी बुरी और निम्नस्तरीय नहीं रही। अब यह संस्थागत रूप ले चुकी है। आपने गौरी लंकेश की हत्या के समय इस भाषा का नमूना देखा था, फिर भी बहुत से लोग चुप रह गए, तब भी चुप रह गए जब बताया गया कि ऐसी भाषा बोलने वालों को मंत्री फोलो कर रहे हैं। क्या आप कभी उस भारत को पसंद करेंगे जहां अफवाहों के पीछे दौड़ती भीड़ किसी को दौड़ा कर मार रही हो?

महाराष्ट्र के धुले में बच्चा चोरी की अफवाह फैल गई। साकरी तहसील के रायनपाड़ा गांव में रविवार का बाज़ार लगा था। वहां राज्य परिवहन की बस से 5 लोग उतरते हैं, उनमें से एक किसी बच्ची से बात करते हुए देखा जाता है, तभी लोगों को शक होता है कि ये बच्चा चोर हो सकते हैं। पिछले कुछ दिनों से यहां अफवाह चल रही थी कि इलाके में बच्चा चोर आए हैं। बस लोगों ने इस शक को सबूत मान लिया और पांचों को घेर कर मारना शुरू कर दिया। बाज़ार में भी मारा और फिर इन्हें पंचायत भवन में भी ले गए। वहां बंद कमरे में इतना मारा कि पांचों वहीं मर गए। 23 लोग गिरफ्तार हैं। मरने वाले पांचों गोसावी समुदाय के हैं। ग़रीब परिवार के लोग होते हैं जो भिक्षाटन से अपना जीवन चलाते हैं। इनके नाम हैं भरत शंकर भोसले, दादाराव शंकर भोसले, राजू भोसले, भरत मालवे और अनंगू इंगोले। ये जान की ख़ैर मांगते रहे मगर भीड़ को होश ही नहीं था।

ये सब ख़बरें चल रही हैं, मगर आप सोचिए कि लाखों करोड़ों फोन में व्हाट्सऐप के ज़रिए अफवाहें फैल रही हैं। प्रशासन की चेतावनी हर फोन में हर लोग तक नहीं पहुंच सकती है। धुले की खबर की चर्चा पूरे महाराष्ट्र में होने के बाद भी महाराष्ट्र के ही नासिक में भीड़ पागल हो गई।

मालेगांव में अगर पुलिस सक्रिय न हुई होती तो चार लोगों और एक बच्चे के साथ क्या होता आप कल्पना कर सकते हैं। पुलिस के मुताबिक आधी रात से छोड़ा पहले कोई कॉल आता है कि संदिग्ध लोग मालेगांव में एक बच्चे को ले जा रहे हैं। हज़ारों लोगों की भीड़ ने उसे घेर लिया। पुलिस के लिए भी उस भीड़ में घुस कर इन चार लोगों को छुड़ा पाना आसान नहीं रहा होगा। भीड़ का आक्रोश अफवाह के आधार पर था और मात्र अफवाह के आधार पर इतने लोग कानून हाथ में लेने के लिए बाहर आ गए थे। पुलिस ने जिन चार लोगों को बचाया है वो परभणी ज़िले के हैं, और मालेगांव आए हुए थे। इनके साथ एक दो साल का बच्चा था। बच्चा उन्हीं का है।

जब आप एक समुदाय से नफरत करते हैं या आपको ट्रेन किया जाता है कि एक समुदाय से नफरत करो तो फिर आप किसी से भी नफरत और हिंसा करने के लिए ट्रेन हो जाते हैं। हिंसा आपके राजनीतिक और सामाजिक स्वभाव का हिस्सा बन जाती है। 30 जून को चेन्नई में भी बिहार के दो लोगों को बच्चा चोर समझ कर बुरी तरह पीट दिया गया। गोपाल साहू और बिनोद बिहार मेट्रो में काम करने वाले मज़दूर हैं और सड़क पार करते हुए एक बच्चे को रोक रहे थे मगर लोगों ने बच्चा चोर समझ लिया।

