दस्तक अखबार में छपी ये हैरान करने वाली खबर

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Betab Ahmad
बेताब अहमद

दिल्ली। दिल्ली की रोहिणी कोर्ट के एडिशनल सेशन जज अमित कुमार ने ब्लात्कार के मामले में एक अजीबोग़रीब फैसला सुनाया। जो हज़म नहीं हो पा रहा है एक मुस्लिम लड़की के साथ चौदह बरस की उम्र में रेप हो जाता है और जज साहब मुजरिम को इस बिना पे रिहा कर देते हैं कि शरियत के हिसाब से वो लड़की बालिग़ थी।

ये कौन सी तुक है भाई? क्या हिंदुस्तान में अब जजों के हिसाब से कानून चलेंगे अगर जज साहब मुलज़िम को छोड़ना चाहेंगे तो शरीयत का सहारा लेंगे, तो फिर शरीयत में तो बलात्कारी को संगसार (पत्थर से मार मार के मर डालना) की सज़ा है तो फिर दो वो सज़ा, और भी कई ऐसे शरीयत के कानून है जो हमारे कानून से मेल नहीं खाते, मतलब अब ये होगा कि अगर किसी को बचाना है तो शरीयत की गली निकाल ली जाएगी।

है ना हैरानी वाली बात, तो फिर हर वो अधिकार जो आम लोगों को 18 की उम्र के बाद मिलते है आप उसे मुस्लिमों के लिए 14 में कर दो, और फिर सबसे बड़ी बात रेप तो रेप होता है। बालिग़ के साथ हो या नाबालिग के साथ हो सज़ा तो मुजरिम को मिलनी ही चाहिए अगर न्याय की कुर्सी पे बैठें लोग ही अन्याय करेंगे तो कैसे काम चलेगा।

इसलिए अब देश में हिंदू मुस्लिम भेद-भाव वाले क़ानून को हटाना होगा और मोहम्मदे अरबी का दिन तख्त पर लाना होगा। अब तो शरिया क़ानून के हक में मनसे पार्टी के अध्यक्ष राज ठाकरे और हिंदू सेना ने भी बलात्कारियों के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए इस्लामी क़ानून लागू करने की मांग की है।

आखिर कब तक इंसाफ के लिए हिंदू, सीख, बोध, जैन, ईसाई, और मुस्लिम बहनें दर बदर भटकती रहेगी?

अब हम सभी देश वासियों को मिलकर बलात्कारियों को कटघरे में लाना होगा और शरीयत के मुताबिक आरोपियों को सज़ा दिलाना होगा। लेकिन इससे पहले हमें मिलकर मोहम्मदे अरबी का दिन तख्त पर लाना होगा।

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