दो राज्यों के तीन सीटों के चुनाव परिणाम के मायने

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Janmanchnews.com
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Pankaj Pandey
पंकज पाण्डेय

जनमंच विशेष। बिहार के दो असेम्बली और एक लोकसभा उपचुनाव के साथ ही उत्तरप्रदेश के दो लोकसभा उपचुनाव का परिणाम आ गया है। बिहार के दो असेम्बली चुनाव में जहानाबाद से आरजेडी उम्मीदवार की जीत हुई, जबकि भभुआ सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की है।जबकि अररिया लोकसभा सीट राजद के हिस्से आई।

 

वहीं उत्तरप्रदेश की दोनों सीट सपा ने बीजेपी को हराकर जीत ली। मीडिया ने इस चुनाव को बिहार में नीतीश कुमार और उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के साख से जोड़कर प्रचारित किया था। इस आधार पर दोनों अपने-अपने साख बचाने में नाकामयाब रहे।

दोनों ही राज्य में भाजपा की हार इस प्रकार होगी, किसी को उम्मीद नहीं थी। खासकर अभी कुछ दिनों पहले जिस प्रकार से भाजपा ने पूर्वोत्तर के राज्य में अपना झंडा लहराया था वह देखकर तो बिल्कुल भी नहीं। पर तीनों सीटों पर लोकसभा के उपचुनाव में जिस तरह से भाजपा की हार हुई। वह आने वाले वर्ष में भारतीय राजनीति की एक नई दिशा की ओर संकेत कर रही है।

खासकर 89 से जिस सीट,गोरखपुर पर भाजपा का एकछत्र राज्य था और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की पकड़ थी, उसपर इसप्रकार की हार ने मुख्यमंत्री के साख को बट्टा लगा दिया। सालभर के अपने सुशासन के दावे के बाद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से खाली होने के बाद हुए इन सीटों पर भाजपा की हार इन दोनों की हार कही जा सकती है।

अब इन जगहों पर हार का विश्लेषण करें…

क्या इन तीनों सीट पर हार एनडीए के चार सालों के कार्य की समीक्षा कहा जाए? क्या यह मान लिया जाए की एनडीए सरकार के चार साल के कार्यों को देखकर जनता का इस सरकार से अब मोहभंग हो रहा है? शायद यह मानना या कहना अभी जल्दबाजी होगी। फिर हार क्यों? सवाल मुश्किल है। पर जबाब आसान है।

बिहार में नीतीश कुमार महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए में चले गए। नीतीश का एनडीए में चले जाने का फायदा अररिया लोकसभा उपचुनाव में भाजपा नहीं भुना पाई। लोगों की नज़र में लगातार चुनाव- दर -चुनाव जीतते आ रही भाजपा की कार्यशैली अब लोकतान्त्रिक नहीं कही जा सकती है। भाजपा एक तानाशाही शासन के तौर पर सरकार चला रही है। इस सरकार में सवाल के जबाब में सवाल दागने की एक नई संस्कृति पनप चुकी है। सरकार के कार्यों से खिन्न होने के बजाय आज मतदाता इन दलों के प्रवक्ताओ के रवैये से नाखुश दिखते है। अहंकार के भाव के साथ इन दलों के प्रवक्ता न केवल विपक्षी दलों के सवाल के जबाब में कटाक्ष करते है बल्कि जिन सवालों का जनता जबाब चाहती है उनका जबाब ही नहीं देते है।

सरकार के बजाय इन प्रवक्ताओं के रवैये से जनता अधिक क्षुब्ध है। वहीं, केंद्र सरकार अपने चार सालों के कार्यकाल में काम की बजाय प्रचार पर अधिक फोकस कर रही है। धरातल पर यह अब दिखने लगा है। बड़े नेताओ की कार्यशैली ने जमीनी कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा कर दी है। इसका भी असर इस चुनाव में दिखा। क्रेन्द्र सरकार की कार्यशैली कमोवेश बिहार में भी देखी जा रही है। इस राज्य में डबल इंजन की सरकार आने के बाद काम कम और प्रचार अधिक की मानसिकता हो गई। नेताओं,मंत्रियों के दावों के विपरीत काम धरातल पर होता दिख नहीं रहा है।

इसका प्रभाव भी इस चुनाव परिणाम में दिखा। लालू प्रसाद यादव के खिलाफ लगातार की गई टिप्पणी ने मतदाताओं को यह विपरीत सन्देश  देने में कामयाब हुआ की वह दोषी कम पीड़ित अधिक है। पिछले कई सालों से एनडीए में भाजपा की कार्यशैली से दूसरे घटक दल नाराज है।विकल्पहीनता की वजह से वह दल में बने हुए तो है पर अच्छे अवसर की तलास कर रहे है।ऐसे में इस चुनाव परिणाम के बाद आसन्न राज्यसभा के चुनाव के बाद कुछ दलों का अलग होना संभावित है।

दूसरी ओर उत्तरप्रदेश में मायावती का बिना गठबंधन किए अखिलेश को केवल समर्थन देने पर जो चुनाव परिणाम आया है, वह विपक्ष को एक नई राह दिखाती है। पिछले कुछ सालों में अजेय मानी जाने वाली भाजपा को हराया भी जा सकता है कि सोच विपक्षी दल को लामबंद करने में सफल होगी। ऐसे में केवल इन तीन सीटों पर हुए उपचुनाव का परिणाम आने वाले 19 के चुनाव को खासा दिलचस्प बना दिया है।

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