असम के करबी आंगलांग ज़िले में निलोत्पल और अभिजीत के इंसाफ के लिए फेसबुक में एक ग्रुप भी बना है जिसे 60000 से अधिक लोग फॉलो कर रहे हैं। 8 जून को निलोत्पल दास और अभिजीत नाथ पिकनिक से लौट रहे थे, मगर पंजुरी में एक भीड़ ने उनकी जीप रोकी और उतार कर मारना शुरू कर दिया। दोनों असम के ही रहने वाले थे तो अहोमिया में भी लोगों से कहा कि वे बच्चा चोर नहीं हैं। लेकिन भीड़ ने दोनों को मार दिया। इस घटना के ठीक पहले हैदराबाद पुलिस ने अलर्ट जारी किया था कि सोशल मीडिया में बच्चा चोरी गैंग को लेकर अफवाह उड़ाई जा रही है। वहां भी भीड़ ने तीन लोगों को घेर कर मार दिया। इसके अलावा 10 लोगों को भीड़ ने पेड़ और बिजली के खंभे से बांध कर बुरी तरह पीटा था। हमारी सहयोगी उमा सुधीर ने इस लगातार रिपोर्ट की है।

इसके शिकार चाहें हिन्दू हों या मुसलमान ज्यादातर ग़रीब लोग हैं। कितनी आसानी से किसी ने अफवाहों के ज़रिए ग़रीबों को अफवाहों में उलझा दिया है। दक्षिण त्रिपुरा में अफवाहों से लड़ने के लिए वहां की सरकार ने इंतज़ाम किया था। सुकांत चक्रवर्ती को 500 रुपये की दिहाड़ी पर रखा गया था। सुकांत जिस गाड़ी से जा रहे थे उस पर लाउडस्पीकर भी लगा था जिससे वह अनाउंस कर रहा था कि ऐसी अफवाहों से सावधान रहें। अफवाह फैल गई कि एक बच्चे को किडनी निकाल कर फेंक दिया गया है। इसके कारण लोगों और पुलिस में ही झड़प हो गई। किडनी स्मगलर से लेकर बच्चा चोर गिरोह की बातें होने लगीं। इसी झगड़े में सुकांत फंस गया और मारा गया। जून के महीने में ही 10 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

2017 में झारखंड में ऐसी ही अफवाह उड़ी बच्चा चोरी के गिरोह की। हल्दी पोखर से राजनगर जा रहे नईम, सज्जू, शिराज और हलीम को सौ से भी अधिक लोगों ने घेर लिया और इतना मारा कि नईम, सज्जू और शिराज की मौत हो गई। उसी रात पूर्व सिंहभूम में विकास, गणेश और गौतम को भीड़ ने घेर लिया। इन तीनों को मार दिया। क्या हिन्दू क्या मुसलमान, भारत में नेशनल सिलेबस ने एक ऐसी भीड़ हर जगह तैयार कर दी है जो किसी को भी मार सकती है। झारखंड में एक दर्जन से ज्यादा मॉब लींचिग की घटना हो चुकी है।

एक वीडियो में कासिम नाम का युवक खेत में घायल पड़ा है। इनसे आधी उम्र के बच्चे इन्हें मार रहे हैं। खुद को गौ रक्षक समझ कर कानून से ऊपर समझने वाले इन लड़कों ने हत्या का पाठ कहां से सीखा, किस राजनीति से सीखा। बहुत लोग आज भी इस हकीकत को नहीं देखना चाहते हैं। भीड़ ने ज़मीन पर पड़े कासिम को पानी तक नहीं दिया। दिल्ली से 70 किमी दूर यूपी के हापुड़ में भी ऐसी एक घटना के होने की चर्चा है। कहा जा रहा है कि गौ हत्या की अफवाह के कारण भीड़ ने 45 साल के क़ासिम को धेर लिया और मार दिया। 65 साल के समयुद्दीन घायल हो गए। पुलिस जांच कर रही है।

राष्ट्रीय अपराध शाखा ब्यूरो के अनुसार 2016 में 63 हज़ार से अधिक बच्चे ग़ायब हो गए थे। ये सारे चोरी के मामले नहीं हैं मगर तब तो इस तरह की अफवाह हवा में नहीं थी और लोग हत्या नहीं कर रहे थे। हमारे पास इस तरह की भीड़ की मानसिकता को लेकर कोई मुकम्मल अध्ययन नहीं है, न हो रहा होगा वरना इसकी प्रवृत्ति पर बात हो सकती थी।

Share this news...

Hindi News से जुड़े अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें फॉलो करें।