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सत्ता के लालचियों ने बांट दिया समाज को…

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Omprakash Varma

ओमप्रकाश वर्मा

विचार। यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्ता के लालचियों ने समाज को जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर बांट दिया है। आज जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की आग ने विकराल रूप धारण कर लिया है। प्रशासन के लिए समस्या से निपटना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। समस्या की आग पर राजनीतिक दल रोटियां सेंक रहे हैं, उनके जाने किसी का बेटा बिछड़े या अपंग हो, कोई मतलब नहीं। दबे, कुचले, पिछड़े, बेरोजगार और किसान भ्रष्ट नेताओं की राजनीति को समझ नहीं पा रहे हैं। भ्रष्ट सत्ताधारी पुलिस के जरिए आवाज को दबाने के लिए तैयार बैठे हैं।

गुजरात चुनाव से पहले पटेलों की आवाज को दबाने के लिए निर्दोषों को जेल में ठूंसा गया और अब महाराष्ट्र में दलितों की आवाज को दबाने के लिए निर्दोषों को जेल में ठूंसा जा रहा है।

आखिर इस लड़ाई का अंत क्या होगा?

क्या पुलिस और अन्य जांच एजंसियां निष्पक्ष जांच करने के बजाय भ्रष्ट नेताओं के इशारे पर निर्दोष लोगों के खिलाफ कार्रवाई करती रहेगी ? क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं कि पहले भ्रष्ट नेताओं को बेपर्दा कर जेल की हवा खिलाए?

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क्या पुलिस व अन्य जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं कि भ्रष्ट नेताओं द्बारा गैर कानूनी तरीके से एकत्रित की गई अकूत संपत्ति को जब्त कर सरकार के खजाने में जमा कराए? क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं कि चुनावों के दौरान खर्च की जाने वाली बेहिसाव दौलत की जांच कर उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराया जाए? पुलिस व अन्य जांच एजेंसिया अपने दायित्व और कर्तव्यों का निर्वहन करतीं तो समाज के टुकड़े-टुकड़े नहीं होते।

दुख इसी बात का है कि पुलिस व अन्य जांच एजेंसियों का कहर पैसा व पॉवर विहीन लोगों पर बरप रहा है। यह स्थिति अच्छी नहीं है। जब भूखे-नंगे, दबे, कुचले, दलित, किसान व बेरोजगार सड़कों पर उतरेंगे तो कानून व्यवस्था संभाल पाना मुश्किल हो जाएगा। जिस व्यक्ति के पास पैसा और पॉवर है, वह संवेदनहीन हो गया है और भ्रष्ट नेताओं व अफसरों के तलवे चाट रहा है, उसे किसी के दर्द का अहसास ही नहीं है, विवेकशून्य हो चुका है।

नेतागिरी आमजन की समस्याओं के समाधान, देश व समाज की खुशहाली के लिए की जाती है पर आज के नेताओं ने तो इसके मायने ही बदल दिए हैं। उन्होंने नेतागिरी को ऐसा व्यवसाय बना लिया है, जिसकी तुलना किसी भी व्यवसाय से नहीं की जा सकती है। यही हाल अफसरों का है।