गंदे राजनीति के दुष्चक्र में फंसा भविष्य

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कीर्ति माला के विचार,

विद्या का मंदिर कहा जाने वाला स्कूल, कॅालेज, विश्वविद्यालय  ने गुरू-शिष्य की परंपरा को बिल्कुल ही खत्म कर दिया है। विश्वविद्यालय जहॉं गुरू -शिष्य की परंपरा को राजनीति नाम के गंदे कीड़े ने पूरी तरह दूषित करके रख दिया है।

जहॉं लोग एक अच्छे व्यक्तित्व को निखारने आते है, वहां राजनीति के कुरीतियों में अपनी छवि खोते हुए दिख रहे हैं। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करने में ही अपना किमती समय बर्बाद कर देते है। शायद उन्हें ये नही पता होता है कि जिसकी आलेचना कर रहे है, वो तो अपनी मंजिल प्राप्त कर चुके है। लेकिन मेरा भविष्य तो गर्त में जा रहा है।


अभी तो बहुत ही मजा आता है,लेकिन वक्त जब बित जाता है तो अपनी गलती न देख अपनी किस्मत को कोसते हुए नजर आते है। जिन पर यह कहावत बिल्कुल फिट बैठता है-“अब पछताए होत क्या जब चिड़ियां चुग गई खेत”


उदाहरणस्वरुप-  मैने अपने विश्वविद्यालय में ही अच्छे-अच्छे बच्चों को राजनीति के गंदे माहौल में बिगड़ते हुए देखा है,वहीं दूसरी ओर  पढने वाले बच्चे  जो कुंठित होकर जी रहे है,केवल डिग्रियां लेने के कतार में वो भी शामिल हो रहे हैं।सारी सुविधाओं के बावजूद गंदे राजनीति के चंगुल में बच्चे कुछ भी  नहीं सीख पाते हैं।


इसमें ना ही शिक्षक और ना ही बच्चों की गलतियां है,गलती तो है सिर्फ और सिर्फ माहौल और विचारधारा का है।एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के फेर में ये बच्चे अपने भविष्य को अंधकारमय बना रहे है, उन्हें ये सोचना होगा कि हमारा भविष्य इन सब चीजों पर ही निर्भर नहीं है। बल्कि इन सब को नजरअंदाज कर आगे बढना ही हमारी सफलता है।

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