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मैं बसाना चाहता हूँ स्वर्ग धरती पर आदमी जिसमें रहे बस आदमी बनकर

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Naveen Sharma

नवीन शर्मा की कलम से…,

विचार। आप में से बहुत लोगों ने मुकेश की प्यारी आवाज में यह मधुर गीत सुना होगा। मेरी तरह ही कई लोग ‘पहचान’ फिल्म के इस गाने को बेहद पसंद करते होंगे। मेरे सपनों की दुनिया का रंग-ढंग बस इतना- सा ही है, लेकिन इस छोटे से ख्वाब को नेस्तनाबूद करने में तो दुनिया भर के धूर्त और बेहद शक्तिशाली नेता लगे हुए हैं। बस अपनी सत्ता की धौंस दिखाने के लिए इन लोगों ने पूरी दुनिया को तबाह और परेशान कर रखा है।

दुनिया को सैकड़ों बार नष्ट करने के हथियार जमा कर रखे हैं…

अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, भारत, पाकिस्तान जैसे परमाणु हथियार संपन्न देशों ने इतने एटम बम तैयार कर रखे हैं जिससे इस पृथ्वी को कई बार तबाह किया जा सकता है। इसे आला दर्जे का पागलपन ही कहेंगे ना। यहां पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों दो वक्त की रोटी मुश्किल से मिलती हो। करोड़ों लोग विभिन्न बीमारियों का ढंग से इलाज नहीं करा पाने की वजह से मर जाते हों। करोड़ों बच्चे ढंग की शिक्षा नहीं ले पाते हों तो ऐसी स्थिति में अरबों रुपयों के हथियार के धंधे का क्या मतलब है।

अब दुनिया जब ग्लोबल विलेज बन गई है, तो दुनिया के प्रबुद्ध लोगों को इन शातिर नेताओं को इतिहास के कूड़ेदान में डाल देना चाहिए। हम अपनी प्यारी-सी हरी-भरी धरती को इन सत्ता लोलुप लोगों की महत्वाकांक्षा के लिए यूं ही बर्बाद होते नहीं देख सकते।

दुनिया के सारे परमाणु हथियार नष्ट हों…

अभी हाल ही में यूरोप के देश जर्मनी से एक गुड न्यूज आई थी वहां परमाणु ऊर्जा प्लांट को उड़ा दिया गया है। यह परमाणु ऊर्जा बहुत ही खतरनाक है आपको रूस के चेर्नोबिल परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना याद है जो कितनी खतरनाक थी। उसे अगर भूल गए हों तो जापान में हुई दुर्घटना याद कर लिजिएगा। सभी देशों के सभी परमाणु हथियार नष्ट होने चाहिए।

बायोलॉजिकल और केमिकल हथियार भी नष्ट हो…

अभी कोरोना संक्रमण को लेकर अमेरिका और चीन के बीच जो आरोप प्रत्यारोप चल रहा है उसने यह भयावह तस्वीर सामने रख दी है कि एक सूक्ष्म वायरस मी कितना खतरनाक हो सकता है। इसलिए बायोलॉजिकल और केमिकल हथियार भी नष्ट होने चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र हो ताकतवर…

दुनिया में जो हथियारों की होड़ है वो विभिन्न देशों द्वारा अपना वर्चस्व स्थापित करने करने के लिए है। खासकर विकसित और विकासशील देश इस अंधी और पागलपन भरी दौड़ में शामिल हैं। पहले विश्व युद्ध में लाखों सैनिकों के साथ लाखों निर्दोष नागरिकों की मौत के बाद शांति स्थापित करने के लिए संयुक्तराष्ट्र बना लेकिन उसे विजयी रहे मित्र राष्ट्रों ने हारे हुए देशों को अपमानित करने और उनका आर्थिक दोहन करने का माध्यम बना दिया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद भी कमोबेश यही स्थिति रही। इस बार भी विजयी राष्ट्रों ने अपने फायदे के लिए संयुक्त राष्ट्र को इस्तेमाल किया। उसके 75साल बाद भी स्थिति में बदलाव नहीं आया है।

संयुक्त राष्ट्र का अगर ढंग से लोकतांत्रिक तरीके से गठन हो तो हम इसे वैसी संस्था के रूप में विकसित कर सकते हैं जो पूरी दुनिया में शांति स्थापित कर सके। इसे विश्व के सारे देशों की वास्तविक प्रतिनिधि संस्था बनाना चाहिए। इसके लिए हर देश को उनकी जीडीपी के कुछ प्रतिशत राशि संयुक्त राष्ट्र को देनी होगी। हर सदस्य देश का सिर्फ एक प्रतिनिधि और सब की शक्ति बराबर हो।

किसी भी देश के पास वीटो पावर नहीं होना चाहिए। सभी देशों के लोग चुन कर आएं और उनमें से जो बेहतरीन लोग हैं उन्हें हम शासन करने के लिए चुन सकें।

ये ऐसे लोग हों जो पूरी मानवता की सेवा के लिए इच्छुक हों। जो ज्यादा खुशहाल और हरी-भरी धरती को दुनिया के विभिन्न देशों की भाषाओं के गीतों, नृत्य व अन्य कलाओं को आगे बढ़ा कर तोपों, बंदूकों के शोर को बेमानी कर दे। दुनिया के सबसे बड़े हथियार सप्लायर अमेरिका की सबसे बड़े हथियार बनाने वाली लॉकहीड मार्टिन की फैक्टरियां म्यूजियम में तब्दील हो जाएं और हमारी अगली पीढ़ी जब उसे देखे तो हमारी आत्मघाती मूढ़ता और पागलपन पर हंसे कि कैसे लोग थे जो खुद को ही तबाह करने का सामान खुद ही तैयार करते थे।

कोई भी देश दूसरे पर हमला ना कर सके…

दुनिया में पूर्ण शांति और हथियारों की होड़ समाप्त करने के लिए सबसे जरूरी कदम यही है कि कोई भी देश दूसरे पर हमला न कर सके। सभी देशों की सेनाएं खत्म हो जाएं। सिर्फ संयुक्त राष्ट्र के पास ही सेना हो। मेरे कहने का अर्थ ये है कि विभिन्न देशों की स्थिति ऐसी हो जाए जो आज हमारे देश में राज्यों की है। इससे हथियारों की बिक्री का ये गलीज धंधा बंद हो जाएगा और सेनाओं पर होनेवाला खर्च भी बचेगा।। ये अरबों अरबों डॉलर पूरी दुनिया में आधारभूत संस्थापनों के निर्माण और शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसी जरूरी चीजों पर खर्च किए जा सकेंगे। इससे हम ज्यादा खूबसूरत दुनिया बना सकेंगे जहां ज्यादा से ज्यादा लोगों को आदमी की तरह का सम्मानजनक जीवन जीने लायक स्थितियों का निर्माण कर सकेंगे।

नोट: यह लेख महज मंजिल की तरफ इशारा भर है। अब ये प्रबुद्ध लोगों पर है कि वे इस लक्ष्य तक पहुंचने का रास्ता बनाएं। हो सकता है इसमें 20, 30, 50 साल या 100 साल लग जाएं।

लेख ध्यान से पढ़ें और विचार कर अगर पसंद आए तो अधिक से अधिक शेयर करें। इसे एक अभियान के रूप में चलाएं।

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