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Abdul sattar and Daud ibrahim

अब्दुल सत्तार को सामना ने बताया था दाऊद का करीबी, मंत्री बनाने से शिवसेना पर उठे सवाल

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New Delhi: मुंबई महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार में कभी अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के करीबी बताए जाने वाले अब्दुल सत्तार को मंत्री बनाए जाने पर सवाल उठने लगे हैं। शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ ने ही 1994 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में अब्दुल सत्तार को दाऊद का करीबी बताया था। 25 साल पुरानी सामना की यह रिपोर्ट अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है और शिवसेना के नेताओं को इसका जवाब देते नहीं बन रहा है।

सामना ने 11 जून, 1994 को ‘शेख सत्तार के दाऊद गिरोह से करीबी संबंध’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की थी। तब अब्दुल सत्तार कांग्रेस में थे और उन्होंने शिवसेना के पार्षद को चुनाव में हराया था। सत्तार औरंगाबाद जिले के सिल्लोड क्षेत्र से विधायक हैं। यही नहीं, 1993 के मुंबई विस्फोट मामले में मौत की सजा पाए याकूब मेमन के लिए दया का अनुरोध करने वाले विधायकों में भी सत्तार शामिल थे।

पिछले साल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर सत्तार ने पार्टी छोड़ दी थी। बाद में वह शिवसेना में शामिल हुए और विधायक बन गए। सीएम उद्धव ठाकरे ने पहले मंत्रिमंडल विस्तार में अब्दुल सत्तार को कैबिनेट मंत्री बनाया है। इससे शिवसेना के नेताओं व कार्यकर्ताओं में भी नाराजगी है। उनका कहना है कि चुनाव से पहले पार्टी में आए नेता को इतनी जल्दी मंत्री बनाना ठीक नहीं है। औरंगाबाद क्षेत्र को मंत्रिमंडल में जगह ही देनी थी तो तीन बार के विधायक संजय शिरसाट को मंत्री बनाया जाना चाहिए था।

सत्तार ने नहीं दिया कोई जवाब

मिड डे ने इस पर जब सत्तार की प्रतिक्रिया लेनी चाही तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया। शिवसेना की प्रवक्ताओं नीलम गोरे, मनीषा कयांदे और प्रियंका चतुर्वेदी में से किसी ने भी इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। शिवसेना के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने जरूर ठाकरे के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि जब सामना में खबर छपी थी, तब अगर सत्तार के दाऊद से संपर्क होता तो उनके खिलाफ कार्रवाई की गई होती, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई इसका मतलब है कि उनका अंडरवर्ल्ड से कोई संबंध नहीं था।

शिवसेना पर सवाल उठ रहे 

ठाकरे मंत्रिमंडल में मुंबई के मलाड से कांग्रेस विधायक असलम शेख को शामिल किए जाने पर भी सोशल मीडिया पर शिवसेना पर सवाल उठ रहे हैं। शेख ने 1993 के मुंबई विस्फोट मामले में याकूब मेमन के लिए राष्ट्रपति से दया का अनुरोध किया था। तब सामना ने अपने एक संपादकीय में इसका विरोध किया था और मेमन के लिए दया की मांग करने वालों को देश का दुश्मन तक बताया था।