शिवलिंग पर क्यों किया जाता है जल और बेलपत्र का अभिषेक….जानें वैज्ञानिक रहस्य

Shiva
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रजनीश की कलम से,

धर्म डेस्क। शिवलिंग का अर्थ है शिव का आदि अनादि स्वरूप। शून्य, आकाश, अनंत, ब्रह्माण्ड, और निराकार परमपुरुष होने के कारण इसे शिवलिंग कहा जाता है। वैसे ही स्कन्दपुराण में कहा गया है कि आकाश स्वयं शिवलिंग है तथा धरती उसका पीठ और सब अनंत शून्य से पैदा हो उसी लय में होने के कारण इसे शिवलिंग कहा गया है।

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महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे बेलपत्र, आक, धतूरा आदि सभी न्यूक्लियर एनर्जी सोखने वाला है।देशभर में ज्यादातर शिवलिंग वहीं पाए जाते हैं जहां जल का भंडार हो।जैसे नदी, तालाब, बर्फ़ीली पहाड़, झील इत्यादि। उसी प्रकार विश्व के सारे न्यूक्लियर प्लांट भी समुद्र के पास ही हैं । शिवलिंग और न्यूक्लियर रिएक्टर मे काफ़ी समानताएं है तथा दोनों की संरचनाएं भी एक सी होती है।

महाशिवरात्रि
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शिवलिंग की संरचना बेलनाकार होती है तथा एटॉमिक रिसर्च सेंटर रिएक्टर की संरचना भी बेलनाकार ही होती है। न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखने के लिए जो जल इस्तेमाल किया जाता है उस जल को किसी और प्रयोग में नही लाया जाता है ठीक उसी तरह शिवलिंग पर जो जल चढ़ाया जाता है उसको भी प्रसाद के रूप में ग्रहण नही किया जाता है।

क्योंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसी कारण जल निकासी को लांघा नही जाता। सृष्टि के आरंभ में महाविस्फोट के पश्चात ऊर्जा का प्रवाह वृताकार तथा ऊपर व नीचे की ओर हुआ इसके फलस्वरूप एक महाशिवलिंग प्रकट हुआ जिसका वर्णन हमे लिंगपुराण, महाशिवपुराण, स्कन्दपुराण आदि में मिलता है।

ऐसी मान्यता है कि आरम्भ में निर्मित शिवलिंग इतना विशाल था कि देवतामून भी मिलकर शिवलिंग का अनंत न पा सके। पुराणों में यह भी कहा गया है कि प्रत्येक महायुग के पश्चात समस्त संसार इसी शिवलिंग में समाहित होता है तथा इसी से पुनः सृजन भी होता है।

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