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चुनाव आयोग ने डाला रंग में भंग! इन्हे हुआ फायदा!

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गणतंत्र दिवस पर पत्रकार रोबिन कपूर की कलम से लेख      
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उत्तर प्रदेश/फरुखाबाद विधानसभा चुनाव का बिगुल बजते ही सम्पूर्ण प्रदेश की तरह फरुखाबाद में भी प्रत्यासी चुनाव की तैयारी में लग गए हैं। जैसे ही उत्तर प्रदेश में आदर्श आचार संहिता लगते ही सारे राजनैतिक पार्टियो की प्रचार सामग्रियो को प्रशासन ने हटवा दिया ।अगर चुनाव आयोग इतना सख्त रवैया ना अपनाता तो राजनैतिक पार्टियों को रंग जमाने की छूट मिल जाती। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर पूरे उत्तर प्रदेश में फ्लेक्स बोर्ड लगे होते। चुनाव आयोग के द्वारा उठाये गये इस सख्त कदम से अब चुनाव सूना रह गया है। कभी यही 2012 में चुनाव श्रंगार होता दिखता था। विभिन्न चौराहों व मार्गो पर झण्डों की सजावट होती थी।फिल्मीं तर्ज में पार्टी के गाने हर वक्त बजा करते थे। पोस्टर व पर्चों से गलियां पटी रहतीं थी।हर राजनैतिक पार्टी का अलग अलग भण्डारा चला करता था। प्रत्यासी अपने पक्ष में वोट डालने के लिए वोटरो को तरह तरह के लुभावनी नीतियां अपनाते थे। यहाँ तक की प्रतियाशियो के द्वारा वोट की खरीद फरोख्त भी होती थी। इसके साथ साथ जमकर ग्रामीण इलाको व पार्टी कार्यालयो में अंगूर की  पेटी चलती थी। अंगूर की पेटी के शौकीन लंबे समय तक खूब खाते पीते थे। व वाहनों व रिक्शो पर लगे लाउडस्पीकर पार्टी व प्रत्याशी के नाम से डब किये गए फ़िल्मी तरानें सुनने को मिलते थे। और गली मोहल्ले चौराहे व पार्टी कार्यालयो को झंडो बैनरो पोस्टरों से सजावटें की जाती थी। लेकिन अब सब सूना-सूना नजर आता है। ना गली मोहल्लों मार्गो में लाउडस्पीकर पर डब किये फ़िल्मी तराने और ना ही गली मोहल्लों में लगे बैनर पोस्टर मिलते हैं। साथ ही ना कोई रैली ना ही कोई सभा ऐसा क्यों आखिर लोकतंत्र का यह पर्व है तो फिर सूना क्यों ? पर्व पर तो खुशियां मनाई जाती हैं।बाजे-गाजे बजते हैं,फिर लोकतंत्र का पर्व ऐसा क्यों रखा गया । बस इसका कारण एक हैं चुनाव आयोग का कडा आदेश। अगर किसी राजनैतिक पार्टी या प्रत्याशी के द्वारा चुनाव आयोग के आदेशों का उल्लंघन किये जाने पर आयोग के द्वारा कड़ी कार्यवाही की जाती है। आयोग के आदेश से मतदाताओं ने भी चैन की सास ली हैं। क्योंकि पूर्व चुनावों में पार्टी व प्रत्याशी द्वारा मतदाता पर पक्ष में मत देने का दबाव भी बनाया जाता था। मगर सख्त हुए आयोग से मतदाताओ ने भी चैन की सांस ली है।
सख्त हुए आयोग से सबसे बड़ा प्रभाव चुनाव सामग्री तैयार करने वाली प्रिटिंग प्रेसों पर पड़ा है। जिस कारण प्रिंटिंग प्रेसें पूरी तरह ठप पड़ी हैं ।
हम  चुनाव आयोग के इस कड़े कदम को लोकतंत्र के लिए सुरक्षित कदम मानते है ।