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पूरी दुनिया में भाषा को सच से दूर धकेला जा रहा है और झूठ उसका स्वभाव बन रहा है

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आज राजनीति, बाज़ार, धर्म आदि शक्तियां एक अघोषित गठजोड़ में भाषा का लगातार अवमूल्यन कर रही हैं और बौद्धिक और सृजनधर्मा लोग चुपचाप ऐसा होते देख रहे हैं…

शबाब ख़ान,

भाषा में सच बोला जा सकता है, वह हमें सचाई से जोड़ती है पर भाषा में झूठ भी बोला जाता है और उसमें छल-कपट भी आम है। इन दिनों, चुनावी माहौल में, भाषा लगातार सार्वजनिक झूठ और छल का माध्यम हो रही है। किसी भी तरह का संस्कार या संयम राजनैतिक भाषा से निकाल दिये गये हैं। इसकी प्रतियोगिता सी हो रही है कि कौन कितनी अभद्रता से कितनी नाटकीयता से झूठ बोल सकता है। इस प्रतियोगिता में देश-प्रदेश के उच्च पदों पर आसीन राजनेता शामिल हो रहे हैं।


विज्ञापन और झूठ का संबंध भी पुराना है। जो नया है वह यह कि झूठ को सीधे-सीधे, बिना किसी संकोच और पूरी बेशर्मी से, परोसा जा रहा है। राजनीति और बाज़ार इस होड़ में बहुत उत्साह से शामिल हैं। कई बार यह सोचकर दहशत होती है कि पूरी दुनिया में भाषा सच से दूर ढकेली जा रही है और झूठ उसका लगभग स्वभाव बन रहा है। ऐसे झूठ का पर्दाफ़ाश करने के अवसर और मंच, हिम्मत और जवाबदेही की जगहें घट रही हैं। संकट भाषा की किसी शुद्धता या पवित्रता बचाने का नहीं है – भाषा की सहज मानवीयता, उसका सत्यशील बचाने का है।


जिस भारत में संसार की संभवतः प्राचीनतम परंपरा भाषा-चिंतन की रही है, जो अपनी सूक्ष्मता और परिष्कार के लिए विख्यात थी, उसी देश में भाषा के समकालीन अवमूल्यन पर गहराई से विचार और विश्लेषण का कोई गंभीर प्रयत्न नज़र नहीं आता। भाषा के प्रति एक क़िस्म के कामचलाऊपन का भाव भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं रहा है। अगर एक तरह की आधुनिकता ने, जिसका दुर्भाग्य से, वर्चस्व बढ़ता ही गया है, भाषा को निरा उपकरण मानने की वृत्ति को प्रोत्साहित किया तो उसी आधुनिकता ने जिस प्रश्न पूछने और विचारने की वृत्ति को भी पोसा वह इस मामले में इतनी मंद क्यों है?


आज राजनीति, बाज़ार, धर्म आदि शक्तियां एक अघोषित पर स्पष्ट गठजोड़ में भाषा का लगातार अवमूल्यन कर रही हैं और हम बौद्धिक और क्रिएटिव लोग चुपचाप ऐसा होते देख रहे हैं। यह अंततः भाषा, बुद्धि, सृजन और चिंतन सभी का स्थगन है – उनके साथ विश्वासघात है।


इतना काफ़ी होना चाहिये पर है नहीं कि हम अपने कर्म में भाषा की मानवीयता और सत्यशील बचाये रखें। यह ऐसा समय है कि जब भाषा के लिए हमें एकजुट होकर बार-बार बुलंद आवाज़ उठाना चाहिये। क्योंकि भाषा का बचना मानवीयता, संग-साथ, सचाई, सामुदायिकता आदि का बचना भी है। सही है कि कुछ मायनों में भाषा हमेशा किसी न किसी संकट में रहती है और उसका जीवट उसे बचाता या संकट से उबारता रहता है। पर आज जो संकट है वह सार्वजनिक जीवन में उसके विराट् अवमूल्यन का है और उसे मानवीय संजीवनी की ज़रूरत है।


मुक्तिबोध: जिनकी कविता और आलोचना हिंदी जगत के लिए अब भी चुनौती बने हुए हैं…

मुक्तिबोध की जन्मशती के दौरान, जो इन दिनों चल रही है, उन पर कितना पुनर्विचार संभव हो पा रहा है, यह कहना कठिन है। विचारधाराओं के धनुर्धर इन दिनों कुछ निस्तेज हो गये हैं और इसीलिए शायद अपने वैचारिक विरोधियों को लांछित या ध्वस्त करने के लिए मुक्तिबोध का इस्तेमाल करने का उत्साह अब उतना नहीं दीख पड़ता। मुक्तिबोध का विचारधारात्मक पाठ काफ़ी हद तक अन्तःसलिल हो गया लगता है। बार-बार उन्हें मार्क्सवादी घोषित करने और उस कारण उनके महत्व को रेखांकित करने की कोशिश भी अब वैसी मुखर नहीं है।


इस पर गहराई से विचार होना बाक़ी है कि मुक्तिबोध का अपने समकालीनों से किस तरह का संबंध और संवाद था। अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा, हरिशंकर परसाई आदि इस सूची में सहज ही आते हैं। कई बार लगता है कि यह बात जान-बूझकर नज़रंदाज की गयी है कि मुक्तिबोध की जितनी दूरी अज्ञेय से थी लगभग उतनी ही नागार्जुन और त्रिलोचन से भी थी।


