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Pandit Hans Kumar Tiwari Jayanti

समालोचकों की चूक से बिहार के सैकड़ों मूल्यवान साहित्यकार अलक्षित रह गए: सत्य नारायण

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प्रणम्य कवि और समालोचक पं हंस कुमार तिवारी की जयंती पर आयोजित हुई संगोष्ठी…

Sudhanshu Aanand

सुधांशु आनंद

पटना। हंस कुमार तिवारी उत्तर छायावाद काल के गीत-चेतना के अग्रणी कवियों में एक थें। तिवारी जी ने बंगला साहित्य के अनुवाद के साथ हीं कई अनेक मौलिक साहित्य का सृजन कर हिंदी साहित्य में एक बड़ा अवदान दिया।

किंतु साहित्य के इतिहास में उन्हें वह स्थान नहीं मिला। जिसके वे योग्य पात्र थें। पं. तिवारी तो फिर भी आलोचकों को याद रहे, किंतु बिहार के अनेक ऐसे साहित्यकार हुए, जिन पर समालोचकों की दृष्टि ही नहीं पड़ी। वे अलक्षित हीं रह गए।

यह बातें आज यहाँ प्रणम्य कवि और बंगला साहित्य के महान अनुवादक पं. हंस कुमार तिवारी की जयंती पर, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्त्वावधान में, ‘बिहार के अलक्षित साहित्यकार’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक़्ता के रूप में अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए, बिहार हिंदी प्रगति समिट के अध्यक्ष और सुप्रतिष्ठ कवि सत्य नारायण ने कही।

उन्होंने कहा कि बिहार के साहित्यकारों पर हाल हीं में दिवंगत हुए साहित्यकार, सुरेन्द्र प्रसाद जमुआर ने दो पुस्तकें लिखी। इन पुस्तकों में उन्होंने दो सौ से अधिक साहित्यकारों पर निबंध लिखे। उनमें बिहार के सभी प्रमुख साहित्यकारों के साथ-साथ अनेक ऐसे साहित्यकारों को अलग-अलग स्मरण किया है, जो आलोचकों की दृष्टि से ओझल रहे। यह काम आगे नहीं हो सका। यह दायित्व विद्वानों को लेना चाहिए।

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श्री सत्य नारायण ने अलक्षित साहित्यकारों का स्मरण करते हुए हरेंद्र देव नारायण, डा विश्वनाथ प्रसाद, रामप्रिय मिश्र ‘ललधुआँ’ और ‘बटोहिया’ गीत के अमर रचनाकार रघुवीर नारायण का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए, उनके साहित्यिक अवदानों पर विस्तार पूर्वक चर्चा की।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि, पं हंस कुमार तिवारी हिंदी साहित्य के एक बहु-आयामी व्यक्तित्व थे। उन्होंने गद्य और पद्य में समान अधिकार से लिखा। उनकी भाषा सरल किंतु आकर्षक थी। वे एक सुकुमार कवि, सुयोग्य संपादक, सफल नाटक-कार और अनुवाद-साहित्य के सिद्ध साहित्य मनीषी थें।

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बंगला साहित्य को हिंदी में लोकप्रिय बनाने में उनका अद्भुत योगदान रहा। उन्होंने विश्वकवि रवींद्र नाथ ठाकुर, शरतचंद्र, विमल मित्र, शंकर समेत अनेक बंगला-साहित्यकारों की लोकप्रिय रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया। हिंदी साहित्य में उनका अवदान अविस्मरणीय है।

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के साहित्य मंत्री और विद्वान समालोचक डा शिववंश पाण्डेय ने विषय का विद्वतापूर्ण प्रवेश किया। सम्मेलन के वरीय उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, प्रो वासकीनाथ झा, प्रो त्रियोगी प्रसाद, बच्चा ठाकुर, आनंद किशोर मिश्र, राजा कुमार प्रेमी, ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, नलिन प्रसाद नलिन, चंद्रदीप प्रसाद, मोहन दूबे तथा शालिनी पांडेय ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

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इस अवसर पर ज्ञानेश्वर शर्मा, सत्येंद्र नारायण त्रिवेदी, बाँके बिहारी साव, परमानंद प्रसाद, चंद्रशेखर यादव, पवन कुमार मिश्र तथा विपिन बिहारी वर्मा समेत बड़ी संख्या में सुधीजन उपस्थित थे। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

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