यूपी बोर्ड परीक्षाओं का गिरता स्तर और सरकार की चाक चौबंद व्यवस्था

यूपी बोर्ड
Outsiders are supplying cheating materials to students sitting in UP Board Exams inside...
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शासन प्रशासन डाल-डाल तो शिक्षा और नकल माफिया पात पात, परीक्षा कक्ष में बाहर बैठे नकल माफिया और अभिभावक स्टुडेंट्स तक नकल सामाग्री आराम से पहुँचा रहे हैं…

Ajit Pratap Singh
अजित प्रताप सिंह

 

 

 

 

 

कानपुर देहात: करीब 6 दशक पहले एक समय वह भी था जब कक्षा दो-चार-पाँच और मिडिल अर्थात कक्षा 8 पास लोगों की गिनती पढ़ें लिखे में होती थी। उस समय जो दसवाँ व बारहवाँ पास कर लेता था वह साहब बनकर कुर्सी पर बैठ जाता था। पढ़ाई लिखाई का महत्व हर समय रहा है और आजादी के पहले राजा अपनी प्रजा की शिक्षा की व्यवस्था स्कूल खोलकर करते थे और कुछ ऐसे भी राजा थे जो शिक्षा को अपने राज्य में अनिवार्य कर रखा था और जो अपने बच्चे को स्कूल नहीं भेजता था उससे जुर्माना वसूला जाता था।

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Guardians, Parents, Friends and well wishers are passing answer materials to students sitting in boards exam; govt badly failed in terms of preventing unfair means…

इससे पहले शिक्षा धार्मिक अध्यात्मिक गुरुओं के आश्रमों में दी जाती थी और उसमें राजा और रंक दोनों के बच्चे गुरुकुल में रहकर सेवा करते तथा शिक्षा ग्रहण करते थे। आजादी के बाद शिक्षा का दायरा बहुत वृहद हो गया है और हर तरह की शिक्षा दी जाने लगी है। सारी शिक्षाओं की जननी बोर्ड परीक्षाएं होती हैं।

इंटर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही अन्य शिक्षाओं की शुरुआत होती है। कुछ ही प्रतियोगिताएं एवं परीक्षाएं ही ऐसी होती हैं जिनके लिए स्नातक या परास्नातक डिग्री हासिल करने के बाद ही लिया जा सकता है अन्यथा इंटर पास करने के बाद ही सारी तकनीकी, व्यवसायिक, कृषि, चिकित्सा आदि की परीक्षाएं दी जा सकती है। इसलिए हर आदमी कम से कम इंटर पास होना चाहता है क्योंकि इंटर तक शिक्षा आज के जमाने में जरूरी मानी जाती है क्योंकि इंटर परीक्षाफल देखकर ही आगे चयन किया जाता है।

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Government is claiming to conduct fair UP Board Exams, pictures say it all how Government failed to curb unfair means in board exams…

हाई स्कूल, इंटर को मनुष्य की शिक्षा की नींव माना जाता है और इसी नींव के सहारे जीवन शिक्षा के भविष्य का निर्धारण किया जाता है। यहीं कारण है कि इधर चार पांच दशकों से डिग्री का महत्व बढ़ गया है और हर व्यक्ति डिग्री हासिल करना चाहता है। इसी लक्ष्य प्राप्ति के लिए धनादोहन तक होने लगा है और परीक्षाएँ मजाक बनती जा रही हैं। इन बोर्ड परीक्षाओं को नकल विहीन बनाने का पूरा नाटक हर बार होता है और औपचारिकता पूरी की जाती है।

जो परीक्षा केंद्र मिलकर सरकारी अमला की भावनाओं के साथ नहीं चलते हैं उनके यहाँ परीक्षार्थियों को सवाल के जबाब लिखना दुश्वार कर दिया जाता है और एक ही पाली में एक नहीं बल्कि कई दस्ते छापा मारते रहते हैं। इधर बोर्ड परीक्षाएँ काफी बदनाम हो चुकी है और इस कलंक को मिटाने का प्रयास नब्बे के दशक में तत्कालीन भाजपाई मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने किया था जिसे आज भी याद किया जाता है।

परीक्षाओं का नकल विहीन होना राष्ट्रहित में जरूरी है क्योंकि किसी चींज की दक्षता परीक्षा के माध्यम से ही आँकी जाती है। यहीं इंटर पास लोग ही कल प्रशासनिक अधिकारी राजनेता इंजीनियर आदि बनेंगे और इनके कंधे पर देश का भविष्य होगा। पिछले दिनों इंटर हाईस्कूल परीक्षाओं एवं परीक्षाफलों में फैले भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो चुका है लेकिन शिक्षा जगत में पैदा हुये शिक्षा माफियाओं के चलते आज भी बोर्ड की परीक्षाफलों को नकल विहीन बनाना सरकार के लिए एक चुनौती बना हुआ है।

देहात में एक कहावत है कि- “वहीं छिनार वहीं डोला के साथ रखवाली में”। बिल्कुल कुछ ऐसी ही स्थिति इधर बोर्ड परिक्षाओं एवं परीक्षाफलों में पैदा हो गयी है। हालाँकि प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ने बोर्ड व स्नातक परीक्षाओं को नकल विहीन बनाने के लिये ऐड़ी से चोटी का जोर लगाया हुआ हैं। परीक्षा केन्द्रों और कक्षों में सीसीटीवी कैमरे तक लगा दिए है लेकिन शासन और प्रशासन डाल-डाल तो शिक्षा और नकल माफिया पात पात।

06 फरवरी से शुरू हुई बोर्ड परीक्षाओ में नकल विहीन परीक्षा कराने का ढिढोरा पीटा जा रहा है लेकिन परीक्षाएँ कितनी नकल विहीन सम्पन्न हो रहीं हैं यह तो भविष्य के गर्त में है।

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