उन्होंने अपनी एक कविता- “मैं तुम लोगों से दूर हूं – में कहा था।”

शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है

शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है

सत्य केवल एक जो कि

दुःखों का क्रम है।


वे अपनी एक दूसरी कविता में देख सकते थे कि ‘सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब /इनकार एक सूना’

यह भी उतना लक्ष्य नहीं किया गया है कि कई अर्थों में मुक्तिबोध की तरह बाद की कविता ने अभिव्यक्ति के ख़तरे उतने नहीं उठाये जितने अराजक होने की हद तक उन्होंने उठाये थे। किसी हद तक शमशेर ने ऐसा जरूर किया लेकिन उनके वैचारिक सहचरों ने नहीं। यह भी देखा जा सकता है कि बाद की हिंदी कविता ने कुछ हद तक बाद में अन्तःकरण के आयतन के संक्षिप्त होने के विरुद्ध संघर्ष किया है। हिंदी कविता के अन्तःकरण का आयतन पिछली अधसदी में बढ़ा और सक्रिय हुआ है।


मुक्तिबोध ने ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान की स्थापनाएं की थीं। वे स्वयं उनकी कविता में आधी-अधूरी ही विन्यस्त हो पायी हैं। हिन्दी आलोचना ने इन स्थापनाओं का नामजाप तो बहुत किया है पर इन्हें आलोचनात्मक अमल में वह कम ही ला पायी है। असल में इसका कम एहतराम हुआ है कि ये स्थापनाएं और अन्तःकरण की अवधारणा मुक्तिबोध द्वारा हिंदी मार्क्सवादी दृष्टि में किये गये संवर्द्धन या संशोधन थे। यह दुखद है कि विचारधारियों द्वारा उनकी असल में अवज्ञा ही की गयी है।


याद आती हैं मुक्तिबोध की पंक्तियां कि ‘नहीं इनकारवाले द्वार खुलते’। वे एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविता और आलोचना दोनों ही हिंदी आलोचना और रसिकता के लिए अब भी चुनौती बने हुए हैं और उनका आत्मसात् किया जाना बाक़ी है।


सिमिट-सिमिट जल:

वाग्देवी प्रकाशन बीकानेर से चित्रकार सीरज सक्सेना के साथ पीयूष दईया का एक लंबा साक्षात्कार पुस्तकाकार ‘सिमिट सिमिट जल’ नाम से प्रकाशित हुआ है।


अकसर कलाकार सच से आक्रांत नहीं होते, उनका लगाव सचाई से होता है। सीरज ऐसी सचाइयों के धनी हैं। एक जगह वे याद करते हैं‘। तभी मैंने पहचाना कि जहां भय है वहां सौंदर्य ज़रूर है। सुन्दरता के पीछे, किसी कोने में, कहीं भय का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है। दिन में प्रकृति का भू-दृश्य सुन्दर लगता है पर रात में प्रकृति का संसार बदल जाता है। जिस पेड़ की छांव में बैठकर दिन में अच्छा लगता है, रात में लगता है कहीं यह निगल न जाये। प्रकृति से संवाद करने के लिए बहुत साहस चाहिये। आम तौर पर प्रकृति के सारे अनुभव दिन के अनुभव हैं। रात का अनुभव इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उसके बाद दिन के अनुभव की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है। प्रकृति दिन में जितना दीखती है उतना ही विस्तार वह रात में करती है।’

अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में सीरज ने विस्तार से, पर टुकड़ों-टुकड़ों में बात की है। उसमें उनकी कला के अलावा कला मात्र के बारे में कुछ दिलचस्प अवलोकन हैं। वे कहते हैं कि ‘मैं रंगों को उनके नाम से नहीं लगाता हूं। मैं रंगों को उनकी रोशनी के हिसाब से बरतता हूं। जो रंग बना भी है वह प्रकाश के विभिन्न अनुपात ही है। प्रकाश और वर्ण… काले रंग से मुझे कुछ शुभ अनुभूति नहीं होती है। काला रंग मुझे निराशाजनक, नीरस, असहाय लगता है। काला रंग देखना मुझे पसंद है पर अपने चित्रों में मैं यह नहीं लाता।’


इस पठनीय पुस्तक का समापन इन पंक्तियों से होता है: ‘मेरे चित्र शून्य का ही श्रृंगार हैं, दरअसल। मैं एक शून्यधारी प्राणी हूं जो संवर रहा है, स्वयं को मांज रहा है। जब कभी चंद्र-ग्रहण देखते हैं तब वह गोला थोड़ा कटा हुआ सा नज़र आता है। मेरे जीवन में अभी चित्रकला का उतना ही ग्रहण लगा है। बहुत सारा शून्य का हिस्सा अभी बाकी है। जब तक प्रकाश पूरी तरह से लुप्त नहीं हो जाता तब तक का संसार है। यह शायद पूर्ण शून्य होने की कोशिश है। सम्भवतः।’

साभार: श्री दिलीप शर्मा (पीएचडी हिंदी – बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय)