अधूरे ताजमहल को पूरा होने की उम्मीद लिए आज भी जी रहा है आमलोगों का शाहजहां

File Photo: फैजुल हसन क़ादरी
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Pankaj Pandey
पंकज पाण्डेय की रिपोर्ट…

विशेष। प्रेम, प्यार, इश्क, मोहब्बत, लव न जाने कितने नामों से पुकारा जाता है। इन सभी शब्दों में एक अजीब सी मिठास, एक अजीब सा सौंदर्य, एक अजीब सी शीतलता है। इन नामों को सुनते ही हमारे दिल में एक तरंग उठने लगती है। कहते है प्रेम खुद को किसी के खातिर खुद को भूलकर उसमे ही डूब जाने का नाम है। पथरीली, कंटक रेगिस्तान में दोपहर की तपती रेत की जैसी इस डगर पर चलने वाले प्रेमी कहलाते है। इन में कुछ को मंजिल मिल जाती है कुछ रास्ते में ही दम तोड़ देते है तो कुछ जिंदगी भर यादों के सहारे गुजार देते हैं।

साधन-सम्पन्न लोगों द्वारा अपने प्यार के इजहार और प्रदर्शन के कई नायाब और खूबसूरत नमूने बनाये जाने की घटना तो आपने जरूर पढ़ा और देखा होगा। किन्तु, आज मैं आपको जिस शख्स के बारे में बताने जा रहा हूँ। उनके बारे में जानकर और सुनकर आपकी आँखें नम हो जाएगी। फैजुल हसन क़ादरी…जी हाँ। फैजुल हसन कादरी…उत्तरप्रदेश के बुलन्दशहर के रहने वाले एक रिटायर्ड पोस्टमास्टर।

कादरी साहब का निकाह बेगम तजम्मुल से हुआ। बेगम तजम्मुल से इन्हें बेपनाह, बेसुमार मुहब्बत थी। पर दुर्भाग्यवश इन्हें कोई संतान नहीं हुई। जवानी नौकरी और एक दूसरे के मुहब्बत में कट गई पर जब नौकरी से रिटायर्ड हुए तो अकेलापन दोनों को चुभने लगा। 2011 में बेगम तजम्मुल भी इन्हें अकेला और बेसहारा करके इस लोक से रुखसत हो गई। संसार छोड़ने के पहले संतान के अभाव से दुखी और एकाकीपन से परेसान तजम्मुल ने कादरी साहब से कहा था कि उनके जाने के बाद कोई उन्हें याद करने वाला नहीं होगा। कादरी साहब को यह बात चुभ गई। क़ादरी साहब ने उसी दिन बेगम तजम्मुल से वादा किया कि अपनी स्मृतियां जिन्दा रखने के लिए वे उनकी याद में उनकी मज़ार पर एक खूबसूरत स्मारक बनाएंगे और मरने के बाद वे खुद भी वहीं दफ़न होंगे।

बेगम के मरने के बाद बुलंदशहर के अपने गांव कसेर कलां में उन्होंने गहने और अपनी कुछ जमीन बेचकर तथा पेंशन के पैसों से पत्नी की याद में ताजमहल की शक्ल में एक स्मारक का निर्माण शुरू किया। यह निर्माण कार्य 2015 तक तो चला, लेकिन उसके बाद पैसे की तंगी के चलते निर्माण कार्य रुक गया। लोगों को जब इस बात का पता चला तो अधूरे स्मारक को पूरा करने के लिए कई लोगों ने उनकी मदद की कोशिश की, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया। उनका मानना है कि अपने प्रेम का स्मारक उन्हें अपने ही पैसों से बनवाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जब उनके बारे में सुना तो वह तो वह उनके पास पहुंचकर उनसे उनकी मदद की पेशकश की। क़ादरी साहब ने न केवल मदद लेना अस्वीकार कर दिया बल्कि उल्टे उन्हें अपनी जमीन देते हुए उनसे गांव में एक स्कूल के निर्माण का अनुरोध कर दिया। आज  उनके द्वारा बेगम को दिए गए वचन भले पुरा न हो पाया पर निर्माणाधीन अधूरे उस स्मारक के बगल में स्कूल का निर्माण पूरा हो चुका है।

‘मिनी ताजमहल’ कहे जाने वाले इस स्मारक का ढांचा बनकर तैयार है, लेकिन फिनिशिंग का काम अभी भ बाकी है। 81 वर्षीय क़ादरी दिन भर अपने घर की खिड़की पर बैठकर सामने बने इस अधूरे स्मारक सुनी आँखों से ताकते रहते हैं। बीवी की मौत के बाद के अकेलेपन में उनके भीतर का कवि भी जाग गया है।

उन्होंने कविताएं भी लिखनी शुरू कर दी। बीवी केअधूरे स्मारक को देखकर वे जोर-जोर से अपनी कविताएं सुनाते हैं। उन्हें भरोसा है कि अपने छोटे-से पेंशन से थोड़े-थोड़े पैसे बचाकर वे अपने जीवनकाल में ही अपने सपनों के ताजमहल का निर्माण ज़रूर पूरा करेंगे।

आइए!!! हमसब आम लोगों के इस शाहज़हां की सेहत और लम्बी उम्र के लिए दुआ करें ताकि उनके सपनों के ताजमहल पूरा हो जाए जहाँ वह अपनी बेगम की मज़ार के बगल की खाली जगह में चैन की नींद सो सकें।

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