मुलायम, राहुल और पवार से मिलकर चंद्रबाबू नायडू ने देश की राजनीति में गैर भाजपाई का बीज बो दिया

Chandra babu
Janmanchnews.com
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Rahul Yadav
राहुल यादव
रायबरेली। समाजवादी पार्टी के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और चंद्रबाबू नायडू की मुलाकात और एक साथ फोटो खिंचवाना ये अपने आप में देश के वर्तमान हालात को बयान करने के लिए काफी है। समाजवादी पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव एवं सपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात के पूर्व श्री नायडू राहुल गांधी, शरद पवार से भी मुलाकात कर चुके हैं।

राहुल गांधी के साथ चंद्रबाबू नायडू का संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित करना राजनैतिक गलियारों की हलचल का प्रत्यक्ष उदाहरण है। भारतीय राजनीति के मौसम वैज्ञानिक माने जाने वाले चन्द्रबाबू नायडू की सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार के साथ की तस्वीरों को देखकर सत्ता रूढ़ भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहे विपक्ष समेत भारतीय जनता पार्टी विरोधी दलों के साथ-साथ उनके समर्थकों ने भी राहत की सांस ली होगी।

अगर हम अकेले कांग्रेस पार्टी की बात करें तो चंद्रबाबू नायडू और राहुल गांधी का एक साथ आना राहुल एंड कंपनी को एक मजबूत स्तम्भ मिलता दिख रहा है वह इस लिए क्योंकि तेलुगू देशम पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों का जन्म ही कांग्रेस विरोध के चलते हुआ था। उनकी सारी राजनीति ही कांग्रेस विरोध के इर्द गिर्द घुमती रही है।

यही कारण रहा है कि वो बड़े सहजता से वामदलों के साथ भी शामिल होते रहे हैं और बीजेपी के साथ भी हांथ मिलाकर सत्ता पर काबिज होने में पीछे नही हटे हैं। कभी यूनाईटेड फ्रंट के पाले में बैठे तो कभी एनडीए का हिस्सा बन गए। इसलिए राहुल और चंद्रबाबू का एक साथ आना राजनैतिक गलियारों में हलचल होने का संकेत देता दिखाई पड़ रहा है।

जब राहुल और चंद्रबाबू नायडू बाहर आए तो पत्रकारों से कहा कि हां यह जरूर है कि हम दोनों दलों का एक इतिहास रहा है, मगर अब हमने यह तय किया है कि हम उसकी चर्चा नहीं करेगें हम अब वर्तमान और भविष्य की बात करेगें।

उन्होंने आगे कहा कि वक्त आ गया है जब देश, देश की संस्थाओं और उसके भविष्य के लिए हमें एकजुट होना ही पड़ेगा। दोनों नेताओं ने कहा कि हमें देश को बचाना है और जो भी बीजेपी का विरोध करता है हम उनके पास जाएगें और साथ लाने की कोशिश करेगें।

राजनीति के जानकारों का मानना है कि देश में जो हालात पैदा हो रहे हैं उससे एक गैर बीजेपीवाद पैदा होने के भरपूर आसार दिख रहे हैं। ठीक उसी तरह जब एक वक्त में गैर कांग्रेसीवाद तेजी से पनपा था, इंदिरा गांधी के शासन के वक्त खासकर इमरजेंसी के बाद। भारतीय राजनीति के मौसम विशेषज्ञों की मानें तो अभी हालात कुछ वैसे ही बनते जान पड़ रहे हैं।

कारण कोई भी हो लेकिन देश में बीजेपी के खिलाफ गैरबीजेपीवाद के रूप में विपक्षी दल इकट्ठा होते जा रहे हैं। विपक्ष के कई दिग्गज नेताओं की कोशिश है कि देश भर में यदि कोई बड़ा गठबंधन नहीं बन पाता है तो राज्यवार गठबंधन बनाया जाए, जैसे तेलंगाना में टीआरएस के खिलाफ कांग्रेस, तेलुगू देशम, सीपीआई और तेलंगाना संघर्ष समिति जैसे दलों ने एक मोर्चा बनाया है। जो यह बताने के लिए पर्याप्त जान पड़ता है कि भाजपा से लड़ने के लिए विपक्ष कोई पैतरा आजमाने से पीछे नही हटेगा।

भाजपा शासित कई राज्य ऐसे भी हैं जहां बीजेपी के सहयोगी दल गठबंधन में अपने-आप को असहज महसूस कर रहे हैं। यानी राजनीति में कब कौन किसकी गोद में खेलेगा इसका भान प्रतीत हो रहा है। ऐसा ही कुछ पनप रहा है असम में जहां राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर भाजपा की सहयोगी असम गणपरिषद अपने आप को असहज महसूस कर रही है।

वह बीजेपी से अलग होने का मन बना रही है। हमेशा से भारतीय जनता पार्टी की कुटिल नीति रही है कि छोटे दलों को मिलाकर उनका वजूद समाप्त कर दिया जाए। थोड़ा देर से ही सही लेकिन अब बीजेपी के सहयोगी दलों को भी भान हो चुका है कि भाजपा गाहे-बगाहे छोटे/क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक पर कब्जा करने की फ़िराक में है जिससे उनका क्षेत्रीय अस्तित्व खत्म हो जाएगा।

उत्तरप्रदेश में यदि सपा बसपा और कांग्रेस साथ आते हैं। बिहार में आरजेडी, कांग्रेस और मांझी साथ होते हैं, महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी और कर्नाटक में जेडीएस, कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके और कांग्रेस साथ रहते हैं और जिसकी संभावना भी काफी है, तो 2019 में बीजेपी को काफी कड़ी चुनौती पेश की जा सकती है।

यही बात उन तमाम नेताओं की समझ में आ गई है, जिन्होंने अपनी राजनीति तो शुरू की गैर कांग्रेसीवाद से मगर अब बीजेपी के खिलाफ इकट्ठा हो रहे हैं। हालांकि किसी भी देश की प्रजातांत्रिक सियासत पूरी तरह संभावनाओं पर टिकी हुई रहती है। चूंकि भारत की सियासत प्रयोगधर्मी भी है, इसलिए यहां संभावनाओं की राजनीति कुछ ज्यादा ही प्रभावी रही है।

देश की लोकतांत्रिक राजनीति में आजादी के बाद से अब तक कई सारे प्रयोग हुए। विचारधाराओं की नींव पर टिके ये प्रयोग सफल भी रहे। यह अलग बात है कि प्रयोगधर्मी सियासत की अवधि लंबी नहीं रही।

इसी क्रम में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद साढ़े चार साल में हुए अनेक अच्छे-बुरे फैसलों के कारण एक और सियासी प्रयोग मूर्त रूप लेता दिख रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में राजनीति का ऊंट भाजपा के खिलाफ लामबंद हुए एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे विपक्षियों की करवट बैठेगा या एक बार फिर से सत्ता की बॉल भाजपा के पास ही रहेगी यह देखना दिलचस्प होगा।

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