स्कूल जाने की उम्र में कूड़े की ढ़ेर में जिन्दगी तलाश रहे मासूम, जब पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया!

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Mithiliesh Pathak
मिथिलेश पाठक

श्रावस्ती। आज बाल दिवस है, छोटे छोटे कस्बों से लेकर राजधानी तक, इसे बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। पिछ्ले वर्षों की तरह इस बार भी मासूमों के हितों में तमाम सारी घोषणाऐं की जा रही है। मगर इन घोषणाओं का क्या, ये तो सिर्फ घोषणाएं मात्र है।

इन घोषणाओं पर चर्चा करना इस लिए आवश्यक हो जाता है, कि कहीं लोग यह न समझ बैठें कि आज के आधुनिक युग में बुजुर्गों की कहावतें पुरानी हो गयी है। कहने का तात्पर्य यह है कि बुजुर्गों की कहावत “चौकी की बात-चौके मे नही होती” आधुनिक युग के नेताओं पर आज भी भारी है।

जिसकी वजह से इक्कीसवीं सदी में भी मासूमों के हाथों में कलम की जगह जूठन बर्तन होते हैं तथा सुबह जब इन्हे स्कूल में होकर प्रार्थना के लिए हाथ जोड़ने चाहिए तब ये मासूम श्रावस्ती में विदेशी पर्यटकों से या तो भीख मांग रहे होते हैं या उन्हें फूल बेच रहे होते हैं। एक सर्वे के अनुसार श्रावस्ती प्रदेश में सबसे कम जनसंख्या वाले जनपदों की सूची में पांचवें नम्बर पर है। बावजूद इसके सबसे अधिक बालश्रम वाले जनपदों के टॉपटेन की सूची में सामिल है।

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उक्त आंकड़े जनपद में कार्यरत बाल श्रमिकों का है। वहीं अगर जनपद से बाहर जाकर मजदूरी करने वाले बाल श्रमिकों तथा अंर्तराष्ट्रीय पर्यटन स्थली श्रावस्ती समेत अन्य स्थानों पर विदेशी पर्यटकों को फूल बेचते, भीख मांगते, कूड़ा बीनते मासूमों को भी इसी मे जोड़ दिया जाय तो श्रावस्ती के नतीजे और भी भयावह होंगे। साथ हीं कई अनचाहे रिकार्डों को संजोने वाले श्रावस्ती को एक और अनचाहा रिकार्ड मिल सकता है। जिससे श्रावस्ती को अन्य जनपदों के सामने एक बार फिर शर्मसार होना पड़ सकता है। रही बात होटलों पर मासूमों द्वारा जूठन धोने की तो इसे पूरे जनपद में कहीं भी देखा जा सकता है।

भीख मांग रहे मासूमों का पर्यटक करते हैं वीडियो ग्राफी…

ऐसा नहीं है कि पर्यटन स्थली मे भीख मांग रहे व फूल बेच रहे मासूम बच्चों पर किसी जिम्मेदार की नजर नहीं पड़ती है। खादी वाले आते हैं चले जाते हैं। जब कोई अधिकारी आता है तो खाकी वाले साहब से दूर रहने की हिदायत देते हैं। नजदीक जाने पर गालियों की बौछार के साथ दो चार कंटाफ भी रशीद कर दे रहे हैं।

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ऐसे में मासूम विदेशी पर्यटकों की चरण वंदना करते हुए “बाबू रूपी-बाबू रूपी” की रट लगाते हुए पीछे पीछे चले जा रहे होते हैं और पर्यटक घूम घूम कर मासूमों की सुरीली आवाजें अपने कैमरों में कैद कर रहे होते हैं। जिसे शायद अपने देश में भारत के “मेक इन इंडिया” के सच के रुप मे दिखायेंगे, जो अंर्तराष्ट्रीय पटल पर देश के लिए शर्मनाक होगा। मगर खाकी बच्चों को मांगने से रोकने के बजाय उनके मांगने के तरीकों पर खीसें निपोर रही होती है।

परिवार को दो जून की रोटी देने के लिए बीनता हूँ कूड़ा: सौरभ पंडा

ऐसा नहीं है कि कूड़ा बीनने वाले मासूम स्कूल नही जाना चाहते। स्कूल जाने की स्थिति में, उक्त मासूमों के परिवार के सामने भुखमरी की समस्या उत्पन्न हो जायेगी। जिससे हो सकता है कि झारखंड की घटना का श्रावस्ती में पुनरावृत्ति हो जाये। ऐसी स्थिति से बचने के लिए ये मासूम स्कूल न जाकर कूड़ा बीनकर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं।

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इसका खुलासा बाल दिवस की पूर्व संध्या पर “जनमंच न्यूज़” से कूड़ा बीनने वाले एक दस वर्षीय मासूम सौरभ पंडा ने किया। सौरभ ने बताया कि स्कूल जाने का तो हमारा भी मन हो रहा है। मगर हम लोगों के पास न तो घर है, और न हीं खेत। ऊपर से हमारे पिता सात साल से बीमार हैं, जो हमेशा लेटे रहते हैं। ऐसे में एक भाई व एक बहन समेत मां का देखभाल तथा घर में दो जून की रोटी की व्यवस्था हमे हीं करनी पड़ती है। अब आप हीं बताओ मैं स्कूल जाऊं तो हमारे परिवार का क्या होगा?


सहयोगी माता प्रसाद वर्मा

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