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ऐसे कुछ ग़लत फैसले जिसने मायावती का अस्तित्व लगभग समाप्त कर दिया

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अखिलेश यादव के साथ तो अभी उम्र है लेकिन इस हार ने मायावती और उनकी पार्टी के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है…

Shawab Khan

शबाब ख़ान

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को गौर से देखें तो यह तीन नेताओं के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था- भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती।

इस चुनाव में तीनों की सियासत दांव पर लगी थी। कहा जा रहा था कि इनमें से जो जीतेगा वह लंबी छलांग लगाएगा और हारने वाला काफी पीछे खिसक सकता है।

2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट हासिल न कर पाने वाली मायावती के लिए यह चुनाव करो या मरो जैसा था। अमित शाह के पास नरेंद्र मोदी, संघ और पार्टी हैं, इसलिए वे हारते तब भी सियासत में दमदार बने रह सकते थे। अखिलेश यादव के साथ अभी उम्र है। लेकिन, मायावती के लिए इस हार ने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। आइये जानते हैं उन वजहों और फैसलों को जिन्हें मायावती की अब तक की सबसे बड़ी हार के लिए जिम्मेदार माना जा सकता है।

100 मुस्लिम प्रत्याशियों को चुनाव में उतारना…

मायावती ने अपने प्रचार से पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि इस बार खास तौर पर दलित-मुस्लिम गठजोड़ उनकी रणनीति की ताकतवर धुरी है। इस मकसद को पूरा करने के लिए ही मायावती पूरे चुनाव में मुस्लिमों को रिझाते हुए नजर आईं। उन्होंने प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 97 पर मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था।

अपनी हर जनसभा में वे सीधे-सीधे मुसलमान मतदाताओं से मुखातिब होती थीं। उन्हें वोट का हिसाब अपने अंदाज़ में समझाती थीं कि भाजपा को वे ही हरा सकती हैं इसलिए मुसलमान साइकिल की सवारी छोड़ें और हाथी की तरफ बढ़ें। इसी क्रम में मायावती ने दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सहित कई मुस्लिम धर्मगुरुओं से अपने समर्थन में वोट देने की अपीलें भी कराईं।

जानकारों की मानें तो मायावती का ये फैसला उन्हें उल्टा पड़ गया। मुस्लिम समुदाय को ज्यादा तव्वज्जो दिए जाने की वजह से सवर्ण और पिछड़ा वर्ग उनके हाथ से छिटक गया। हालांकि, गैर यादव पिछड़ा वर्ग के मायावती के हाथ से छिटकने का एक कारण भाजपा की रणनीति भी है जो शुरू से ही दलित, पिछड़ों और अति पिछड़ों को अपनी ओर करने पर ही केंद्रित थी।

बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों वाली और मुस्लिम बहुल सीटों पर भाजपा की जीत से पता लगता है कि बसपा के प्रत्याशी को अति पिछड़ा और पिछड़ा वर्ग का सहयोग बिलकुल भी नहीं मिला है।


स्वामी प्रसाद मौर्य को महत्वपूर्ण न मानना…


स्वामी प्रसाद मौर्य ने चुनाव से करीब छह महीने पहले बसपा छोड़ दी थी। इसका कारण बसपा द्वारा उनके बेटे और बेटी को टिकट न देना माना जाता है। राज्य विधानसभा में नेता विपक्ष और 20 साल तक बसपा से जुड़े रहे मौर्य के पार्टी छोड़ने को मायावती ने एक छोटी घटना बताया था। मौर्य सहित पार्टी के तीन बड़े नेताओं के बसपा छोड़ने पर मायावती का कहना था कि वे पहले ही उन्हें पार्टी से बाहर करने का मन बना चुकी थीं।

बसपा की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकार कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों में कुशवाहा-मौर्य समाज की अच्छी खासी भागीदारी है और इस समाज को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी बसपा में मौर्य के पास ही थी। यही कारण था कि पिछड़ा वर्ग को अपने पाले में करने की रणनीति पर चल रहे अमित शाह ने बसपा छोड़ते ही स्वामी प्रसाद मौर्य को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया।

