संविदा कर्मियों का बढ़ता प्रचलन और स्थाईकरण की लड़ाई पर विशेष रिपोर्ट

Sanbida karmi
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संविदा कर्मियों की अच्छी भली बटालियन खड़ी हो गयी है। पढ़ लिखकर खाली घूमने से बेहतर मानकर लोग कम पैसे पर काम करने के लिये राजी हो जाते हैं…

Mithiliesh Pathak
मिथिलेश पाठक 

विशेष। धीरे-धीरे सरकारी व्यवस्था में गैर सरकारी या संविदा व्यवस्था पैर पसारती जा रही है। अधिकांश विभागों में संविदा व्यवस्था लागू है। संविदा व्यवस्था का विस्तार दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है। इस व्यवस्था से किसी को लाभ हो चाहे न होता है लेकिन सरकार को जरूर लाभ मिल रहा है और सरकारी खजाने में बचत हो रही है।

एक शिक्षक को कम से कम 32 से 35 हजार वेतन दिया जाता है लेकिन उसी काम को शिक्षा मित्र उस समय पैतिस सौ सुर आज दस हजार में ही कर रहे हैं। यहीं हाल हर विभाग में रिक्त पदों के लिये है और जो सरकारी वेतन दिया जाता है उसके आधे से भी कम में वहीं कार्य करने वाले गली गली डिग्री लिये टहल रहें है।

कम्प्यूटर अॉपरेटर हो, ग्राम रोजगार सेवक हो, चाहे स्वास्थ्य विभाग में टेक्निकल सहायक और चाहे डाक्टर और कम्पाउंड हो। हर जगह संविदा कर्मी तैनात हैं। बाल विकास परियोजना में आगंनबाड़ी भी संविदा कर्मी हैं। संविदा कर्मियों की अच्छी भली बटालियन खड़ी हो गयी है। पढ़ लिखकर खाली घूमने से बेहतर मानकर लोग कम पैसे पर काम करने के लिये राजी हो जाते हैं।

सबसे कम पैसों में कोई कार्य कर रहा तो वह हैं- शिक्षा प्रेरक जिनकी संख्या प्रदेश में लाखों की है, और इनमें महिलाओं की भी भारी भागीदारी है। इन्हें मात्र 2 हजार का मानदेय दिया जाता है वह भी कई जिलों में 15 से 25 माह तक नही मिल सका है। जिले के अधिकारी इनसे बेहतर कार्य की उम्मीद करते हैं, परन्तु यह कोई नही सोंचता कि यह 2 हजार में अपना परिवार कैसे चलाएं। 2 हजार में महीने भर सब्जी भाजी खरीदनी मुश्किल है, वह भी ऐसे हालात में जब वर्षों से पैसा ही न मिला हो।

सरकार बेरोजगारों की इस मजबूरी का फायदा उठा रही है। कहावत है कि जिसे बैठने की जगह मिल वह धीरे धीरे पैर फैलाने और बाद में करवटें लेने लगता है। संविदा कर्मियों की भी दशा कुछ वैसी ही है और अब हर विभाग में तैनात संविदा कर्मियों ने अपना सगंठन खड़ा कर लिया है। सगंठन के जरिये संविदा कर्मी समान काम और समान वेतन की मांग कर रहें हैं। स्थाईकरण की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन के साथ लाठी चार्ज सब कुछ हो रहें हैं।

कुछ दिनों पहले रोजगार सेवकों, प्रेरक, शिक्षा मित्रों और आगंनबाड़ियों पर लाठी चार्ज हो चुका है। जब आंदोलन हद पार करता है तब प्रशासन सारे वसूलों सिद्धांतों को ताख पर रखकर कानून व्यवस्था को बहाल करता है। अभी तीन चार दिन पहले आंगबाड़ी से जुड़ी महिलाओं पर निर्मम लाठीचार्ज हो चुका है। एक बात तो सही है कि संविदा कर्मियों की कोई तयशुदा जिन्दगी की उम्र नहीं है और उन्हें कभी भी हटाया जा सकता है।

लेकिन यह भी सही है कि जब जिंदगी का सबसे कीमती समय निकल जाता है और तब अगर उसे नौकरी से निकाला जाता है तब वह कहावत(धोबी के कुत्ते की तरह न घर का न घाट का रह जाता है)। उसके बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं रह जाता है और सोचने वाली बात है कि जब सरकारी नौकरी करने वाले का भला जब अपने वेतन से नहीं हो पाता है तो इन संविदा कर्मियों के बच्चों का पालन पोषण इतने कम वेतन से कैसे हो सकता है।

जो संविदा कर्मी एक लम्बे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और सरकारी नौकरी की उम्र गुजरने के करीब आ गयी हैं उन्हें तोहफे के तौर पर स्थाईकरण दिया जा सकता है। जब तक इन संविदा कर्मियों का समावेश न हो जाय तब सरकारी भर्तियों में रोक लगाने की जरुरत है। आखिरकार यह संविदा कर्मी भी तो हमारे आपके परिवार से ही निकले हैं इनका दुख सुख अपने सुख दुख जैसा है।

कहीं यह बाहर से तो आये नही हैं। सरकार की माया भी समझ में नहीं आ रही है क्योंकि वह एक तरफ तो पचास साल के बाद कार्य करने की क्षमता समाप्त होने और रिटायरमेंट देने की बात कह रही है तो दूसरी तरफ साठ साल के बाद रिटायर होने वाले को फिर से नौकरी पर लाने की बात कह रही है।

सरकारी बातें भी लोगों की समझ से परे होती जा रही हैं, जो वर्षों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं, उनके लिये तरह-तरह के टेस्ट की तैयारी हो रही है, परन्तु जो देश प्रदेश के जनप्रतिनिधि या नेता हैं, जिनके कंधे पर देश प्रदेश का भार हैं उनके लिए किसी योग्यता और टेस्ट की जरूरत नही। कुछ तो ऐसे हैं जिन्हें बात करने के संस्कार भी नही हैं। परन्तु उन पर उंगली उठाने वाला कोई नही है।

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