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जिले में एक के बाद एक गोलीबारी की घटना से लोग दहशत में, पुलिस की कार्यशैली पर उठ रहे सवाल

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Sarfaraz Alam

सरफराज आलम

सहरसा। शहर में नशे के कारोबार और आपसी वर्चस्व की लड़ाई में गोलीबारी आम बात हो गई है। शहर में कब और कौन कैसे और कहां किसकी गोली का निशाना बन जाए यह कहना मुश्किल है। रोज-ब-रोज होने वाली गोलीबारी की घटना से आम शहरी दहशत में जी रहे है। बीते 2 महीने के दौरान 2 दर्जन से अधिक गोलीबारी की घटना हो चुकी है। गोलीबारी में इस्तेमाल होने वाले हथियार शहर में कहां से आ रहे हैं। यह जांच का विषय है।

छोटी-छोटी बातों पर भी हथियार का प्रयोग किया जा रहा है। गोलीबारी की घटना में में ज्यादातर नवयुवकों संलिप्त पाये जा रहे हैं। ऐसे में यक्ष प्रश्न उठता है कि इन युवाओं के हाथों में आखिरकार हथियार थमा कौन रहा है?

बीती घटनाओं पर गौर करें तो 11 फरवरी को मीर टोला स्थित पेट्रोल पंप के समीप बटराहा निवासी श्याम कुमार गुप्ता गोलीबारी में जख्मी हो गए। 3 मार्च को होली के रंग लगाने के विवाद में छोटू आलम पूर्व पार्षद ओवैस कणी उफ चुन्ना उसके पिता और भाई पर अंधाधुंध फायरिंग हुई। 5 मार्च को बंपर चौक समीप सत्यम कुमार उर्फ विभु पांडेय पर गोली चली। 12 मार्च को सहरसा बस्ती में दो पक्षों के बीच विवाद में गोलीबारी की घटना दर्ज हो चुकी है।

16 मार्च को सुबेदारी टोला निवासी संझा देवी, 22 मार्च को कचहरी चौक पर दिनदहाड़े गोलीबारी की घटना हुई। वहीं 23 मार्च को बंपर चौक पर दो गुटों के वर्चस्व की लड़ाई में हुई गोलीबारी से अविनाश कुमार जख्मी हो गए। 24 मार्च को छेड़खानी का विरोध करने पर सहरसा बस्ती में गोलीबारी की घटना घटी जबकि अप्रैल माह में शुरुआती दौर में ही अब तक दो इस तरह की घटना घट चुकी है। 1 अप्रैल को दो गुटों के बीच लड़ाई में चार- पाँच  राउंड फायरिंग के अलावा 2 अप्रैल को पटुआहा  में चाय दुकानदार पर गोलीबारी का मामला दर्ज कराया गया है।

सहरसा में इस तरह की घटना लगातार हो रही है। प्रशासन अपराधियों के समक्ष पंगु नजर आ रहा है।अपराधियों के बढ़ते मनोबल और अपनी कार्यशैली को लेकर प्रशासन सवालों के घेरे में है।