भाजपा जानती थी कि केशव प्रसाद मौर्य के राज्य भाजपा का प्रमुख बनाने के बाद अगर स्वामी प्रसाद मौर्य भी पार्टी में आ जाते हैं तो कुशवाहा-मौर्य समाज का भरोसा जीतने में उसे आसानी हो जायेगी। चुनाव नतीजों से पता चलता है कि भाजपा ऐसा करने में पूरी तरह कामयाब भी रही है।

गैर जाटव दलित वोट बैंक की अनदेखी करना…


बसपा के गठन के समय से ही उत्तरप्रदेश में दलित वोट बैंक उसका आधार रहा है। इस चुनाव से पहले के चुनावी नतीजों को देखें तो पता चलता है कि खराब से खराब परिस्थितियों में भी दलितों ने मायावती का साथ कभी नहीं छोड़ा। लेकिन, इस चुनाव में गैर जाटव दलितों का ज्यादातर हिस्सा भाजपा के साथ चला गया।

यही वजह है कि यूपी की 85 आरक्षित सीटों में से 70 से ज्यादा पर भाजपा ने कब्जा जमाया है। जानकार कहते हैं कि पिछले तीन चुनावों से मायावती इस समाज को अपना मानकर अन्य जातियों को रिझाने में लगी रही जिसका इस समाज में गलत संदेश गया। पिछले कुछ समय में देश और राज्य में दलितों के साथ हुई कई घटनाओं में मायावती की निष्क्रियता भी दलित समाज की उनके प्रति नाराजगी की एक अहम वजह है।


प्रचार के लिए पुराने ढर्रे का ही इस्तेमाल…


2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के चुनाव प्रचार से साबित हो गया था कि पार्टियों को अपने प्रचार के तरीकों को बदलना पड़ेगा। भाजपा ने इस चुनाव में मीडिया और सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया था। अपने चुनाव प्रचार के तरीके को लेकर भाजपा के एक बड़े नेता कहते हैं कि जब देश की 65 फीसदी आबादी 35 साल से कम उम्र के लोगों की हो तब आप इंटरनेट की दुनिया को कैसे छोड़ सकते हो।


आम आदमी पार्टी और नीतीश कुमार ने जहां इस मामले में बड़ी तेजी से सीख ली वहीं मायावती अपने पुराने ढर्रे पर ही चलती रहीं। इस पूरे चुनाव में एक मात्र बसपा ही थी जिसका टेलीविजन और इंटरनेट पर कभी विज्ञापन नहीं देखा गया। जिस दौर में प्रधानमंत्री मोदी से लेकर लालू प्रसाद यादव तक लगभग हर नेता ट्विटर से अपनी बात कहता है उस दौर में मायावती सहित बसपा के लगभग सभी बड़े नेताओं के ट्विटर अकाउंट तक नहीं हैं।


मुख्तार अंसारी को पार्टी में शामिल करना


उत्तर प्रदेश में मायावती की छवि एक सख्त नेता के साथ-साथ एक सख्त मुख्यमंत्री की भी रही है। 2007 में इसी वजह से राज्य के लोगों ने उन पर भरोसा जताया था। उस समय चुनाव प्रचार के दौरान एक नारा काफी प्रचलित हुआ था, ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, मोहर लगेगी हाथी पर’। उत्तरप्रदेश में सख्त कानून व्यवस्था देने के मामले में आज भी बसपा से ऊपर किसी और दल को नहीं गिना जाता है। लेकिन, इस चुनाव में मायावती ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने उनके समर्थकों सहित कइयों को चौंका दिया। यह फैसला था 12 साल से जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी और उनके भाइयों को बसपा में शामिल करने का।

अंसारी बंधुओं को पार्टी में शामिल करने के पीछे मायावती का उद्देश्य पूर्वांचल सहित कई सीटों पर मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर करना था। लेकिन, जानकार कहते हैं कि यह फैसला भी मायावती पर उल्टा पड़ गया। इससे उन्हें मुस्लिम वोटों का तो फायदा मिला नहीं उल्टी सख्त प्रशासक की छवि को भी नुकसान पहुंचा। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने उनके इस फैसले के सहारे उनकी सख्त छवि का जमकर मखौल उड़ाया। चुनाव नतीजे बताते हैं कि मुख्तार अंसारी की एक मऊ सीट जीतने के अलावा मायावती को अपने इस फैसले से नुकसान ही हुआ है।

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