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Akhilesh Yadav- janmanchnews.com

गठबंधन दिल से नहीं सिर्फ दल से 

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 मीनाक्षी मिश्रा की रिपोर्ट।
लखनऊ। भले ही समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो गया हो, लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का सियासी गणित बिगड़ गया है.

कारण ये है कि कई ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां से सपा ने भी प्रत्याशी उतार रखे हैं और कांग्रेस ने भी. कुछ सीटों पर अभी तक प्रत्याशी तक का ऐलान नहीं हो सका है. ऐसी स्थिति में प्रत्याशी से लेकर कार्यकर्ताओं में असमंजस है कि किससे लड़ें और किसका समर्थन करें.

अभी तक प्रत्याशियों का असमंजस दूर करने के लिए फिलहाल कोई आगे आता नहीं दिख रहा है. पहले दौर की नाम वापसी की अंतिम तारीख 27 जनवरी है. ऐसे में 24 घंटे से भी कम समय में सब कैसे होगा, ये सवाल खड़ा हो गया है.

प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ये दावा जरूर कर रहे हैं कि नाम वापसी की अंतिम तारीख से पहले तस्वीर बिलकुल साफ हो जाएगी.
सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन के ऐलान के दौरान साफ किया गया था कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से 298 सीटों पर सपा और 105 सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी उतारेगी.

गठबंधन के बाद सपा ने प्रत्याशियों की एक और सूची जारी कर दी, जिसके बाद अब तक पार्टी के कुल प्रत्याशियों की संख्या 324 पहुंच चुकी है. यानी 298 से 26 ज्यादा. सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए असमंजस की बात ये है कि इन 26 सीटों में से करीब 20 सीटें ऐसी हैं, जहां से कांग्रेस के विधायक आते हैं या पिछले चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था.

कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली रायबरेली, अमेठी और सहारनपुर जिले की सीटों पर ये ही स्थिति है. यही नहीं अलीगढ़ में दो सीटों पर सपा और कांग्रेस, दोनों ने प्रत्याशी उतार दिए हैं. यहां की कोल सीट से समाजवादी पार्टी ने अज्जू इशहाक को उतारा है. उनके सामने कांग्रेस के विवेक बंसल भी मैदान में हैं. अलीगढ़ की ही खैर सीट पर भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है.

इन सीटों की बात करें तो कांग्रेस विधान मंडल दल के नेता प्रदीप माथुर की मथुरा सीट से सपा प्रत्याशी उतार चुकी है. लखनऊ की कुछ सीटों पर मामला फंसा हुआ है. यहां अब तक प्रत्याशी का ही ऐलान नहीं किया गया है.

उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 8 मार्च के बीच सात चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के अखिलेश धड़े के बीच गठबंधन के बावजूद बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा.

केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद जिस तरह से बीजेपी को दिल्ली और बिहार में करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा है. वैसे में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है.

मुख्यमंत्री चेहरे को सामने न लाकर एक बार फिर बीजेपी ने पीएम  मोदी के चेहरे पर दांव खेला है. इसका कितना फायदा उसे इन चुनावों में मिलेगा वह 11 मार्च को सामने आ ही जाएगा.