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Sama Chekva festival

विलुप्त होती मिथिलांचल का लोकपर्व ‘सामा-चकेवा’

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Pankaj Pandey

पंकज पाण्डेय

पटना: आधुनिकता के इस दौर में हम शहरी संस्कृति के मकड़जाल में उलझ अपनी सांस्कृतिक विरासत और परम्पराओं को संभालने के बजाय उसे भूलते जा रहे हैं। टीवी और सिनेमा के प्रभाव में कई क्षेत्रीय पर्व आज जहाँ देशव्यापी हो गया है। वहीं कई लोक पर्व अब भी ऐसे है जो विलुप्ति के कगार पर खड़ा है।

विलुप्ति के कगार पर पहुँच चुकी एक ऐसा ही लोकपर्व है। मिथिला में मनाया जाने वाला-सामा-चकेवा…भाई-बहन के प्रेम को दर्शाने वाला रक्षाबंधन और भाई दूज को तो सभी जानते है। लेकिन सामा-चकेवा के विषय में बहुत ही कम लोगों को पता होगा। भाई दूज से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक पुरे तेरह दिन तक मनाया जाने वाला मिथिला का यह पारम्परिक त्यौहार दुर्भाग्यवश देश के कई अन्य त्योहारों और परम्पराओं की तरह समाप्त होने की कगार पर है।

मिथिलांचल में छठ पूजा की समाप्ति के साथ ही लड़कियां और महिलाएँ पुरे उल्लास और उत्साह के साथ सामा-चकेवा के खेल-खेलना शुरू कर देती है। सिक, सुतली और धान की बाली के जुगाड़ से लडकियां अपने दादी-नानी से वृंदावन, चुगला आदि बनवाती है। ऐसी परंपरा है की छठपूजा के पहले ही इसे बनाया जाना अनिवार्य है। पर आजकल बाजार में रेडीमेड हर चीज की तरह बना-बनाया सामा-चकेवा भी मिलता है। अधिकतर लड़कियां अब बाजार से ही खरीदती है।

छठ पूजा के प्रातकालीन अर्ध्य देने के दिन की रात से पुरे मुहल्ले की लडकियां और महिलाएं सामूहिक रूप से खुले जगह या कुआँ पर आकर सामा-चकेवा के मूर्ति के साथ-साथ वृंदावन, चुगला आदि को बांस से बने एक डाला में भर के इकठ्ठा हो जाती है। तरह- तरह के गीतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हास-परिहास और महिलाओं की गाली का दौर घंटो तक चलता है।

‘गाम के अधिकारी तोहें बड़का भैया हो, हाथ दस पोखरि खुना दिए, चंपा फुल लगा दिए हे! वृंदावन मे आगि लागल कियो नहि मिझाबे हे, हमर बड़का-छोटका भईया मिलकए मिझाउत जैसे शारदा सिन्हा के गाए मधुर लोकगीतों से पूरा वातावरण मधुर हो जाया करता है। लडकियाँ और महिलाएँ सामा-चकेवा और दूसरे मूर्तियों से भरा डाला एक दूसरे के हाथ में देकर अपने भाई के लम्बी आयू की कामना करती है। यह क्रम कार्तिक पूर्णिमा तक चलता रहता है।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन भाईल अपने बहनों के सामा-चकेवा के मूर्तियों के विसर्जन के लिए अच्छा से अच्छा डोली बनाते है। शाम को पूरे मोहल्ले की लडकियाँ और महिलाएँ झुण्ड में गीत गाते हुए और भाई लोग अपने कंधे पर डोली लिए गॉंव के पोखर या नदियों पर पहुँच कर मूर्तियों का विसर्जन उसी डोली पर बिठा कर कर देती है। 

चुगला को उसके बुरे चरित्र के लिए जला के किसी खेत में फ़ेंक दिया जाता है। उसके बाद बहनें भाई को चुरा या मुढ़ी के साथ कुछ मीठा चीज देती है। भाई दिए गए में से उसका कुछ हिस्सा बहनों को वापस देता है…इसी के साथ तेरह दिनों तक चलने वाले बहन-भाई का आपसी सौहार्द का प्रतीक यह लोकपर्व की समाप्ति हो जाती है।