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old man get marry with child

83 वर्षीय वृद्ध सुखराम ने 30 साल की रमेशी से रचाई शादी, विडियो जरुर देखें

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– पुत्र की चाहत में गांव सैंमरदा के सुखराम बैरवा बने दूल्हा, पहली पत्नी ने भी जताई रजामंदी
– गाजे-बाजे से राहिर गांव पहुंची बरात, अनूठी शादी को देखने उमड़े लोग

Shubham Tiwadi

शुभम तिवाड़ी

करौली। हर व्यक्ति अपनी वंशवृद्धि और बुढ़ापे में लाठी का सहारा पाने की आस में बेटे की ख्वाहिश रखता है। इकलौते बेटे की असामयिक मौत में गमजदा गांव सैंमरदा के 83 वर्षीय सुखराम बैरवा की पुन: शादी की चाहत भी करीब दो दशक बाद यकायक जाग्रत हो गई। इसमें मौजूदा पत्नी की रजामंदी पर ही फुलेरा दूज को सुखराम बैरवा ने दूल्हा बनने के लिए सेहरा बांधा और घोड़ी भी चढ़ी।

उनकी बारात भी गाजे-बाजे के साथ गांव राहिर पहुंची। इस अनूठी शादी को देखने लोगों की काफी भीड़ उमड पडी। वहीं खुद से आधी से भी कम उम्र 30 वर्षीय रमेशी के साथ सात फेरों में समाज के पंच-पटेल व रिश्तेदार गवाह बने। 

देखें विडियो….


फुलेरा दूज के बडे सावे पर शनिवार को शादी-ब्याहों की बडी भरमार रही। हालांकि यह अनूठी शादी ही पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय रही। गांव सैंमरदा के 83 वर्षीय सुखराम बैरवा ने वंशवृद्धि एवं पुत्र प्राप्ति की जिज्ञासावश ही यह दूसरी शादी रचाई है। दूल्हा-दुल्हन की इस जोडी को देखने के लिए ससुराल व पीहर पक्ष दोनों ही जगह लोगों में आतुरता दिखाई दी।

पहली पत्नी की रजामंदी पर ही रचाया ब्याह….

सुखराम बैरवा ने 83 की उम्र मंे दूसरी शादी रचाने से पहले मौजूदा पत्नी बत्तो की भी रजामंदी ली। इसके बाद ही ढोल-नंगाडों के साथ पूरे रीति-रिवाजों के अनुरूप शादी रचाई। उल्लेखनीय है कि सुखराम बैरवा की पहली पत्नी के दो बेटी व एक बेटा था, बेटियों की कई साल पहले ही शादी भी कर दी। जबकि इकलौते बेटा कान्हू की 30 की उम्र में असामयिक बीमारी के कारण मृत्यु हो गई।

इससे वंशचलन व बुढापे की लाठी की जिज्ञासा में पुत्ररत्न की प्राप्ति की मंशा से यह पुन: शादी का सपना संजोया। उन्होंने गांव राहिर की 30 वर्षीय कद में काफी छोटी रमेशी के साथ दांपत्य सूत्र का बंधन समाज के पंच-पटेल व रिश्तेदारों के साथ अपनों के बीच स्वीकार किया है।

गाजे-बाजे के साथ हुई निकासी व चढ़ाई…

शनिवार को गांव सैंमरदा में बैंड बाजे डीजे की धुन पर घोड़ी पर सवार दूल्हा सुखराम बैरवा की निकासी पूरे रीति-रिवाजों के अनुरूप हुई। गांव की महिलाओं ने मंगल गीत गाए और खुशी का इजहार किया। दूल्हा के चेहरे पर भी बुढापे में शादी की मुस्कान नजर आई। इसी प्रकार गांव राहिर में तोरण मारने से पहले धूम-धडाके से चढाई की रस्म अदायगी भी हुई।

बारातियों ने जमकर नाचकूद भी किया। शादी से पूर्व निमंत्रण कार्ड बांटे गए, लग्न-टीका और अपने गांव सहित करीब 12 गांवों के लोगों को माडा (भोज) भी दिया। रविवार को राहिर से दुल्हन के रूप में विदा होकर गांव सैंमरदा आई रमेशी का सेड-चौरा पूजन के साथ पहली पत्नी ने अगुवानी की और खुशी जताई। इसमें खुद दूल्हा की बेटी व अन्य रिश्तेदार भी शरीक हुए।

वानप्रस्थ की जगह फिर से गृहस्थ का बोझ…

धार्मिक ग्रंथों की रीति-नीति के अनुसार मानवीय जीवन में बाल्यकाल, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ व वानप्रस्थ आश्रम के अलग-अलग उम्र में विभिन्न पडाव निर्धारित हैं। इसी के अनुरूप 75 वर्ष आयु के बाद वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति खुद को जोडकर ईश्वर का भजन-पूजन कर धार्मिक आस्था के वशीभूत हो जाता है। ठीक इसी समय में सुखराम बैरवा ने वानप्रस्थ की जगह पुन: गृहस्थ जीवन का बोझ उठाने की ठानी है। ग्रामीण व रिश्तेदारों ने भी भगवान से इस नवदंपत्ति को शीघ्र ही संतान प्राप्ति (पुत्ररत्न) का सुख देने की कामना की है।

प्रोपर्टी भोगने वाला तो चाहिए…

वृद्ध सुखराम व पहली पत्नी बत्तो बैरवा ने शादी के हंसी-खुशी माहौल के बीच भास्कर को दूरभाष पर बताया कि उनकी काफी प्रोपर्टी है। इसे संभालने वाला कोई वारिस तो चाहिए। इसी उम्मीद में यह दूसरी शादी उनकी सहमति पर ही रचाई गई है।

उन्होंने बताया कि सुखराम बैरवा ने किशोरावस्था से ही दिल्ली में कारीगरी का कार्य किया। काफी मेहनत मजदूरी के बाद ठेकेदारी करते हुए खूब धनार्जन भी कर लिया। जिसमें कुछ बैंक बैलेंस और लाखों का दिल्ली में एक प्लॉट भी है, वहीं गांव में 7 बीघा अपनी  पुश्तैनी भूमि भी है।